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स्वतंत्र सोच ही रही है मेरी विशेषता | एक हिन्दू जिसने गाँधी के सर्वधर्म समभाव नामी मिथ्या प्रपंच से धोखा खाया |
तब नारायणी माँ भवतारिणी ने नग्न सत्य से साक्षातकार कराया | तब से आरम्भ हुई एक नई कहानी जो बन गया मेरे वर्तमान एवं भविष्य का एकमात्र उद्देश्य |
शिक्षा | जीविकोपार्जन हेतु कार्यानुभव में अनेक विविधतायें | कम आयु में ह्वूज़ हू इन द वर्ल्ड में समाविष्ट | अनेक गभीर तथा त्वरित अध्यात्मिक अनुभवों से गुजरना |
जन्म | पारिवारिक पृष्ठभूमि | नाम | यशोधर्मन या यशोधर्मा ? | यशोधर्म या यशोधर्मा ? | चित्रशाला

लिखित 2005

स्वतंत्र सोच ही रही है मेरी विशेषता

मैं न तो किसी संगठन का सदस्य हूँ, न किसी राज नैतिक दल का, न किसी धार्मिक पंथ का। मैं किसी संस्था के बंधनों में अपने को जकड़ा हुआ पाना नहीं चाहता हूँ। न ही मुझमें कोई अभिलाषा है राजनीति के दलदल में फँसने की। मेरे लेखन में यदि कोई त्रुटि पाएँ तो समझें कि वह जान बूझकर नहीं हुआ और उसे ठीक करने के लिए आप मुझे सदा तैयार पाएँगे। हिंदी मेरी मातृभाषा नहीं है अतएव आशा है कि आप मेरी भाषा संबंधी भूलों को क्षमा करेंगे।

एक हिन्दू जिसने गाँधी के सर्वधर्म समभाव नामी मिथ्या प्रपंच से धोखा खाया

मैं हिंदू पैदा हुआ, मैं हिंदू हूँ और हिंदू ही रहूँगा। मेरे इष्टदेव श्री सिद्धि विनायक गणपति को मैंने प्रत्येक स्थान पर पाया चाहे वह मंदिर हो, या मस्जिद, या गिरजा। अपने पाकिस्तानी ड्राइवर मलिक के साथ मैं शारजाह के मस्जिद में गया और उसके बगल में बैठ कर अपने इष्टदेव को याद किया, जबकि उसने अपनी नमाज़ पढ़ी। तंज़ानियन-ओमानी हमूद हमदून बिन मुहम्मद के घर पर, उनके परिवार के साथ, एक ही बहुत बड़ी थाली में से, हम सभी ने एक साथ भोजन किया, उनके एक करीबी रिश्तेदार की मौत के बाद, मस्जिद से लौट कर। मुम्बई में एक कैथोलिक चर्च के मास के दौरान मैं गिरजे में मौजूद था। कैनेडा के एक प्रोटेस्टेंट चर्च में सरमन के समय मैं उपस्थित रहा। मुम्बई में यहूदियों के सिनगॉग एवं पारसियों के टेम्पल में मैं गया। कैनेडा के एक बौद्धों के मंदिर में मैंने मेडिटेशन किया।

एक हिंदू, यह नहीं सोचता, कि मेरा ईश्वर ही अकेला सच्चा ईश्वर है, और बाक़ी सभी के ईश्वर, झूठे ईश्वर हैं, जैसा कि यहूदी सोचते हैं, ईसाई सोचते हैं, मुसलमान सोचते हैं जिसका मुझे तब ज्ञान न था। मोहनदास करमचन्द (महात्मा ?) गांधी तथा उनकी देखा देखी अनेक हिन्दू धर्मगुरुओं ने जो कहा उसे मैं सत्य समझता रहा। चाहे कहीं भी मैं रहा, हिंदू भारतवर्ष या मुस्लिम मिड्ल-ईस्ट या मुस्लिम फ़ार-ईस्ट या ईसाई वेस्ट, मैंने सभी धर्मों को एक जैसा जाना, और माना। मैंने जाने कितने लोगों को नौकरी के लिए चुना पर कभी यह न सोचा कि वह हिंदू था, या मुसलमान, या ईसाई। उन दिनों मेरी सोच, धर्मों की भिन्नता की ओर न जाती, क्योंकि मैं इस संदर्भ में अनजान था। मैं जानता नहीं था कि विभिन्न धर्म वास्तव में क्या सिखाते हैं। मैं एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में जीया, जिसमें सभी धर्म समान हुआ करते थे!

तब नारायणी माँ भवतारिणी ने नग्न सत्य से साक्षातकार कराया

अभी भी मैंने उस कड़वी सच्चाई को न जाना था, क्योंकि मैंने इस बात की आवश्यकता कभी न महसूस की थी, कि मुझे स्वयं विभिन्न धर्मों का अध्ययन करना चाहिए। मैं बड़ा सुखी था, उन ज्ञानियों पर पूर्णतया विश्वास कर, जिन्होने मुझे उस महान असत्य का पाठ पढ़ाया, कि सभी धर्म समान हैं, एवं सभी धर्म प्रेम और शांति की शिक्षा देते हैं। उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या वे स्वयं अज्ञानी थे, और उसी अज्ञान को, अपने अनुयायियों में बाँटते रहे थे? या फिर सत्य की प्रतीति थी उन्हें, पर किसी निहित स्वार्थ की पूर्ति हेतु, वे असत्य को सत्य का रूप देते रहे थे?

जीवन के पचास वर्ष बीत चुके थे, और तब जाकर मैं बैठा, विभिन्न धर्मों की शिक्षाओं का अध्ययन करने। मैंने पाया कि, ये शिक्षाएँ बहुत ही स्पष्ट रूप से झलकती हैं उन धर्मों के अनुयायियों की सोच, एवं आचरण में। गहराई में गया, तो मैंने जाना किस प्रकार से, प्रत्येक धर्म ने, मानव इतिहास, एवं वर्तमान की घटनाओं को रूप दिया। मैंने देखा कि धर्म, इतिहास एवं वर्तमान की घटनाओं के बीच एक गहरा, और सीधा संबंध है। संदेश बहुत ही स्पष्ट था, हम इन जानकारियों को नज़र अंदाज तो कर सकते हैं, पर अपनी ही क्षति करके। अब मैं बाँटना चाहता हूँ, अपनी इन नई जानकारियों को, केवल उनके साथ, जिन्हें परवाह हो इनकी।

तब से आरम्भ हुई एक नई कहानी जो बन गया मेरे वर्तमान एवं भविष्य का एकमात्र उद्देश्य

मेरे आराध्य, श्री नारायण की दया से, मेरे जीवन की महत्वाकांक्षाएँ एवं सांसारिक आकांक्षाएँ पूर्ण हो चुकी हैं। अब मैं, अपने समय, एवं परिश्रम, के बदले में, कुछ भी नहीं चाहता। इस कारण, मैं कार्य में पूर्ण मनोयोग के साथ, एकांत ही चाहता हूँ। मेरा कार्य, केवल उन्हीं लोगों के लिए है, जो इसकी महत्ता को पहचानते हैं। मुझमें अब कोई इच्छा नहीं रही, कि मैं उन व्यक्तियों को समझाने में, अपना समय, एवं अपनी ऊर्जा नष्ट करूँ, जो मेरी बात को समझने की स्थिति तक, अभी नहीं पहुँचे। ऐसे व्यक्ति, इन लेखों की महत्ता को तभी समझेंगे जब पानी सर तक आ पहुँचेगा, एवं डूबने की संभावना उन्हें बहुत ही निकट से दिखने लगेगी। फिर भी मुझे अपना दायित्व, पूर्ण समर्पण की भावना के साथ, निभाते जाना है, एवं उस कर्म के परिणाम को, श्री नारायण को समर्पित करते हुए, आगे बढ़ते जाना है। आज यही मेरी पूजा है।

 

शिक्षा

शिक्षा भारत के विभिन्न प्रांतों में हुई। हाईस्कूल मेरिट छात्रवृत्ति तथा अंग्रेज़ी, गणित में डिस्टिंक्शन। स्नातक स्तर पर विश्वविद्यालय में छठा स्थान। चार्टर्ड ऐकाउंटैंट परीक्षा प्रथम प्रयास में उत्तीर्ण तथा अंकों के आधार पर आर्टिक्लशिप में एक वर्ष की छूट। कंपनी सेक्रेटरी तथा कम्प्यूटर सिस्टम ऐनालिसिस की परीक्षाओं में उत्तीर्ण।

जीविकोपार्जन हेतु कार्यानुभव में अनेक विविधतायें

कम आयु में ह्वूज़ हू इन द वर्ल्ड में समाविष्ट

35 वर्ष की आयु में शिकागो (अमरीका) से प्रकाशित मार्क्विस ह्वूज़ हू इन द वर्ल्ड (विश्व में कौन कौन) के 1987-88 संस्करण में समाविष्ट।

अनेक गभीर तथा त्वरित अध्यात्मिक अनुभवों से गुजरना

46 वर्ष की आयु में अनेक गभीर तथा त्वरित अध्यात्मिक अनुभवों से गुजरते हुए एक दिन नारायणी माँ भवतारिणी से माँग बैठा – बहुत कार्य कर लिया, माँ, जीविकोपार्जन हेतु, अब मुझे वह कार्य दो जो तुम्हारी सेवा में हो। कुछ ही समय के पश्चात (आयु 48), जीविकोपार्जन के कार्य से निवृत्ति लेकर, संन्यास हेतु भारत लौटा पर माँ भवतारिणी ने कुछ और ही निर्णय कर रखा था। दो वर्षों तक विभिन्न परिस्थितियों से गुजार कर, तब मुझे वह कार्य सौंपा जिसे विगत दस वर्षों से (2002 से) आपकी सेवा में कर रहा हूँ।

जन्म

25 जनवरी 1952, बाँकुड़ा, पश्चिम बंगाल
हिन्दू पद्धति द्वारा चन्द्र-आधारित जन्म कुण्डलि के अनुसार सिंह लग्न, पूर्व आषाढ़ नक्षत्र, क्षत्रिय वर्ण, धनु राशि
पाश्चात्य पद्धति द्वारा सूर्य-आधारित जन्म कुण्डलि के अनुसार कुम्भ राशि

पारिवारिक पृष्ठभूमि

नाना जी अपने समय के प्रख्यात शल्यचिकित्सक थे। विवाह के पहले माँ की पढ़ाई हाईस्कूल तक हुई थी तथा विवाह के पश्चात घर पर रहकर, पितामह की देख-रेख में, इंटर तक की पढ़ाई की। पिता स्वर्णपदक प्राप्त इंजिनियर थे। पितामह डॉक्टर। प्रपितामह लेखक, पर्यटक, शिक्षाविद। तीन बार मैं काशी में रहा था, कुल मिलाकर कोई चार वर्ष। उन दिनों प्रपितामह के नाम पर कन्याओं के लिए एक इंटर कॉलेज हुआ करता था। यह 1970 के पहले की बात है। प्रपितामह के पिता ने काशी आकर शिव प्रतिष्ठा की। उन दिनों रेल यात्रा का प्रचलन नहीं हुआ था। गंगा मैया की गोद में बजरे द्वारा यात्रा करते हुए सपरिवार कोलकाता से काशी आकर बसे तथा संसार में रहकर एक योगी की भाँति शेष जीवन व्यतीत किया। उन सभी के कुछ-कुछ अंश मुझे मिले।

विजया दशमी 24 अक्टूबर 2012 प्रातः 06:14

नाम

यशोधर्मा कोई अंगीकृत नाम अथवा उपनाम या फिर छद्मनाम नहीं है। बचपन में पितामह (डॉक्टर पी सी रखित) द्वारा दिया हुआ यह मेरा ही नाम है। यशोधर्मा बचपन का नाम, मानोज रखित वर्तमान नाम।

यशोधर्मन या यशोधर्मा ?

एकबार मैंने संस्कृत के एक आचार्य से पूछा (जो अपनी के साथ भी सर्वदा संस्कृत में ही बात करते हैं -

उनका तात्पर्य था जब हमें राजा को संबोधित करना होता है तो हम कुछ ऐसा कहते हैं 'हे राजन' !

यशोधर्म या यशोधर्मा ?

इस पार्थक्य को समझना आवश्यक है । 

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