यदि सत्य का ज्ञान होता आपको तो शायद आपकी सोच ही बदल जाती

जो दिखता है या फिर दिखाया जाता है वह सत्य से बहुधा बहुत दूर होता है

अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मानक संख्या ISBN 81-89746-12-X प्रकाशित 9 अक्टूबर 2005

प्राक्कथन

मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी, पाठकों के मनों-मस्तिष्क पर जो गलत धारणाएँ शिक्षा एवं मीडिया के द्वारा थोप दी गई हैं, उन्हें मिटाना। यह कतई आसान न होगा, कारण ये धारणाएँ इतनी गहरी हो चुकी हैं कि ये आसानी से नहीं मिटेंगी। लोग एक बार मेरी पुस्तक पढ़ कर यह तो मान लेंगे कि वह सच नहीं जो उन्होंने अब तक सीखा और जाना पर इससे बहुत कुछ न होगा। कारण एक बार पढ़ने से उनका चेतन मस्तिष्क तो इसे स्वीकार कर लेगा पर अवचेतन मस्तिष्क पर इसकी छाप गहरी न होगी। जब भी ऐसा अवसर आएगा कि वे अपने मस्तिष्क से कुछ सोचेंगे या विश्लेषण करेंगे तो उनके अवचेतन मस्तिष्क से वे ही धारणाएँ उनकी बोली एवं लेखनी के द्वारा प्रकट होंगी जिनकी छाप उनके मस्तिष्क पर इतनी गहरी हो चुकी हैं कि मिटाए न मिटे। हमें समझने की चेष्टा करनी चाहिए कि ऐसा क्यों होता है - क्योंकि जब तक हम समस्या की जड़ तक नहीं जाएंगे तब तक इसका निर्मूलन न कर सकेंगे। यह छठी पीढ़ी है। ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा का प्रभाव हमारे मनों-मस्तिष्क पर बहुत गहरी छाप छोड़ चुका है। जो हमनें बचपन से सीखा एवं जवानी में जाना और बुढ़ापे तक उसकी असलियत न पहचानी, उसे कैसे झुठला सकते हैं हम? इसी कारण प्रत्येक नई परिदृष्टि हममें उत्सुकता तो जगाता है पर हमारी सोच को पूरी तरह बदल नहीं पाता। समय-समय पर हम फिर वही राग अलापने लगते हैं जो हमारे अस्तित्व का अंग बन चुकी है। इतना गहरा होता है प्रभाव (1) शिक्षा का एवं (2) एक सोच को लगातार दोहराते रहने का। तो फिर रास्ता क्या है इस प्रपंच से निकलने का? वही जिसका प्रयोग किया गया था हमें इस चक्रव्यूह में फ़ँसाने के लिए (1) ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा का निर्मूलन (2) नई जानकारी को लगातार दोहराते रहना ताकि वह हमारे अवचेतन मस्तिष्क से पुरानी जानकारी को पहले मिटाए और उसके पश्चात नई जानकारी को उसके स्थान पर प्रस्थापित करे।

मैं नहीं चाहता कि आप मुझ पर आँख मुँद कर विश्वास करें। जो कुछ मुझसे जानें, सीखें उसे स्वयं परख कर देखें। पर इतना मैं आपसे अवश्य आशा करूँगा कि सही और ग़लत की पहचान आपको होनी चाहिए। जैसे आपको मुझ पर आँख मुँद कर विश्वास नहीं करना चाहिए वैसे ही आपको अन्य व्यक्तियों पर भी आँख मुँद कर विश्वास नहीं करना चाहिए चाहे वे कोई भी क्यों न हों - आपके शिक्षक, मार्गदर्शक या धर्मगुरु। संभव है वे स्वयं अज्ञान के शिकार रहे हों और उसी अज्ञान को आप तक, सत्य समझकर, पहुँचाते रहे हों क्योंकि उनकी शिक्षा का श्रोत भी तो वही था जो आपका रहा है।

मेरी भी अपनी कुछ सीमाएँ हैं। अधर्म अन्याय का विनाश करने के लिए गांडीव संधान करने की क्षमता तो आज मुझमें नहीं है। हाँ मेरे आराध्य श्री नारायण ने मुझे यह कलम दी है, सोचने की योग्यता, एवं सबसे महत्वपूर्ण एक अंर्तदृष्टि दी है और कहा है पुत्र इन्हें ही अपना अस्त्र जानो। बस उसी को लेकर चल पड़ा हूँ मैं इन बीहड़ राहों पर। जब तक उनकी शक्ति मेरे साथ होगी तब तक डटा रहूँगा इस कुरुक्षेत्र में।

ईसाई धर्म हिंदू धर्म को किस दृष्टि से देखता है, और क्यों?

"वे हमेशा धन माँगते हैं अमरीकी जनसमुदाय से कि हम भारतवर्ष में जाकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं। हम यह देखते हैं नित्य विभिन्न टेलिविज़न चैनेलों पर। पैट रॉबर्टसन जो उनके मुख्य धार्मिक नेताओं में से एक हैं उन्होंने कहा है कि हिंदू धर्म एक नारकीय/राक्षसी धर्म है। वे हिंदू देवताओं को जानवरों के सिरों के साथ दिखाते हैं और कहते हैं जरा देखो इन्हें कितने असभ्य हैं ये लोग। वे भारतवर्ष के राजनैतिक एवं सामाजिक समस्याओं को अमरीकी जनसमुदाय के समक्ष रख कर कहते हैं यह सब हिंदू धर्म के कारण है। वे अमरीकी जनसमुदाय से कहते हैं कि हमें धन दीजिए ताकि हम भारतवर्ष जाकर उन्हें इस भयावह हिंदू धर्म के चंगुल से छुड़ाएँ और उन्हें ईसाई बना सकें" आइएसबीएन 81-85990-60-3 पृष्ठ 151

आप अपने आप से पूछिए क्या हिंदू धर्म असभ्य लोगों का एक नारकीय/राक्षसी धर्म है जैसा कि बताया जाता है सारे विश्व को विभिन्न अमरीकी टीवी चैनेलों के द्वारा और धन माँगा जाता है हिंदुओं को इस भयावह धर्म के चंगुल से छुड़ाने के लिए?

"न्यूयॉर्क टाइम्स अमरनाथ की तीर्थ यात्रा के बारे में लिखता है कि हिंदू जा रहे हैं विनाश के देवता शिव के कामवासना के अंगों की पूजा के लिए" आइएसबीएन 81-85990-60-3 पृष्ठ 154

कैसा लगता है यह सुनकर आपको? यह छवि प्रस्तुत करते हैं वे हिंदू धर्म की लाखों गोरी चमड़ी वालों के सामने। पर आप में से अनेक हैं जो फूले नहीं समाते जब देखते हैं मुट्ठी भर गोरी चमड़ी वालों को हिंदू धर्म अपनाते। आप इसी खुशफ़हमी में जीते हैं कि देखो हिंदू धर्म की क्या साख है विश्व में जो इन गोरी चमड़ी वालों को भी प्रेरित करती उसे अपनाने! कुछ तो यहाँ तक छाप देते हैं कि आज सारा विश्व हिंदू धर्म की महत्ता को मानता है पर हमारे अपने हिंदू उस महत्ता को नहीं समझते। ये अति ज्ञानी लोग उन मुट्ठी भर गोरी चमड़ी वालों को सारे विश्व का प्रतिनिधि मान बैठते हैं। क्या आप अपनी ही नज़रों में इतना गिर चुके हैं कि कोई जरा सा आपकी पीठ थपथपाता और आप फूल कर कुप्पा बन जाते? यही तो चाहा था उस टीबी मॅकॉले ने जो टीबी की तरह घुन लगा गया हमारे स्वाभिमान को जब वह लेकर आया ईसाई मिशनरियों की बटालियन सन 1835 में हमें ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा पद्धति के साँचे में ढालने के उद्देश्य से। वह तो सफल हो गया अपने उद्देश्य में पर उसका मूल्य चुकाया आपने। आपने खो दी अपनी शिक्षा, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान!

डॉ जेरोमे का अमरीकन वेब साइट जो विश्व भर में 71 लाख से अधिक लोगों द्वारा देखा जा चुका है हिंदू धर्म की व्याख्या यों करता है — शिव नशाख़ोर है, शिवलिंग रूढ़ शैली का खड़ा हुआ (इरेक्ट) शिश्न है, शक्ति वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहित करती है, काली दुष्ट/डरावनी और ख़ून की प्यासी है। आज कल इंटरनेट का बोलबाला है। विश्व के कोने-कोने तक अपनी बात पहुँचाने का यह सबसे सस्ता एवं द्रुतगामी माध्यम है। वेब साइट में एक काउंटर होता है। यह काउंटर गिनता रहता है कितने लोग अब तक इस साइट पर आए। जब भी कोई व्यक्ति विश्व के किसी भी कोने से कंप्यूटर के द्वारा उस साइट पर जाता है तत्काल काउंटर उसे रेकॉर्ड कर लेता है। जब मैं गया इस खबर की जाँच करने तो काउंटर ने 71,11,525 दिखाया — यह कई महीनों पहले की बात है 14 फ़रवरी 2005 डॉ जेरोमे का दावा है कि इस साइट को विश्व भर से पैंतीस हज़ार लोग प्रतिदिन देखते हैं। जरा सोचिए प्रतिदिन पैंतीस हज़ार लोग यह जानकारी पाते हैं कि हिंदू धर्म कितना गिरा हुआ है। और कौन बताता है उन्हें यह सब बातें? डॉ जेरोमें जैसे ख्याति प्राप्त ईसाई धर्म गुरु –

"हिंदू धर्म है जमघट विभिन्न पंथों का जिसे कहा जा सकता है धार्मिक अराजकता का ज्वलंत उदाहरण। शिव उनमें से सबसे अधिक लोकप्रिय है। उसके सबसे अधिक भक्त मिलेंगे आपको। नटराज के रूप में वह चार हाथों के साथ नाचता है। चारों ओर नंगा घूमता है गाँव-गाँव में, नंदी नामक एक सफ़ेद साँड़ के पीठ पर चढ़ कर। नशे में धुत्त, भूखे रहने और अपने शरीर को विकृत करने की शिक्षा देता वह। भैरव के रूप में अपने पिता की हत्या करने वाला, अपने बाप की खोपड़ी को एक कटोरे के रूप में प्रयोग करने वाला है वह। अर्धनारीश्वर के रूप में स्त्री व पुरुष के काम वासना की छवि है वह। उसके मंदिरों में सदा पाओगे एक बड़ा लिंग जो है रूढ़ शैली का एक खड़ा (इरेक्ट) शिश्न जो है प्रतीक उसके निरंकुश कामुकता का। शिव की पत्नियाँ बड़ी लोकप्रिय हैं। शक्ति रहस्यानुष्ठान, मद्यपान-उत्सव, व्यभिचार, लाम्पट्य, मंदिरों में वेश्यावृत्ति एवं बलि देने की प्रथा को प्रोत्साहित करती है। शक्ति ने आरम्भ किया सती प्रथा का जिसमें विधवा आग में कूद जाती है अपने पति की चिता में। शक्ति काली के रूप में दुष्ट, डरावनी और ख़ून की प्यासी और सबसे अधिक लोकप्रिय है। वह खड़ी होती है एक छिन्न-मस्तक शरीर के ऊपर, गले में मनुष्यों के कटे सरों की माला डाले। ख़बरों के अनुसार प्रति वर्ष सौ व्यक्तियों का ख़ून किया जाता है, बलि के लिए, भारतवर्ष में काली के सम्मान में। हिंदू धर्म के जंगल में न घुसो, निकल भागो इस जंगल से जब यह तुम्हारे बस में हो" http://religion-cults.com/Eastern/Hinduism/hindu11.htm

क्या प्रभाव पड़ता होगा है सारे विश्व पर जब पैंतीस हज़ार लोग प्रतिदिन पढ़ते हैं इसको? मैं स्वयं जाने कितनी बार (गिनती नहीं कर सकता) भगवान शिव शंकर के द्वार पर गया। प्रत्येक बार मेरे सामने वही लिंग था। मैंने तो कभी उसमें वह न देखा जो इन ईसाई धर्म गुरुओं ने देखा। मैंने तो उस शिवलिंग में सर्वदा शिव को देखा। ऐसा क्या है उनकी सोच में जो उन्हें कामुकता से भरा शरीर का वही अंग याद आया जो उनके अपने ही मन में सदा छाया रहता है? आगे चलकर इसी रहस्य को समझने की चेष्टा करेंगे।

पर इन्हें केवल तीन उदाहरण समझने की भूल न करें। पूछें - क्या ऐसी प्रचेष्टाएँ सीमित रही हैं केवल ईसाई धर्म गुरुओं तक ही? नहीं, यह प्रवृत्ति जनसाधारण में भी फैल चुकी है। आइए कुछ उदाहरण देखें (ऐेसे अनेक उदाहरण मिलेंगे आपको) —

"बड़े-बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर्स में बिकते चप्पलों पर श्री गणेश की मूर्ति — American Eagle Outfitters ने प्रचलित किया इन्हें जिनके लगभग 750 स्टोर्स मिलेंगे आपको अमरीका एवं कैनेडा में — इसी प्रकार आप पाएंगे कोमोड पर माँ काली की छवि उन पखानो में जो निर्मित किए गए हैं बड़ी अमरीकी कंपनियों के द्वारा" http://www.IndiaCause.com (अप्रैल 2003)

ईसाई धर्मावलंबी लोगों को इस बात का आनंद तो मिलना चाहिए कि वे हमारे परम पूज्य श्री गणेश को अपने पैरों तले प्रतिदिन रौंद सकें अथवा माँ काली की छवि के साथ टट्टी कर सकें। यह केवल अमरीका की बात ही नहीं हमारे अपने भारतवर्ष में भी होता है ऐसा।

"धर्मान्तरित ईसाई अपने धर्मगुरु की शह पर शिवलिंग पर बैठ कर टट्टी करते हैं 13 अगस्त 2003 ग्राम कोविलनचेरी जिला कांची प्रदेश तमिलनाडु" Hindu Voice, English edition, Sept 2003 issue, report by S V Badri pp 40-41

ऐसा क्या है ईसाइयों की सोच में, उनकी शिक्षा में, उनके संस्कारों में और उनके छुपे हुए अतीत में जो उन्हें इस रूप में ढालता है? क्या वे ऐसा केवल आज ही कर रहे हैं? नहीं, केवल आज ही नहीं, वे ऐसा सदा से करते आए हैं। वे सदा से ऐसा क्यों करते आए हैं? ऐसा क्या छुपा है उनके अतीत में? क्या हिंदू धर्म उनके साथ ऐसा व्यवहार करता है? वे किस मिट्टी के बनें हैं जो उनमें इतनी घृणा है हमारे प्रति? आइए चलें उनके अतीत में।

ईसाई धर्म की आधारभूत शिक्षायें क्या हैं?

"संत जेरोमें जाने जाते हैं वल्गेट के संकलनकर्ता के रूप में — वल्गेट लैटिन भाषा में लिखा गया बाइबल का मुख्य स्वरूप है जिसे रोमन कैथोलिक चर्च के द्वारा आधिकारिक विषय-वाक्य की मान्यता प्राप्त है — पोंटिफेक्स मैक्सिमस रोमन कैथोलिक चर्च में पोप को कहा जाता है जो उनके सर्वोच्च धर्मगुरू की उपाधी है — पोप का स्थान (राज्य) वैटिकन में है" ऑक्सफोर्ड शब्दकोश आइएसबीएन 019-565432-3

अर्थात संत जेरोमे के लिपिबद्ध किए हुए सत्य वैटिकन द्वारा प्रामाणिक माने जाते हैं।

"जोजेफ़ मॅकॉबे अपनी पुस्तक द टेस्टामेंन्ट ऑफ़ क्रिश्चियन सिविलिज़ेशन (अर्थात ईसाई सभ्यता का विधान) में लिखते हैं कि ईसाई धर्म की स्थापना हुई ख़ून की नदियाँ बहा कर। ईसाई धर्म के प्रथम सर्वोच्च धर्म गुरु प्रथम पोप ने अपने पुत्र का वध किया, अपनी पत्नी का खून किया, अपने भांजे का वध किया और अपने अनेक मित्रों का ख़ून किया। इनके बारे में यूट्रोपियस ने लिखा एवं चौथी शताब्दी के ईसाई संत जेरोमे ने इसकी पुष्टि की। इन सच्चाइयों के बारे में आज कोई विवाद नहीं है। इस सत्य को आज मान्यता प्राप्त है" आइएसबीएन 81-85990-21-2 पृष्ठ 45 टिप्पणियाँ

तो आपने देखा ईसाई धर्म के प्रथम सर्वोच्च धर्म गुरु का चरित्र क्या था। अब सोचिए उनके अनुयायियों का चरित्र कैसा होगा? स्वाभाविक है कि उनके अनुयायी अपने धर्म गुरू का ही अनुसरण करेंगे। कौन होता है अनुयायी? वही जो अपने गुरू को आदर्श मानता है और अपने आप को उनके दिखाए रास्ते पर ढालने की सतत चेष्टा करता है।

क्या आपके मन में यह प्रश्न उठता है कि प्रथम पोप के इस ख़ूनी चरित्र को रूप दिया किसने? ईसा मसीह के बारह मुख्य शिष्यों में से एक संत मैत्थ्यू ने ईसा की वाणी को बाइबल में इस प्रकार लिपिबद्ध किया —

"12:30 वह जो मेरे साथ नहीं वह मेरे विरुद्ध है"

तात्पर्य यह कि जो मेरा अनुयायी नहीं उसे मेरे ख़िलाफ़ समझो

"10:34 न सोचो कि मैं आया हूँ विश्व में शांति लाने के लिए — मैं आया हूँ शांति के लिए नहीं बल्कि तलवार लिए 10:35 क्योंकि मैं आया हूँ आदमी को अपने पिता के विरुद्ध खड़ा करने के लिए - पुत्री को माता के विरुद्ध - बहू को सास के विरुद्ध 10:36 और मनुष्य का शत्रु होगा उसका अपना परिवार" आइएसबीएन 0-8400-3625-4

संत ल्यूक ने इस बात की पुष्टि करते हुए ईसा की वाणी को बाइबल में यों लिपिबद्ध किया —

"12:51 तुम समझते हो कि मैं आया हूँ इस धरती को अमन चैन देने? मैं तुम्हें बताता हूँ - नहीं! मैं आया हूँ बँटवारा करने 12:52 क्योंकि अब से घर में पाँच बटे होंगे - तीन दो के विरुद्ध - दो तीन के विरुद्ध  12:53 पिता होगा पुत्र के विरुद्ध - पुत्र होगा पिता के विरुद्ध - माँ होगी पुत्री के विरुद्ध - पुत्री होगी माता के विरुद्ध - सास होगी बहू के ख़िलाफ़ - बहू होगी सास के ख़िलाफ़" आइएसबीएन 0-8400-3625-4

क्या अब आपके समझ में आया कलियुग को इस धरती पर लाने वाला कौन था? हम हिंदुओं के परिवारों में फूट कब से पड़ी? तब से, जब से भारत में आई ईसाई-अँग्रेज़ी  शिक्षा पद्धति! ऐसा होता है बुरी शिक्षा एवं बुरे संगत का असर!

संत मैथ्यू एवं संत ल्यूक के दस्तावेज़ों की पुनः पुष्टि करते हुए ईसा के बारह मुख्य शिष्यों में से एक संत थॉमस ने ईसा की वाणी को गॉस्पेल ऑफ़ थॉमस में यों लिपिबद्ध किया

"16 ईसा ने कहा संभवतः लोग सोचते हैं कि मैं आया हूँ विश्व में शांति स्थापना हेतु - वे नहीं जानते कि मैं आया हूँ इस धरती पर फूट डालने के लिए - आग, तलवार और युद्ध फैलाने के लिए - जहाँ पाँच होंगे एक परिवार में - वहाँ तीन होंगे दो के विरुद्ध और दो होंगे तीन के विरुद्ध - पिता होगा पुत्र के विरुद्ध और पुत्र पिता के - और वे डटे रहेंगे क्योंकि वे दोनों अपने आप में अकेले होंगे" आइएसबीएन 81-85990-21-2

संत ल्यूक ने इसी बात को आगे बढ़ाते हुए ईसा की वाणी को बाइबल में इस प्रकार लिपिबद्ध किया —

 "14:26 यदि एक व्यक्ति मेरे पास आता है और वह अपने पिता से घृणा नहीं करता - एवं माता से, पत्नी से, संतानों से, भाई-बहनों से, एवं अपने-आप से भी - तो वह मेरा शिष्य नहीं बन सकता" आइएसबीएन 0-8400-3625-4

प्रथम पोप ने ईसा मसीह के शब्दों को अपने जीवन में सच्चा रूप दिया — जैसा कि आपने बाइबल के उपरोक्त उद्धरणों में देखा ईसा कहते हैं (1) मत सोचो कि मैं आया हूँ इस धरती पर शांति का संदेश लेकर - मैं इस धरती पर शांति नहीं बल्कि युद्ध की तलवार लेकर आया हूँ। ईसा ने पूछा (2) क्या तुम समझते हो कि मैं आया हूँ इस पृथ्वी पर शांति स्थापित करने के लिए? मैं तुम्हें बताता हूँ  - नहीं। मैं आया हूँ मानवों में फूट डालने के लिए। ईसा मसीह ने कहा (3) मैं आया हूँ परिवारों में फूट डालने के लिए - पिता और पुत्र को एक दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने के लिए - माँ और पुत्री को एक दूसरे के विरुद्ध करने - सास और बहू को एक दूसरे से लड़ाने - एक ही परिवार के सदस्यों को एक दूसरे का शत्रु बनाने। ईसा मसीह ने कहा (4) मैं चाहता हूँ कि बच्चे अपने माता-पिता से घृणा करें - मैं चाहता हूँ कि भाई-बहन एक दूसरे से घृणा करें - मैं चाहता हूँ कि पति-पत्नी एक दूसरे से घृणा करें। प्रथम पोप ने इन शब्दों का अक्षरश: पालन किया।

1835 में जब प्राचीन हिंदू शिक्षा पद्धति को नष्ट कर ईसाई अँग्रेज़ी शिक्षा पद्धति की स्थापना की गई तब से धीरे-धीरे हम हिंदुओं ने भी ईसा मसीह के इच्छाओं का पालन करना सीख लिया। रामायण महाभारत में आप सास-बहू का झगड़ा नहीं पाते पर आज घर-घर में इसकी चर्चा मिलेगी। ईसाई विधाता के विधान जो बाइबल में लिपिबद्ध किए गए हैं — ड्यूट्रॉनमि (विधि-विवरण) के अंतर्गत — बाइबल के अनुयायियों को यह निर्देश देते हैं कि —

"13:6 यदि तुम्हारा भाई तुम्हारी अपनी माँ का बेटा या तुम्हारा पुत्र या तुम्हारी पुत्री या तुम्हारी पत्नी जो तुम्हारे हृदय में बसती हो या तुम्हारा वह मित्र जो तुम्हारी अपनी आत्मा के समान है - इनमें से यदि कोई तुम्हें चुपके से फुसलाए कि चलो हम चल कर दूसरे धर्म के भगवान की पूजा करें जो न तुम्हारे भगवान हैं न तुम्हारे पूर्वजों के 13:8 तुम अपनी सहमति न दोगे - न तुम उसकी बात सुनोगे - न तुम्हारी नज़र में उसके प्रति दया होगी - न तुम उसे क्षमा करोगे - न तुम उसे छुपाओगे 13:9 तुम उसे अवश्य ही मार डालोगे - तुम्हारा हाथ वह पहला हाथ होगा जो उसे मृत्यु के द्वार तक पहुँचाएगा - उसके पश्चात दूसरे लोगों के हाथ उस पर पड़ेंगे 13:10 और तुम उसे पत्थरों से मारोगे कि वह मर जाए क्योंकि उसने तुम्हें तुम्हारे अपने भगवान से दूर ले जाने की चेष्टा की 20:16 उन शहरों को जिनका तुम्हें तुम्हारे भगवान ने उत्तराधिकारी बनाया - उन शहरों के लोगों में से किसी को भी साँस लेता न छोड़ना 20:17 उन्हें पूर्णतः नष्ट कर देना" "32:24 उन्हें भूख से तड़पाओ - जलती हुई आग की लपटों को निगल जाने दो उनके शरीरों को - उनकी मौत अत्यंत दुःखद हो - मैं भी भेजूँगा जानवरों को जिनके दाँत उनके शरीरों पर गड़ेंगे और साँपों को जिनका विष उन्हें धूल चटाएगा 32:25 बिना तलवार के उनके दिलों में आतंक भर दो - नष्ट कर दो जवाँ मर्दों को, कुमारियों को, माँ का दूध पीते नन्हे बच्चों को, और वृद्धों को जिनके बाल पक चुके हों" आइएसबीएन 0-8400-3625-4

प्रथम पोप ने ईसाई धर्म के भगवान के बनाए गए विधानों का बड़ी आस्था के साथ पालन किया। ख़ून की नदियाँ बहा दी उन्होंने, जरा भी न झिझके। जैसा कि आपने बाइबल के उपरोक्त उद्धरणों में देखा कि ईसाई धर्म के भगवान का विधान है (1) यदि तुम्हारी पत्नी, तुम्हारा पुत्र, तुम्हारी पुत्री, तुम्हारा सगा भाई, तुम्हारा लँगोटिया यार तुमसे कहे कि चलो हम दूसरे धर्म के भगवान को पूजें तो उसे अवश्य ही अपने ही हाथों से मार डालो (2) उन शहरों को जिन पर तुम कब्जा करो उनमें किसी को जीता न छोड़ो - उन्हें भूखा मारो - उन्हें आग में झोंक दो - केवल जवानों को ही नहीं बल्कि कुमारियों को, माँ का दूध पीते नन्हे-नन्हे बच्चों को एवं सफ़ेद बाल वाले बूढ़ों को - किसी को भी साँस लेता न छोड़ो।

उस शिक्षा से प्रेरित होकर ईसाइयों ने हिंदुओं को (विशेष कर हिंदू ब्राह्मणों को) कैसी अकथ्य यातनाएँ दीं लगातार दो सौ वर्षों तक?

 "पोप ग्रेगरी 9वें ने धर्म-न्यायाधिकरण की स्थापना की सन 1232 के लगभग" ऑक्सफोर्ड शब्दकोश आइएसबीएन 019-565432-3

 जो ईसाई नहीं बनना चाहता उसे ईसाई धर्माधिकारी दंड देते —

 "द एम्पायर ऑफ़ द सोल में पॉल विलियम रॉबर्टस लिखते हैं - (1) माता-पिता के आँखों के सामने बच्चों को कोड़े लगाए जाते और फिर उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े किए जाते - माता-पिता के पलकों को उखाड़ दिया जाता ताकि वे अपनी आँखों को बंद न कर सकें - बच्चे छटपटाते रहते - माता-पिता इस दृश्य को अपनी आँखों के सामने देखते रहने के लिए बाध्य किए जाते - बहुत ही सावधानी के साथ माता-पिता के हाथ-पाँव काटे दिये जाते ताकि वे बेहोश न हों और होश में रहते हुए यह सब कुछ देख सकें - केवल उनके पेट से लेकर सर तक का भाग बचा रहता, दोनों हाथ-पाँव कटे होते और पलकें उखाड़ ली गई होतीं (2) पुरुषों के जननेंद्रिय को निकाल लिया जाता और उनके पत्नियों के समक्ष जलाया जाता (3) स्त्रियों के स्तनों को काट दिया जाता एवं उनकी योनि में तलवार घुसेड़ दी जाती - उनके पति इसे देखते रहने के लिए बाध्य किये जाते और यह चलता रहा दो सौ वर्षों तक" The Empire of the Soul, Paul William Roberts, Harper Collins, 1999, quoted in The Saint Business, Rajeev Srinivasan, Hindu Voice, Nov 2003, pp.4-5

आज से केवल दो सौ वर्ष पहले ये घटनायें घटी हैं सन 1560 से 1812 तक। ये नराधम ईसाई आज बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और हम हिंदुओं को मानवता का पाठ पढ़ाते हैं - ह्यूमन राइट्स की बातें करते हैं। आदमखोर जानवर भी लज्जित होंगे अगर इन ईसाइयों के कुकर्मों की गाथा सुनेंगे! ये ईसाई एवं इनकी ईसाई-अंग्रेज़ी शिक्षापद्धति में प्रशिक्षित हिंदू आज हिंदू धर्म एवं हिंदू जीवन मूल्यों की आलोचना करते नहीं थकते — आप इनकी दृष्टि से आज हिंदू धर्म एवं हिंदू जीवन मूल्यों को परखना सीखते हैं। 

ईसाई धर्म की विशिष्टताएँ क्या है?

मायावी व्यक्तित्व, छल-कपट में असाधारण रुचि, सत्ता के प्रति असीमित लालसा, धनलोलुपता एवं कामातुर प्रवृत्ति - ये हैं आसुरिक संस्कृति के मापदंड। मायावी वह होता है जिसकी असली पहचान हमसे छुपी होती है। धीरे-धीरे उनकी उस असली पहचान से आपकी पहचान कराउंगा मैं।

कामातुर प्रवृत्ति की इतनी अधिकता क्यों?

"15वीं शताब्दी के पोप ऐलेक्ज़ैन्डर 6ठे ने अपनी पुत्री के साथ यौन संबंध रखे — ये अपने पुत्र के साथ वेश्याओं के पास जाते रहे — इन्होंने अपने कार्डिनलों को विष दिया उनके धन को हथियाने के लिए — इन्होंने चर्च के विशेषाधिकारों को ख़रीदा और बेचा — इनके महल में उच्छृंखल पार्टियाँ हुआ करती थीं जहाँ अनियंत्रित रूप से शराब बहता था और अंधाधुंध यौनाचार होता था — इनका अंत भी विष के द्वारा हुआ, वैसे ही जैसे इन्होंने अपने कार्डिनलों को विष देकर मारा" ISBN 81-85990-21-2, p.79 footnotes
"महासभा में सैंतीस साक्षियों (जिनमें से अधिकांशतः धर्माध्यक्ष एवं पुरोहित थे) की साक्षी से यह प्रमाणित हुआ कि पोप जॉन 13वें व्यभिचारी, परस्त्रीगामी, कौटुंबिक व्यभिचार, लौण्डेबाज़ी, चोरी एवं ख़ून के अपराधी थे — इसके अलावा असंख्य प्रत्यक्षदर्शियों के साक्ष्य के अनुसार उन्होंने शील भंग और बलात्कार किया था तीन सौ ननों (मठवासिनी धर्म संघिनियों) का" Dwight - Roman Republic in 1849, p.115 देखें The Priest, Woman and Confessional,  p.268 देखें ISBN 81-85990-46-8 p.97 fn.97
"ईसाई पोप इतने दोग़ले बच्चे पैदा करते कि उनके पालन-पोषन के लिए प्रकांड मठों की व्यवस्था करनी पड़ती थी — जन्म लिपियों में पोप का नाम पिता के रूप में दर्ज किया जाता था — जब रोम ( ईटली) में महान शोभायात्राएँ हुआ करती थीं तो पोप के ये दोग़ले बच्चे पोप के आगे-आगे चलते थे" Familiar Discourses, p.383  देखें ISBN 81-85990-46-8 p.97 fn.98
"छः हज़ार नवजात शिशुओं के सर पाए गए उस मछली तालाब के अंदर जो उस कॉनवेन्ट के पास था जो ईसा मसीह के दुल्हनों का निवास कहलाता था" Ibid, ISBN 81-85990-46-8 p.97 fn.98 read with Introduction by Sita Ram Goel, p.xx
"इंग्लैंड के हेनरी 3रे जो 13वीं शताब्दी में लीग के पादरी हुआ करते थे उनकी 65 अवैध संतानें थीं — उन्होंने एक बार महाभोज में जनसमुदाय के सामने अपनी शेख़ी बघारते हुए एलान किया कि उन्होंने 22 महीनों में 14 बच्चे पैदा किए" Ibid, Vol. 2, p.349 ISBN 81-85990-46-8 p.97 fn.97
"इस बात की खुल कर पुष्टि की जाती थी कि इंग्लैंड में पादरियों ने एक लाख स्त्रियों को लंपट दुराचारी बनाया था" Draper - Intellectual Development of Europe, p.498 ISBN 81-85990-46-8 p.97 fn.97
"बॉस्टन अमरीका सन 2003 मैसाचुसेटस के ऐटॉर्नी जेनरल ने कहा कि कम से कम 789 व्यक्तियों ने कोई 250 पादरियों के विरुद्ध आरोप लगाए हैं — वे जब छोटे थे एवं गिरजे में जाते थे तो इन पादरियों ने उन्हें यौन संबंध के लिए बाध्य किया था — ऐटॉर्नी जेनरल रेली ने यह भी कहा कि दूसरे स्रोतों से जानकारी लेने पर यह संख्या 1,000 से भी अधिक होगी — इस खुलासे के बाद विश्व भर के विभिन्न स्थानों से लोग अपने-अपने बचपन में पादरियों के द्वारा यौन संबंध के लिए मजबूर किए जाने की बात सामने लाने लगे हैं" Free Press Journal, 25 July 2003, p.7 World
"वॉशिन्गटन अमरीका सन 2005 पादरियों के दूसरे वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 1,092 नए आरोप पादरियों के विरुद्ध आए हैं — डॉ मैक्चेसने के अनुसार सन 1950 से लेकर अब तक 800 मिलियन डॉलर (1 डॉलर 43 रुपये के हिसाब से 34 अरब 40 करोड़ रुपये) देने पड़े हैं — केवल पिछले वर्ष ही देने पड़े 139.6 मिलियन (6 अरब रुपये) — 1,092 नए आरोप लगाए गए थे 1,083 व्यक्तियों के द्वारा जिनमें से अधिकांशतः पुरुष थे — सन 1950 से 2002 तक 10,667 नाबालिग़ों के साथ पादरियों ने यौन संबंध स्थापित किए उन्हें बाध्य कर और अपने धर्मगुरु होने का अनुचित लाभ उठाकर — डॉ मैक्चेसने के अनुसार वास्तविक संख्या हम कभी न जान पाएँगे क्योंकि अनेक लोग ऐसी बातों को सबके सामने ज़ाहिर करना नहीं चाहते" Times Of India, 20 February 2005, p.10

ऐसे उदाहरणों से पूरी किताब भरी जा सकती है पर मेरा उद्देश्य वह नहीं।

अब तुलना कीजिए इन सब की हमारे पुरातन हिंदू समाज से — संभवतः दो सौ वर्ष भी नहीं हुए — मुम्बई के गवर्नर हुआ करते थे एलफिन्सटन जिनके नाम पर कॉलेज है एवं एक रेलवे स्टेशन है मुम्बई में — उन्होंने लिखा अपनी पुस्तक में कि

"हिंदू लोग हम (ईसाई-अँग्रेज़ों) से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं दो विषयों में (1) विलासिता लांपट्य व्यभिचार से मुक्ति एवं (2) आचरण में पवित्रता" Elphinstone's History of India, ed. Cowell, pp.375-381 quoted in ISBN  0-14-100437-1 p.56 read with end note 39 

ऐसा ही कुछ एक पचीस वर्षीय केनेडियन ने मुझसे सन 2000 में कहा था "हम सबसे तुम कहीं अधिक पवित्र (pure) हो"। जाने क्या देखा था उसने मुझमें। संभवतः उसका इशारा आचरण एवं चरित्र की तरफ़ था जब उसने प्योर शब्द का प्रयोग किया।

जब तक हमने अपने आपको इन आसुरिक प्रवृत्ति वाले लोगों से दूर रखा तब तक हमने अपने आचरण की पवित्रता को बनाए रखा। जब हम इनके क़रीब आते गए तो हमारी पवित्रता हमसे दूर होती गई। छः पीढ़ियों की संगत के पश्चात आज हम उनके इतने निकट आ गए हैं कि हमने अपनी पवित्रता को पूरी तरह से खो दिया है। इसी लिए हमारे बड़े-बूढ़े कहा करते थे कि बुरी संगत का असर बुरा ही होता है। आज तो हम इस प्रकार से घुलमिल गए हैं उनसे कि उनके आचरण को हम उचित एवं हमारे पुरातन आचरणों को दक़ियानूसी समझने लगे हैं!

मैं शिक्षा पर ही इतना ज़ोर क्यों देता हूँ? हम जो कुछ पढ़ते हैं और जो कुछ अपने चारों तरफ़ देखते हैं वे सभी हमारे मनों-मस्तिष्क पर कोई न कोई छाप अवश्य छोड़ जाते हैं। शिक्षा चाहे किसी भी प्रकार की हो वह हमारी सोच, हमारी भावनाओं को दिशा देती है। हमारी सोच एवं हमारी भावनाएँ अंततः हमारे आचरण का निर्माण करती हैं। जब हिंदू शिक्षा पद्धति हमारी शिक्षा का माध्यम रही थी तो उसने हमारे चरित्र को एक ढाँचे में ढाला। जब आसुरिक शिक्षा पद्धति हम पर थोप दी गई 1835 में तो उसने हमें धीरे-धीरे आसुरिक बना दिया! आज का हिंदू वह कल का हिंदू न रहा जिसका आचरण पवित्र हुआ करता था। मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ये पोप और ये पादरी अपने घरों में क्या करते हैं। पर उन्होंने हमारे घर में जबरन घुसकर हमें और हमारे बच्चों को अपने जैसा गंदा बनाना शुरू किया। इसलिए हमारा जानना आवश्यक है कि हम उनके बिना क्या थे और उनकी संगत में क्या बन गए।

ईसाई पोप (सर्वोच्च धर्मगुरु) एवं ईसाई धर्मगुरुओं ने अपने अनुयायियों को भी अपने ही जैसे चरित्र का ही मालिक बनाया — परिणाम आपने देखा आज के अमरीकी जन-जीवन में जहाँ 84 प्रतिशत जनता एवं 98 प्रतिशत सैनिक ईसाई हैं पर आप ईसाई समाज व्यवस्था की इस देन को आधुनिकता का नाम दे बैठते हैं क्योंकि उनका मायावी चरित्र आपके सामने उन्हें दया एवं सेवा की मूरत बनाकर पेश करता है। छः पीढ़ियों से ईसाई-अंग्रेज़ी शिक्षाव्यवस्था के अंतर्गत पली-बड़ी हिन्दूसंताने आज उन्हीं के जैसी बनती जा रही हैं और उनमें खोट निकालते समय आप यह भूल जाते हैं कि यह शिक्षा एवं समाज व्यवस्था उन पर जबरन लादी गई थी और इतने समय के बाद उसे यों ही उखाड़ फ़ेंकना आसान नहीं — जो शिकार बना उसे आप दोषी करार देते हैं क्योंकि वह बिचारा पलट कर जवाब नहीं दे सकता। जिन्होंने उन्हें बिगाड़ा उनकी ओर उँगली उठाने की न तो आपमें हिम्मत है, न ही स्वतंत्र सोच जो आपमें वह हिम्मत पैदा करे। आप भी उसी शिकारी के शिकार हैं जिसने उस शिकारी से केवल यही सीखा है कि बस अपनी गलतियाँ गिनते रहो और इसी हीन भावना के साथ जीते रहो। यदि आपने थोड़ी सी स्वतंत्र सोच पा भी ली तो वह बस इतनी धुंधली कि अपने को बेहतर मानते हुए बाकी के अपनों में ही खोट निकालते रहे, इसप्रकार उन्हें और भी अधिक हीन भावना से ग्रसित करते रहे।

एक विशेष योग्यता आप पाएँगे ईसाई इतिहासज्ञों में एवं ईसाई शिक्षा से प्रभावित लेखकों एवं रिपोर्टरों में। केवल आपको इतिहास में झाँकते रहना होगा एवं वर्तमान की घटनाओं पर विशेष नज़र डालते रहना होगा और सैंकड़ों उदाहरण अपने सामने पाएँगे। ये लोग नाटक के पात्रों को बदलने में बहुत माहिर बन चुके हैं। आप पाएँगे अनेक गढ़ी हुई कहानियाँ अतीत के ब्राह्मण वर्ग के बारे में। इन कल्पित कथाओं में आपको उन्हीं घटनाओं की झलक मिलेगी जो ईसाई पोप/पादरी सैंकड़ों वर्षों से वास्तव में करते रहे। उनको केवल इतना ही करना पड़ा कि अपने इतिहास में झाँका और उसी छवि में हिंदू इतिहास को फिर से लिख दिया। नवयुवकों नवयुवतियों ने उन्हें अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा (ऐतिहासिक उपन्यासों में भी पढ़ा) और उसी को सत्य जाना क्योंकि पिछले छः पीढ़ियों की ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा के दौर में ऐसे साहित्य की भरमार हो गई है। हमने उनकी नज़रों से अपने पुरखों को देखना और पहचानना सीखा। आज की मीडिया ने इस कला में विशेष दक्षता प्राप्त कर ली है। यदि आप कांची शंकराचार्य की गिरफ़्तारी के बाद अँग्रेज़ी मीडिया के द्वारा प्रकाशित समाचारों को देखेंगे तो आपको बहुत कुछ मिलता-जुलता देखने को मिलेगा। उदाहरण के लिए शंकराचार्य ने एक व्यक्ति की हत्या करवाई (विभिन्न पोप समय-समय पर यही करते रहे थे)। दूसरा उदाहरण - शंकराचार्य ने मठ में आने वाली स्त्रियों के साथ अनैतिक संबध रखे (पोपों एवं पादरिओं ने इस में बड़ी योग्यता प्राप्त कर ली थी)। शंकराचार्य को यह सब करने की आवश्यकता नहीं पड़ी होगी पर अँग्रेज़ी मीडिया को इस बात की विशेष आवश्यकता थी कि वे अपने मस्तिष्क पर ज़ोर डालें एवं कुछ नया खोज निकालें — उन्हें अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी — ईसाई धर्मगुरुओं के चरित्र के आधार पर हिंदू धर्मगुरुओं का चरित्र गढ़ डाला!

इतनी धनलोलुपता क्यों?

"वैटिकन शहर जहाँ पोप का निवास है उस शहर को 1929 से एक स्वतंत्र प्रभुसत्ता संपन्न राज्य की मान्यता मिली हुई है। विश्व में किसी भी अन्य धर्म संप्रदाय को यह अधिकार नहीं मिला हुआ है" Times Of India, 17 November 2004, Editorial
"इंग्लैंड, जर्मनी, स्विट्ज़र्लैंड एवं इटली में जो तहक़ीक़ातें की गई हैं उनसे यह ज्ञात हुआ है कि वैटिकन बहुत ही गहरे तौर पर विश्वव्यापी नशीली पदार्थों के अवैध व्यापार में सम्मिलित रही है। अनेक वर्षों से वैटिकन बैंक नशीली पदार्थों से संबंधित धन का लेन देन करती रही है। उनके संबंध नशीली पदार्थों के अवैध व्यापारियों के साथ बहुत घनिष्ठ रहे हैं। धर्म गुरु मार्किन्कस वैटिकन बैंक के सबसे बड़े अधिकारी हैं जो बैंक के प्रशासन का कार्य भार सँभालते हैं। अनेक देशों की पुलिस उनके पीछे पड़ी है। उन्हें बंदी नहीं बनाया जा सका क्योंकि वे वैटिकन से बाहर पाँव नहीं रखते" ISBN 81-85990-52-2 p.135

दूसरे देशों की पुलिस वैटिकन के अंदर घुस कर उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर सकती पोप की आज्ञा के बिना। पोप आज्ञा देते नहीं क्योंकि उनके आशीर्वाद के बिना धर्मगुरु मार्किन्कस ने यह अवैध धंधा आरंभ ही न किया होता। सोच कर देखिए इन नशीली पदार्थों को बढ़ावा देकर पोप हमारे किशोरों, नवयुवकों एवं नवयुवतियों को किस दिशा में ले जाने की चेष्टा कर रहे हैं? पोप के पश्चात कार्डिनल सर्वोच्च धर्माधिकारी हुआ करते हैं —

 "मई 1993 मेक्सिको के सर्वोच्च धर्माधिकारी कार्डिनल पोसादास-ओकाम्पो का गुआडलाजारा एयरपोर्ट पर कत्ल कर दिया गया। पुलिस तहकीकात के दौरान पता चला कि धर्माधिकारी कार्डिनल पोसादास-ओकाम्पो कोलम्बिया के कुख्यात ड्रग लॉर्ड (नशीली पदार्थों के व्यवसाय में एक अधिपति) पाबलो एस्कोबार के एजेंट के रूप में काम कर रहे थे। यह केवल एक झलकी थी। ऐसी अनेक कलंकित घटनाएँ हो चुकी हैं" ISBN 81-85990-52-2 p.135

नोबल पुरस्कार विजेता मदर टेरीसा का नाम लो तो छवि उभरती है मन में एक संत की जिसने योरप का सुख ऐश्वर्य त्याग कर अपना सारा जीवन न्योछावर कर दिया उनके लिए जिनकी सेवा करने वाला कोई भी न था — कहते हैं कि हिंदुओं ने अपने ही लोगों को सड़कों पर मरता छोड़ दिया — तब आविर्भाव हुआ एक ईसाई देवी का जिसने इन दुत्कारे हुए अनाथों को अपने गले लगाया, आश्रय दिया, सेवा की, स्वस्थ बनाया — पर क्या यही पूरी कहानी है — मृत्यु के उपरांत मदर टेरीसा के पत्र एवं उनकी व्यक्तिगत डायरियाँ सामने आयीं जिनमें वे लिखती हैं —

"मेरी मुस्कान एक बड़ा ढकोसला है। मुझे लगता है ईश्वर मुझे नहीं चाहता है"

ऐसा क्यों?

 "चार्ल्स कीटिंग जो कैलिफ़ोर्निया के जेल में सजा काट रहा है एवं रॉबर्ट मैक्सवेल जिसने आत्महत्या कर ली जब उसे ज्ञात हुआ कि स्कॉटलैंड यार्ड ने यथेष्ट प्रमाण जुटा लिए हैं और वह अब बच नहीं सकता। दोनों ने सैंकड़ों मिलियन डॉलर बेईमानी से कमाए थे साधारण लोगों को धोखा देकर। कैलिफ़ोर्निया के डेपुटि डिस्ट्रिक्ट ऐटॉर्नी पॉल टर्ले जिन्होंने सरकार की तरफ़ से मुकदमा चलाया था उन्होंने बताया कि कीटिंग ने 900 मिलियन डॉलर (43 रुपये के हिसाब से 38 अरब 70 करोड़ रुपये) से अधिक लूटे थे। उन्होंने यह भी लिखा कि ये सारे लोग जिनका पैसा डूबा वे सब अत्यंत साधारण आय वाले लोग थे जिन्हें इस प्रकर की धाँधलियों के बारे में ज्ञान नहीं था" ISBN 81-85990-52-2 p.140

 अब प्रश्न उठता है कि इस चोरी के धन से कीटिंग ने एक मिलियन डॉलर (4 करोड़ 30 लाख रुपये) से अधिक मदर टेरीसा को क्यों दिया और मदर टेरीसा ने उस धन का क्या किया?

"जब चार्ल्स कीटिंग पर मुकदमा चल रहा था तो मदर टेरीसा ने जज लान्स आइटो को लिखा कि कीटिंग सर्वदा ईश्वर के प्रिय ग़रीबों के प्रति दयालु एवं दानी रहा है। मदर टेरीसा ने जज से राज्यक्षमा की प्रार्थना करते हुए लिखा कि कीटिंग के हृदय में झाँक कर देखो और सोचो ईसा ने क्या किया होता ऐसी स्थिति में। मदर टेरीसा की इस प्रार्थना के उत्तर में डिस्ट्रिक्ट ऐटॉर्नी टर्ले ने मदर टेरीसा को लिखा कि यही चुनौती मैं आपको देता हूँ। आप अपने आप से पूछिए ईसा क्या करते ऐसी स्थिति में यदि अपराध के द्वारा कमाया हुआ यह धन उन्हें दिया जाता। वह अवश्य ही उस धन को उन्हें लौटा देते जिनका वह धन था। दूसरों का धन जो कीटिंग ने आप तक पहुँचाया उसे अपने पास न रखें। उन लोगों को लौटा दें जिनका धन चुराया गया। पर मदर टेरीसा ने उनकी इस प्रार्थना को नहीं स्वीकारा, न उसका कोई उत्तर दिया" ISBN 81-85990-52-2 p.140

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या बेईमानी के कमाए हुए वे 4 करोड़ 30 लाख कोलकाता के ग़रीबों पर ख़र्च हुए?

 "क्रिस्टोफ़र हिचेन्स अपनी प्रसिद्ध पुस्तक द मिशनरी पोज़ीशन में लिखते हैं कि मदर टेरीसा के अस्पताल को देखने जब भी विदेशी डॉक्टर आए, उन सभी ने वहाँ की चिकित्सा के ढंग को अत्यंत अनुपयुक्त बताया, विशेष कर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि इतना ढेर सारा पैसा उनके पास आता है, दान के रूप में इन्हीं लोगों की सेवा के लिए जबकि उसी धन का अपने आप के लिए पूरा उपयोग करते हुए मदर टेरीसा सर्वदा विश्व-स्तर की चिकित्सा का उपभोग करती रहीं। हिचेन्स का मानना है कि मदर टेरीसा की रुचि ग़रीबों को चिकित्सा देने में नहीं बल्कि लोगों को ईसाई बनाने एवं अपने लिए संत का ख़िताब हासिल करने में थी" Christopher Hitchens, editorial comments at www.amazon.com
"मदर टेरीसा के 'मरते हुए लोगों के घर' में किसी प्रकार की दवाई की व्यवस्था नहीं थीं। यहाँ तक कि मरते हुए लोगों को साधारण दवाइयाँ तक नहीं दी जाती थीं जिसके उनका दर्द कम हो सके। मदर टेरीसा के 'बच्चों को पालने के घर में' न तो कोई खिलौने होते थे न खेलने के लिए कोई स्थान। उनसे केवल कहा जाता था कि "प्रार्थना करो" ISBN 81-85990-52-2 p.138

इस प्रार्थना के बहाने बच्चों को बड़ी सहजता से ईसाई बनाया जाता रहा — क्या इसी उद्देश्य से वे बच्चों को रास्ते से उठा कर लाती थीं?

 "मदर टेरीसा अपने अंतर्राष्ट्रीय दानियों को यह बताना पसन्द करती हैं कि भारतवर्ष को आवश्यकता है ईसा की। हम देखते हैं कि पहले का यूगोस्लाविया, उत्तर आयरलैंड, दक्षिणी अफ़्रीका, रवांडा, ब्राज़ील, फ़िलिप्पाइन—इन सभी के पास ईसा हैं और काफ़ी समय से हैं पर ऐसा दिखता तो नहीं कि इससे उनके लिए कुछ अच्छा हुआ—न तो नैतिक दृष्टि से, न आध्यात्मिक दृष्टि से, न भौतिक दृष्टि से" ISBN 81-85990-21-2 p.122 notes

यह तो हुई बात उनके असली धंधे की जो था सेवाशुश्रूषा का मुखौटा पहन कर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करना। मुसलमानों का धर्मपरिवर्तन करने हिम्मत तो उनमें थी नहीं—जानती थीं उनका टिकट भारतवर्ष से ही नहीं बल्कि इस दुनिया से ही कट जाएगा—दरअसल कुछ लोग ऐसी ही भाषा समझते हैं। हिंदू धर्म ऐसा नहीं सिखाता और यह उचित भी है। ख़ैर अब चलें और देखें एक और उदाहरण धनलोलुपता की पराकाष्ठा की —

"एक छोटा सा देश है हायति—एक बहुत ही ग़रीब देश। उसके कुख्यात तानाशाह डुवालियर एवं उसकी पत्नी मिशेल जिन्होंने अनेक बिलियन डॉलर (खरबों रुपये) अपने देश से चुराए और वहाँ से भागकर स्पेन में जा बसे। इस तानाशाह ने विशाल जनसमूहों की हत्या की थी। इसके बावजूद मदर टेरीसा ने उनसे अनेक मिलियन (अनेक करोड़ रुपये) लिए और उनके ख़ूनी हाथों से अपने सम्मान में पदक भी लिए। इन सब के बदले में मदर टेरीसा ने डुवालियर के लिए राजनीतिक प्रचार हेतु एक फ़िल्म तैयार करने में सहायता की! इन घटनाओं का विवरण देते हुए श्री राजाराम पूछते हैं कि इन ईसाई धर्मदूतों—मदर टेरीसा से पैट रॉबर्टसन तक—ऐसा क्या है जो उन्हें बार-बार चोरों और डुवालियर, मोबुतु जैसे जनसमूहों के ख़ूनियों की ओर आकर्षित करता है? ISBN 81-85990-52-2 pp.140-141

वेश्याएँ अपने शरीर को बेचती हैं जिनमें से अनेक स्वेच्छा से यह नहीं करती हैं—या तो वे मजबूर होती हैं या फिर मजबूर कर दी जातीं हैं। दया एवं प्रेम की देवी मदर टेरीसा अपनी नाजायज़ ख्याति को बेचती हैं—चोरों एवं ख़ूनियों को—पर मजबूरी में नहीं बल्कि धन लोलुपता में! पोपों ने ऐसा किया, ईसाई संतों ने ऐसा किया, ईसाई धर्म गुरुओं ने ऐसा किया—उनके अनुयायी साधारण ईसाई क्या न करेंगे यदि मौक़ा मिला तो। जब मौक़ा मिलता है तो कर गुज़रते हैं पर ऊपर से बहुत ही सज्जन (जेन्टलमैन) दिखते हैं। उनकी इस दिखावटी सज्जनता के धोखे में न रहिए—बहुत पछताएँगे! ये लोग करते तो रत्ती भर हैं पर दिखाते पहाड़ हैं। इसके लिए ये मीडिया का सहारा लेते हैं। और मीडिया का चरित्र क्या है? एक वेश्या क्या करती है? अपने जिस्म को बेचती है। मीडिया क्या करती है? अपने जिस्म के हिस्सों को बेचती है। यदि यह समाचार पत्र है तो उसके काग़ज़ (जिस्म) पर जो ख़ाली जगहें हैं उन्हें बेचती है। यदि यह टीवी चैनेल है तो वह अपने ख़ाली समय (जिस्म) को बेचती है। इन्हें धन की अत्यंत आवश्यकता रहती है। धन के द्वारा इन्हें ख़रीदा व बेचा जा सकता है। उनके समाचार प्रकाशन या प्रसारण की नीतियाँ बेची एवं ख़रीदी जाती हैं। यह सत्य है अनेक अँग्रेज़ी समाचार पत्रों के लिए एवं उनके भारतीय भाषाओं में अन्य संस्करणों के लिए। कुछ हैं जो इस दायरे में नहीं आते हैं पर वे अल्प संख्यक हैं। ईसाई धर्म के प्रचारक एवं प्रसारक इस बात को बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। वे इस जानकारी का पूरा उपयोग (दुरुपयोग कहें तो बेहतर होगा) करते हैं। साधारण जनता न इस बात को जानती है न इसे महसूस करती है। वे मान बैठते है कि हर कोई यदि एक ही बात को छापता है तो यह सत्य ही होगा। ईसाई धर्म के प्रचार एवं प्रसार के लिए जो धन आता है वह अधिकांशतः गंदा होता है। उसी गंदगी का प्रयोग कर और गंदगी फैलाई जाती है। गंदगी गंदगी में घुलमिल जाती है और एक रंग बन जाती है। गंदगी को फैलने और फैलाने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि स्वच्छता का निर्मूलन कर दिया जाए। स्वच्छता को पूर्णतया उखाड़ फेंकना गंदगी के प्रसार के लिए अत्यंत आवश्यक हो जाता है। अंततः गंदगी स्वच्छता के साथ इस प्रकार घुलमिल जाती है कि स्वच्छता को स्वयं लगने लगता है कि वह गंदा हो चुका है। इस प्रकार स्वच्छता अपनी पहचान खो बैठता है। यही कहानी है हिंदू धर्म की जिसका आज ईसाई करण हो चुका है! चलिए अब जरा विषय को बदलें। इंग्लैड में बसे डॉ ऑरूप चैटर्जी अपनी ख्याति प्राप्त पुस्तक द फ़ाइनल वर्डिक्ट के प्राक्कथन में लिखते हैं

"मैं जन्मा, पला और बड़ा हुआ कोलकाता में। जहाँ तक हमें अपनी पिछली पीढ़ियों के बारे में ज्ञात है हमारा परिवार सदा से यहीं रहा। मैं कोलकाता को अच्छी तरह से जानता हूँ—अनेक ऐसे लोगों को भी जो वहाँ महत्व रखते हैं—उनसे भी अधिक संख्या में ऐसे लोगों को जो कोई महत्व नहीं रखते। कोलकाता ने ही बनाया है जो कुछ भी मैं हूँ और जैसा भी मैं हूँ। मेरी मातृभाषा बांग्ला है जो कोलकाता की भाषा है। काम चलाने के लायक हिंदी बोल लेता हूँ। हिंदी बोली जाती है बड़ी संख्या में कोलकाता के अनेक दीन-हीन व्यक्तियों के द्वारा। इंग्लैंड आने से पहले मदर टेरीसा में मेरी कोई भी रुचि नहीं थी। यहाँ के पश्चिम वासियों को चाहे कितना भी मुश्किल लगे यह समझने में कि मदर टेरीसा, अपने जीवन काल में कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति नहीं थीं, कोलकाता में—यह एक अजीब विरोधाभास है कि मरने के पश्चात उनकी छवि कोलकाता में महत्वपूर्ण ऊँचाइयों को छूने लगी है। इसका प्राथमिक कारण है वह भारतीय भावना जो पश्चिम की बड़े उत्साह से अनुकरण कराता है अनेक महत्व हीन विषयों पर। अपने कॉलेज के दिनों में कोलकाता के दीन-हीनों में मेरी कुछ रुचि रही थी जब मैं वामपंथी राजनीति में ऊपरी तौर से दिलचस्पी लिया करता था। मैंने मानव अधिकार से संबंधित विषयों में भी गहरी रुचि ली थी। कोलकाता के बहुत ही ग़रीब लोगों के साथ पारस्परिक क्रिया के दौरान कभी भी मेरी राहें मदर टेरीसा की संस्था के साथ नहीं टकराईं। वास्तव में मुझे याद तक नहीं आता कि किसी ने कभी भी मदर टेरीसा का नाम तक लिया हो!" The Final Verdict http://www.meteorbooks.com/introduction.html

क्या आप समझे कि मैंने क्यों इसका ज़िक्र किया? सोच कर देखिए—एक व्यक्ति जो कोलकाता में पला बड़ा, बहुत ही ग़रीब व्यक्तियों के संस्पर्श में रहा—उसने कभी भी किसी को भी मदर टेरीसा का नाम लेते हुए नहीं सुना—न तो मदर टेरीसा की संस्था को उनकी सहायता के लिए कभी भी आते देखा! यदि मदर टेरीसा ने कोलकाता के ग़रीबों के लिए कुछ किया होता, जो अपने आप में महत्वपूर्ण होता, तो क्या यह संभव था? मायावी व्यक्तित्व की विशेषता यह होती है कि जो दिखता है वह सत्य नहीं होता एवं जो दिखता नहीं है वही छुपा सत्य होता। यह गुण आसुरिक प्रकृति के व्यक्तियों में विशेषतः पाया जाता है—यह तो आप जानते ही होंगे! आइए अब जरा कुछ और प्रमाणों की ओर नज़र डालें —

लैंसेट विश्व का अग्रणी मेडिकल जर्नल है, उसके संपादक "डॉ रॉबिन कॉक्स ने लिखा कि मदर टेरीसा के अस्पताल अत्यंत अस्वास्थ्यकर हैं" ISBN 81-85990-52-2 p.138

आइए उसकी कुछ झलकियाँ देखें —

"मेरी ल्यूडन एक अँग्रेज़ जाँच करने वाली ने पाया कि सभी रोगी ज़मीन पर सोए हुए थे—एक कमरे के अंदर साठ। संक्रमित सुइयों का प्रयोग बार-बार किया जा रहा था केवल ठंडे पानी में धोकर। जहाँ रोगियों को छोटी सी शल्यचिकित्सा की आवश्यकता होती थी वहाँ उन्हें कोलकाता के दूसरे अस्पतालों में न भेजकर वहीं मरने दिया जाता रहा। यह स्थिति केवल रोगियों के साथ ही नहीं थी बल्कि वे जो रोगियों का कार्य करते थे—उन्हें भी संक्रमण से बचाने की चेष्टा नहीं की जाती थी। ऐन सेब्बा ने इस बात की तरफ़ इशारा किया है कि कई नर्सों को टीबी एवं संभवतः एड्स हो गई थी। इन सभी स्थितियों में एक ही उपचार बताया जाता था—चाहे रोगी की स्थिति कैसी भी हो—प्रार्थना! इसने टेरीसा की ईसा के प्रति श्रद्धालु स्त्री की छवि को बहुत बढ़ावा दिया। इसने उनके बैंक बैलेंस को भी काफ़ी बढ़ाया क्योंकि प्रार्थना के पैसे नहीं लगते! पर वे बड़ी सावधान रहती थीं अपने स्वास्थ्य के बारे में। जब भी उन्हें चिकित्सा की आवश्यकता होती वे बॉस्टन के मैसाच्युसेट्स जेनेरल जैसे विश्व के सर्वोत्कृष्ट हस्पतालों में अपनी शुस्रुषा करातीं। अपने अंतिम बीमारी के समय जब वह अमरीका सफ़र के योग्य न रहीं—तो टेरीसा गईं कोलकाता के प्रतिष्ठा संपन्न आर के बिरला हार्ट रिसर्च सेंटर के पास—जो कि एक हिंदू परोपकारी संस्था है। अब न ईसा आड़े आए न पैसा। पर जब उनके अस्पताल का गरीब मरता होता तो उसके लिए न तो पैसा होता न हिंदू अस्पताल। उसे मिलती केवल प्रार्थना (ईसा की) — ऐसी विस्मयकारी स्थिति को देखते हुए आपको लगेगा कि संभवत वे वही कर रहीं थीं जो उनके सामान्य आय के द्वारा संभव था। आपको बड़ा आश्चर्य होगा जब आप जानेंगे कि टेरीसा के मरनोपरांत ब्रॉन्क्स (न्यू यॉर्क) के एक बैंक के एक खाते में 50 मिलियन डॉलर (2 अरब 15 करोड़ रुपये) जमा पाए गए" ISBN 81-85990-52-2 pp.138-139

इसमें से एक कौड़ी भी कोलकाता के गरीबों पर न खर्चा गया जबकि वह पैसा आया था कोलकाता के उन्हीं गरीबों की चिकित्सा के लिए दान स्वरूप। उन्होंने यह धन भारतीय बैंकों में नही रखा—कहीं पोल खुल गई तो! इस आय पर उन्होने भारत सरकार को कर भी नहीं दिया—परोपकार के नाम पर। जमा करती गईं विदेश में सबकी नज़रों से ओझल। मृत्यु के उपरांत मदर टेरीसा के पत्र एवं उनकी व्यक्तिगत डायरियाँ सामने आयीं। वे लिखती हैं —

"मेरी मुस्कान एक बड़ा ढकोसला है। मुझे लगता है ईश्वर मुझे नहीं चाहता है"

क्या आश्चर्य हुआ आपको यह सुनकर? आश्चर्य न करें। वह मदर टेरीसा जो गरीबों और तड़पते हुओं को धोखा देकर अपना नाम और धन कमाए—उसे ईश्वर कैसे चाहेगा? मदर टेरीसा ने लिखा —

"मुझे लगता है ईश्वर, ईश्वर ही नहीं है"

 मरने के पहले सत्य को जाना उन्होंने। ईसाई धर्म के गॉड की छवि तो देखी ही है आपने इस पुस्तक के आरंभ मंें जहाँ हम पहले पोप के बारे में बातें कर रहे थे। क्या आपको लगता है ईश्वर ऐसा होता है—एक कसाई जैसा? जिस ईश्वर को मदर टेरीसा ने जीवन भर गॉड जाना, वह ईश्वर हो ही नहीं सकता, यह भी आगे चल कर उन्होंने समझा। स्वाभाविक है उन्हें लगा कि ईश्वर, ईश्वर ही नहीं है, अर्थात उन्होंने जाना कि ईसाइयों का ग़ॉड ईश्वर नही है। मदर टेरीसा ने लिखा—

"मुझे लगता है ईश्वर का अस्तित्व है ही नहीं" (1) The Daily Telegraph (2) IL Messeggero (3) PTI London 29 Nov, reported in Indian Express, Mumbai edition, 30 Nov 2002

उस ईश्वर का अस्तित्व हो ही नहीं सकता जिसके चरित्र का वर्णन बाइबल में है। मदर टेरीसा ने उसे ही जीवन भर ईश्वर जाना। स्वाभाविक है आगे चल कर उन्हें इस बात की अनुभूति हुई कि ऐसे कसाई जैसे ईश्वर का अस्तित्व हो ही नहीं सकता। इन सबके बावज़ूद उन्होंने इस सत्य को छुपाए रखा मरते दम तक। अपने पाप का प्रायश्चित्त जब न किया इस जीवन में तो स्वाभाविक है कि उन्हें लगे कि ईश्वर उन्हें नहीं चाहता। इसी लिए मदर टेरीसा ने लिखा—मुझे लगता है ईश्वर मुझे नहीं चाहता।

मानवता की सेवा का एक और चेहरा

यह सन 1823 की बात है। ईसाई-अँग्रेज़ों ने भारतवर्ष के ख़ून का कतरा-कतरा चूस लिया था। धरती पर जो कुछ भी उगा उसका बहुत बड़ा हिस्सा लगान के रूप में वसूल करते रहे वर्षों से, यहाँ तक कि किसानों को खाने के लिए लाले पड़ गए। जिनके के पास खाने को अन्न न रहा वे किसान धरती माता को क्या देते? ज़मीनें बंजर होती गईं। आसमान सूखा पड़ा रहा। न पानी था पीने को तो धरती को क्या सींचते? न अन्न था पेट भर खाने को तो धरती को खाद के रूप में उसकी ख़ुराक क्या देते? सुजलाम सुफलाम शस्य श्यामलाम न रही बंगाल की धरती, न उड़ीसा की। भीषण अकाल पड़ा था। पॉन्डिचेरी के महाधर्माध्यक्ष ने योरप में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को लिखा जो एक ईसाई प्रकाशन "भारतवर्ष एवं उसके मिशन" में प्रकाशित हुआ। उस प्रकाशन में एक अध्याय था जिसका शीर्षक था "अकाल और हैज़े के आध्यात्मिक लाभ"। ध्यान दीजिए - भारतवर्ष में पड़े अकाल एवं उस दौरान फैले हैज़े जैसे महामारी से जो लाभ ईसाई मिशनों को हुआ - इसका व्यौरा था यह। महाधर्माध्यक्ष ने लिखा कि —

"अकाल ने तो चमत्कार ही कर दिया। भूख से तड़पते नन्हे-नन्हे बच्चे चले आ रहें है थोक के भाव में इस स्वर्ग की ओर। हमारा यह अस्पताल बन गया है (ईसा के भावी अनुयाईओं के लिए) एक संचय स्थल। हमें जाकर उन्हें जबरन यहाँ लाना नहीं पड़ता। वे एक दूसरे को भेज देते हैं" Archbishop of Pondicherry wrote to his superiors in Europe, in a Catholic publication "India and its Missions" brought out in 1823, chapter "Spiritual Advantages of Famine and Cholera" quoted in Missionaries in India, Arun Shourie, New Delhi, 1994, p.16, reproduced in ISBN 81-85990-54-9, p.75

 क्या ख़ूब सोच है इनकी। लोग मर रहे हैं और ये ईसाई धर्माध्यक्ष उसका जश्न मना रहे हैं। उनको धर्म परिवर्तन कराने की चेष्टा नहीं करनी पड़ रही है। भूख से बिलबिलाते बच्चे चले आते हैं दो मुट्ठी अन्न के लिए। यह बन जाता एक मौक़ा उन शरीर एवं आत्मा के ख़रीददारों के लिए। ईसाई धर्म की पैदावार चाहे कहीं की भी हो—होते हैं वे सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे। उदाहरण के लिए प्रथम पोप थे ईटली के, संत फ़्रांसिस ज़ेवियर थे स्पेन के, पोप ऐलेक्ज़ैंडर 6ठे थे भी थे स्पेन के, पादरी हेनरी 3रे थे इंग्लैंड के, मदर टेरीसा थीं अलबानिया (अब मैसेडोनिया) की, पॉन्डिचेरी के महाधर्माध्यक्ष थे संभवत फ़्रांस के क्योंकि पॉन्डिजचेरी उन दिनों फ़्रांस के अधीन था। इसे अतीत मानकर भुला न दें — आज भी यही होता है — पर आपको दिखाया कुछ और ही जाता है। सन 2005 की घटना सुनिए सुनामी के दौरान —

 "वर्ल्डहेल्प (अर्थात विश्वसहायक) नामक एक अमरीकी संस्था इन्टरनेट पर लोगों से धन की माँग कर रही थी इस आश्वासन के साथ कि इस पूँजी से वे 300 अनाथ बच्चों को पाल कर बड़ा करेंगे ईसाई स्कूलों में। जब इन्डोनेशिया की मुस्लिम सरकार ने अनाथ बच्चों के धर्मान्तरण रोक लगा दी तो वर्ल्डहेल्प ने अनाथ बच्चों की सहायता का इरादा बदल दिया" Times of India, Mumbai edition, 19 January 2005, p.13

यदि आप हृदय से किसी की सहायता करना चाहते हैं तो अनेक रास्ते हैं। हाँ यदि सहायता करना आपका व्यवसाय है तो अलग बात है! ईसाई बनों तो हम तुम्हारी सहायता करने को तैयार हैं—यह है सोच ईसाइयों की—पर इसे वे अक्सर ज़ाहिर होने देना नहीं चाहते—इसे छुपाने के लिए वे बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। यदि ध्यान देंगे तो आपको स्वयं ही जान पड़ेगा उनकी कथनी और करनी के बीच कितना अंतर है। सन 2004 में, ईसा के जन्मदिन कृसमस के समय, जब सुनामी आया तो लोग बेघर हो गए। उनके पास कुछ न बचा। उन्हें तब आवश्यकता थी रोटी की, कपड़े की और सर छुपाने के लिए एक छत की —

"इंटरनैशनल बाइबल सोसाइटी, थाईलैंड की थाई भाषा में, एक लाख बाइबल बाँट रही थी" Times of India, Mumbai edition, 19 January 2005, p.13

 उन्होंने सोचा होगा इसी से सुनामी पीड़ितों का पेट भी भर जाएगा, तन भी ढक जाएगा और छत भी मिल जाएगी। मनुष्य जब कष्ट में होता है तो उन्हें यह एक अवसर के रूप में दिखता है—धर्मपरिवर्तन के लिए! अगले ही महीने जब अभिनेत्री परवीन बाबी मरीं तो उनके पड़ोसियों ने कहा न तो वह कभी घर से बाहर जातीं, न किसी को कभी अपने घर में बुलातीं, यहाँ तक कि उनकी लाश दो दिन तक घर पर सड़ती रही और किसी को कानों-कान खबर तक न थी। उनके मरने की ख़बर के साथ समाचार पत्रों में यह खबर भी छपी कि परवीन बाबी का कोई उत्तराधिकारी न था जो उनके विशाल संपत्ति का वारिस बन सकता था। अगले दिन तीन पादरी सफ़ेद चोगा और काली पट्टी पहन कर पहुँच गए —

"इस दावे के साथ कि मरने के पहले फ़ोन कर परवीन बाबी ने उन्हें बताया कि वह चाहती थीं कि उनका अंतिम संस्कार ईसाई धर्म के अनुसार हो" Times of India, Mumbai edition, 14 January 2005, p.1, p.2

 उनका स्वार्थ? इससे अंतिम संस्कार के पश्चात लावारिस धन पर दावा करने का मौका चर्च को मिल जाता। मज़े की बात यह है कि उनके पास कोई प्रमाण नहीं था कि परवीन बाबी कभी भी ईसाई बनीं। इसे पढ़कर मुझे अचानक याद आ गया कि—गिद्ध जब आकाश में मंडराता है तो उसकी नज़र हमेशा ज़मीन पर गड़ी होती है कि—कहीं कोई मरा हुआ चूहा दिख जाए तो वह तुरंत झपट्टा मारे!

यह दावा रहा है पोप का

"चर्च इस बात को स्पष्ट कर देना चाहता है कि ईसा एकमात्र मध्यस्थ हैं गॉड एवं मानव के बीच में एवं वही अकेले व्यक्ति हैं जो मानवता को मोक्ष दिला सकते हैं" Pope John Paul II, The Coming of the Third Millennium, quoted in ISBN 81-85990-60-3, p.147

पोप जॉन पॉल 2रे (जो अभी कुछ दिनों पहले गॉड को प्यारे हो गए)। पोप जॉन पॉल 2रे ने इस भारत भूमि पर आकर दावा किया था कि गॉड एवं मानव के मध्य एकमात्र मध्यस्थ हैं ईसा, और उनके बिना मानव को कभी मोक्ष नहीं मिल सकता। ईसाई गॉड के एकमात्र पुत्र होने का दावा करने वाले ईसा ने भी एक दावा किया था। वह यह कि जो भी ईसाई न बनेगा वह अनंत काल तक नर्क में सड़ता रहेगा। वह ग़ॉड तो हिंदू का ईश्वर नहीं हो सकता है। हमारा ईश्वर तो कहता है कि हर कोई मुझ तक पहुँच सकता है, बिना किसी मध्यस्थ, अर्थात बिना किसी दलाल के, यदि उसमें इतनी गहरी चाहत हो मेरे प्रति। तो किस आधार पर लोग कहते हैं कि ईसाई का गॉड और हिंदू का ईश्वर एक है?

लगता है वे हिंदू के ईश्वर को तो थोड़ा-बहुत जानते हैं पर ईसाई के गॉड की उन्हें जरा भी पहचान नहीं। अन्यों को गलत राह दिखाने के पहले इन्हें अपनी समझ को सुधारना होगा। अन्यथा वे उस पाप के भागी बनेंगे जिसकी उन्होंने कल्पना भी न की होगी। अब चलें फिर से पोप के उस दावे की तरफ़—ईश्वर एवं मानव के मध्य एकमात्र मध्यस्थ हैं ईसा और उनके बिना मानव को मोक्ष नहीं मिल सकता।

इससे कुछ प्रश्न उठते हैं मेरे मन में। ईसा को पैदा हुए मात्र दो हज़ार वर्ष हुए। यदि मानव एवं ईश्वर के बीच कोई मध्यस्थता (दलाली) नहीं कर सकता एक ईसा के सिवा, तो ईसा के पहले जन्में सभी मानव अब भी नर्क में सड़ रहे होंगे? क्या ईसा के उस काल्पनिक नर्क में इतनी सारी जगह भी है? या ईसा के गॉड के पास नर्क में जगह की कमी पड़ गई? क्या इसी लिए उन्होंने ईसा को भेज दिया धरती पर यह कह कर—जाओ मेरे एक मात्र पुत्र—जाओ उस धरती पर जहाँ से पिछले लाखों वर्षों के दौरान जन्में मानवों ने मेरे इस नरक में जरा भी जगह न छोड़ी कि मैं आज के मानवों को यहाँ लाकर सड़ा सकूँ। इस कारण मैं तुम्हें, एवं केवल तुम्हें, अपना एक मात्र दलाल नियुक्त करता हूँ। जाओ जाकर लोगों को धड़ाधड़ ईसाई बनाओ ताकि उन्हें मैं उस स्वर्ग में जगह दे सकूँ जो लाखों वर्षों से खाली पड़ा है। एक मैं ही यहाँ अकेला पड़ा-पड़ा बोर होता रहता हूँ। आखिर मुझे भी तो कुछ संगी साथी चाहिए। मैं कब अकेला रह सकता हूँ? जाओ जाकर लोगों के साथ मोल-तोल करो और येन-केन-प्रकारेण उन्हें ईसाई बनाओ। जब सीधी उंगली से घी न निकले तो टेढ़ी उंगली से घी निकालो। चाहे तुम्हारे रास्ते ज़ायज हों या नाजायज पर बनाओ उन्हें ईसाई—छुड़ाओ उन्हें इस नारकीय धर्म हिंदू धर्म से—ले आओ उन्हें मेरे इस स्वर्ग में। जरा सोच कर देखिए यह ईसाई गॉड हमारी कितनी परवाह करता है—वह हमें अपने स्वर्ग में स्थान देने के लिए तड़प रहा है और हम हैं कि बस हिंदू बने रहना चाहते हैं—क्या हमारा कोई कर्तव्य नहीं उस ईसाई गॉड के प्रति जो हमें इतना अच्छा प्रलोभन दे रहा है! ऐसा प्रतीत होता है कि पोप ने मोक्ष को एक व्यापार बना दिया है। ख़रीददार है मानव मोक्ष का। बेचने वाला है ईसाई गॉड। एक दलाल की आवश्यकता है जो दोनों को मिला सके। गॉड ने निर्णय किया कि मुझे केवल एक ही दलाल चाहिए। पचीसों दलालों के साथ मोलतोल करने का समय नहीं है मेरे पास। मेरी पसंद का एकमात्र दलाल है ईसा! यह दलाली की प्रवृत्ति ईसा के अनुयायिओं में इतनी फ़ैल चुकी है कि उनके लिए जीवन का हर पहलू दलाली बन कर रह गया है। सोच कर देखेंगे तो आपको अनेक उदाहरण मिलेंगे। यदि ईश्वर एवं गॉड एक ही हैं तो प्रश्न उठता है—क्या पोप को ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव है? यदि हाँ तो उन्हें सत्य का ज्ञान तो होगा ही? तब उन्होंने ईश्वर के नाम पर यह असत्य कैसे कहा कि ईसा के सिवा कोई मानव को मोक्ष नहीं दिला सकता? और यदि उन्हें ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं है तो उन्हें सत्य का ज्ञान ही न होगा! तब उन्होंने किस आधार पर यह दावा किया कि ईसा एकमात्र मध्यस्थ एवं एकमात्र मोक्ष दाता हैं? अनेक हिंदू धर्म गुरु यह कहते नहीं थकते हैं कि सभी धर्म समान हैं। मोहनदास करमचंद गांधी ने मरते दम तक यह भ्रम न ही अपने मन में पाला बल्कि करोड़ों हिंदूओं को भ्रमित किया।

कई टीवी गुरु, जो टीवी चैनलों का समय भाड़े पर लेकर, अपना ज्ञान समुद्र उड़ेंलते रहते हैं—ये बार-बार अपने दर्शकों को यह याद दिलाते रहते हैं कि सदगुरु (अर्थात उनके) बिना ईश्वर प्राप्ति संभव नहीं और यदा-कदा वे ईसा की महानता का बखान भी कर देते हैं पर सर्वदा यह बताना अवश्य भूल जाते हैं कि ईसा ने स्पष्ट कर दिया था कि कोई सदगुरू तुम्हें गॉड तक नहीं पहुँचा सकता। ईसा की बड़ाई करते समय यदि यह बात वे अपने दर्शकों को बता देते हैं तो उनके दर्शक उन्हें ताक पर रख कर ईसा की सेवा में पहुँच जाएंगे—इसी लिए वे यह बात बताना भूल जाते हैं! ये सब टीवी गुरू भी ईसाई शिक्षा पद्धति की पैदावार हैं—उस शिक्षा का ऐसा प्रभाव कि आपके ये सभी दिग्दर्शक भी स्वयं भ्रमित हो जाते हैं।

क्या आपको लगता है कि ये सब पोप एवं ईसाई संत जिनके चरित्रों की झलक आपने देखीं—क्या वे सब इस योग्य भी हैं कि आपको मोक्ष दिलाएँ? हाँ वे आपको अपने जैसा अवश्य बना सकते हैं! चाहें तो आप उनकी संगत में उनके जैसे दुश्चरित्र बनें। न तो वे मोक्ष के अधिकारी हैं न आप बनेंगे।

हिंदू विवाह होता है सात फ़ेरे पूरे कर। ईसाई-अग्रेज़ी शिक्षा पद्धति का आरंभ हुआ सन 1835 में। 30 वर्ष में एक नई पीढ़ी तैयार हो जाती है। 1835 से 2005 तक कोई 170 वर्ष हुए। 10 वर्ष और हैं 180 वर्ष पूरे होने में। 180 वर्ष का अर्थ होगा 6 पीढ़ीयाँ जिसके अंतिम चरण की ओर बढ़ रहे हैं हम तेजी से। उसके पश्चात एक और पीढ़ी के गुजरने की देरी रहेगी। तब होंगीं सात पीढ़ीयाँ पूरी। ईसाई शिक्षा पद्धति की सातवीं पीढ़ी। तब नाम हिदू होंगे, सोच ईसाई होगी, चरित्र ईसाई होगा। चेष्टा करें यदि आने वाली पीढ़ी को बचा सकें। अपने संतानों के हितों की रक्षा भी तो आप ही का दायित्व है!

संदर्भ सूची (Bibliography)

आइ-एस-बी-एन (अंतर्राष्ट्रीय मानक पुस्तक क्रमांक ISBN) विश्वभर में प्रकाशित पुस्तकों की अद्वितीय पहचान — इनका सतत प्रयोग यहाँ पायेंगे  

ISBN 81-89746-08-1 [2005] Maanoj Rakhit, Popes, Saints, Cardinals, Archbishops, Bishops—their real-life conducts

ISBN 81-89746-07-3 [2004] Maanoj Rakhit,  Do your history books tell you these facts? or, ISBN 978-81-89990-15-2 [2008] Maanoj Rakhit, Seed-2

ISBN 0-8400-3625-4 [Belgium, Europe, 1996] King James Version, Holy Bible

ISBN 0-14-100437-1 [2000] F Max Muller, INDIA what can it teach us?

ISBN 019-565432-3 [2001] The New Oxford Dictionary of English

ISBN 81-85990-21-2 [1995] Ishwar Sharan, The Myth of Saint Thomas and the Mylapore Shiva Temple

ISBN 81-85990-46-8 [1997] Matilda Joslyn Gage, Woman, Church and State—a historical account of the status of woman through the Christian ages with reminiscences of the matriarchate

ISBN 81-85990-52-2 [1998] N S Rajaram, A Hindu View of the World—Essays in the intellectual Kshatriya Tradition

ISBN 81-85990-54-9 [1998] Sita Ram Goel, Pseudo-Secularism, Christian Missions and Hindu Resistance

ISBN 81-85990-60-3 [2000] David Frawley (Vamadeva Shastri), How I became a Hindu—my Discovery of the Vedic Dharma

Hindu Voice, Mumbai

http://www.meteorbooks.com/introduction.html, Dr. Aroup Chatterji, Mother Teresa—The Final Verdict

इस पुस्तक को लिखने के पीछे मेरा एक ही उद्देश्य है कि आप सत्य को जानें, परखें तथा अपने निर्णय स्वयं लें।

इस कृति का कृतिस्वाम्य मानवता के नाम — आप इसे यथावत प्रकाशित कर सकते हैं — निःशुल्क/सशुल्क वितरित कर सकते हैं — समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में छाप सकते हैं — प्रूफ़रीडिंग पर विशेष ध्यान दें कारण आपके द्वारा टाइपिंग में गलतियों के दायी आप होंगे — प्रकाशक तथा मुद्रणालय का पूरा पता दर्शाये बिना प्रकाशन अवैध होगा — एक प्रति मुझे भेजना न भूलें।

48 वर्ष की उम्र में कार्य निवृत हो कर मैंने एकांत की शरण ली। अब मैं अपना सारा समय शोध, लेखन, प्रकाशन तथा पुस्तक वितरण हेतु खर्च करता हूँ। अपने जीवीकोपार्जन के लिए कार्य करना वर्षों पहले छोड़ दिया — इस कारण मेरे साधन सीमित हैं। उपलब्ध साधन जब तक साथ देंगे तब तक ये पुस्तकें छपकर आप लोगों तक पहुँचती रहेंगी।

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कई वर्ष पहले जब यह पुस्तिका लिखी गई थी, उन दिनों यूनिकोड का प्रचलन नहीं था। इस कारण तब TTF ट्रूटाइप फ़ॉन्ट्स का प्रयोग किया गया था। अब उन अक्षरों का OTF (ओपन टाइप फ़ॉन्ट्स) यूनिकोड में रूपांतर एक सॉफ़्टवेयर द्वारा किया गया है। यह ग्यारह हज़ार की सॉफ़्टवेयर अच्छा काम करती है पर सभी सॉफ़्टवेयरों की अपनी-अपनी सीमायें होती हैं। अतः कतिपय गलतियों की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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