कुरआन अपने अनुयायियों को क्या सिखाता है?

बेशक, चैन की नींद सोते रहें, तब तक, जब तक खतरा, आप के दरवाजे पर दस्तक नहीं देता 
पर आज आपकी यह नींद, बड़ी भारी पड़ेगी, कल आने वाली आपकी संतानों पर

अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मानक संख्या ISBN 978-81-89746-14-8 / 81-89746-14-6 प्रकाशित 10 दिसंबर 2005

पाठकों की प्रतिकृयायें

शास्त्री माधवप्रियदास, स्वामीनारायण गुरुकुल, राजकोट, गुजरात, 19 जनवरी 2006
"यह पुस्तिका आँखों को खोलने वाली है। कुरआन की ये निष्ठुर बातें बड़ी दुःखद एवं आश्चर्यकर हैं। इस पुस्तिका को पढ़ कर अन्तर में भारी व्यथा हो रही है कि क्या कोई धर्म अपने अनुयायी को इस हद तक क्रूर एवं निष्ठुर बना सकता है? और बनाता है तो क्या वह धर्म है?"
श्री रवि कान्त खरे (बाबाजी), लखनऊ, उ प्र, 20 दिसम्बर 2005  
"आपका प्रयास सराहनीय है। यह क्रम चलता रहना चाहिए। सारांश में सभी जानने योग्य बातें इस पुस्तिका में आ गई हैं। बहुत से हिन्दू विद्वान तो इन बातों से अवगत हैं, किन्तु सामान्य हिन्दू जनता इन बातों से अनभिज्ञ है। इस तरह की पुस्तक गाँवों में भी पहुँचनी चाहिए। ... भगवान आप को शक्ति दें, स्वस्थ रखें और शतायु करें। आप इसी तरह समाज को कुछ देते रहें।"
गौरव शिंदे, इयत्ता 9, निगडी, पुणे, 13 मार्च 2006
"मनोज दादाजी, मैं गौरव शिंदे, इयत्ता 9वी में पढ़ता हूँ। मैंने आपकी पूस्तीका पढ़ी है। उसका नाम है "इस्लाम अपने अनुयायियों को क्या सिखाता है? और उसे जानना हिन्दुओं को कितना आवश्यक है"। यह इस पुस्तक का 3रा भाग है। यह पढ कर मुझे बहुत अच्छा लगा यह तिसरा भाग पढ कर मुझे इतना अच्छा लगा तो न जाने पहला और दुसरा पढने के बाद कितना अच्छा लगे। अभी ऐसे किताब लिखने में कोई धैर्य नहीं दिखाता। आप पर मुझे नाज़ है। मुझे ऐसे और किताब पढ़ने का इच्छा है। क्योंकी, मैं मेरे राष्ट्र के लिए कुछ करना चाहता हूँ। आपने ही धर्म के लोग हमारे धर्म के बारे में भूल गए है आपने इसकी (जाणीव) कराके दी है। मुझे पत्र लिखने नहीं आता है। यह मैं पहली बार आपको ही पत्र लिख रहा हूँ। भाषा में कुछ गलतियाँ हो तो माफ किजीए।"

इयत्ता 9 = छात्र कक्षा 9 एवं जाणीव = ज्ञान, बोध।
आज हमें आवश्यकता है नई पीढ़ी के इन जागरूक बच्चों की जो बनेंगे नव-भारत के निर्माता। इन्हें राह दिखाना एवं सत्य से अवगत कराना हमारा कर्तव्य है। हम यदि चूकें अपने दायित्व से तो उन्हें दोष देने का अधिकार हम खो बैठेंगे। हमें पहले अपना कर्तव्य निभाना है और फिर उनसे कोई आशा करनी है — लेखक

श्री भूपेन्द्र प्रसाद सिंह (व्याख्याता), पूर्णियाँ, बिहार, जनवरी 2006
"इस्लाम अपने अनुयायियों को क्या सिखाता है" एवं "यदि सत्य का ज्ञान होता आपको" सौ बार से अधिक ही पढ़ा है। पर मन नहीं भरा है। जिज्ञासा शांत नहीं हो रही है; और बढ़ती ही जा रही है। इस मन को कैसे बुझाऊँ, यह समझ में नहीं आ रहा है। हे हिन्दू धर्म विशारद! तेरा कल्याण हो! भगवद सिर्फ़ आपका ही नहीं वरन आपके सम्पूर्ण सहयोगी के समस्त परिवार का कल्याण करें। धन्यवाद! ऐसे धर्मद्रष्टा का। निस्संदेह आप पूज्यतम पवित्रतम एवं पुण्यतम हिन्दू-पुत्र हैं, जिन्होने हिन्दुओं को अगाह करते हुए चेताया है कि - ऐ हिन्दुओं! समय रहते जागो, पहचानो अपने धर्म को; अपने कर्म को; और अपने आचरण को, वरना तेरा सत्यानाश अवश्यम भावी है। सामने खतरा मंडरा रहा है। भोले-भाले हिन्दुओं को इन राजनीतिक दलों ने झूठे लुभावने बातों से खंड-खंड बाँट दिया है; जिसका परिणाम - गोदरा - कश्मीरी हिन्दुओं का वध एवं बंगलादेश तथा पाकिस्तान में हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन है। मान्यवर! धन्य हैं वो पिता जिनके आप पुत्र हैं। सचमुच कितनी भाग्यशालिनी है प्रातः स्मरणीय वो माता जिन्होंने आपके जैसा पुत्र को जन्म देने का गौरव प्राप्त किया है। वैसा पुत्र जिन्होने सम्पूर्ण हिन्दुसमाज को वास्तविक सत्यता से साक्षातकार करवाया है। महोदय! मनुष्य अपना चेहरा स्वयं नहीं देखता, उसे देखने के लिए दर्पण की आवश्यकता पड़ती है। अतएव आपको कोटिशः प्रणाम और प्रभु आपको ऐसी प्रेरणा देते रहें ताकि आप हमें वास्तविकता से साक्षातकार करवाते रहें।"

संदर्भ

कुरआन को आप अधिकांशतः कुरान के नाम से जानते हैं। मेरे पास दो कुरान हैं और दोनों पर कुरआन मजीद लिखा हुआ है। इसका अर्थ हुआ सही उच्चारण कुरआन है। अतः हम कुरआन शब्द का ही प्रयोग करेंगे, प्रचलित शब्द कुरान का नहीं।

इस छोटी सी पुस्तिका में हम उद्धरण देंगे मुख्यतः तीन पुस्तकों से जिनके बारे में आपको थोड़ा सा परिचय देना यहाँ उचित जान पड़ता है क्योंकि कुछ पाठक जानना चाहेंगे कि मैं जो कुछ भी कह रहा हूँ उसका आधार क्या है?

पहली कुरआन मजीद बारह सौ पचास पृष्ठों की है एवं इसके प्रकाशक दरिया गंज, नई दिल्ली के मकतबा अल-हसनात (रामपुर वाले) हैं तथा इसका ISBN (अंतर्राष्ट्रीय मानक पुस्तक क्रमांक 81-86632-00-X (संस्करण 2003) है। इसमें अरबी मूल ग्रंथ सहित हिंदी व अँग्रेज़ी अनुवाद दिए हुए हैं। हिंदी अनुवाद मुहम्मद फ़ारुक खाँ के एवं अँग्रेज़ी अनुवाद मु. मा. पिक्थाल के।

दूसरी कुरआन मजीद है छः सौ बारह पृष्ठों की। इसमें अरबी के साथ-साथ हिंदी अनुवाद भी दिए गए हैं। अनुवादक हैं नागपुर के हज़रत मौलाना अब्दुल करीम पारेख साहब। प्रकाशक हैं लाल कुआँ दिल्ली के Educational Publishing House और नागपुर के India Religious Book Centre.

इसके अलावा एक बहुत ही महत्व पूर्ण पुस्तक है The Calcutta Quran Petition जिसका संकलन एवं संपादन किया है स्वर्गीय श्री सीता राम गोयल ने। इस तीन सौ पचीस पृष्ठों की पुस्तक का प्रकाशन किया है नई दिल्ली की Voice of India ने (ISBN है 81-85990-58-1), संशोधित एवं परिवर्धित तीसरा संस्करण 1999 । स्वर्गीय सीता राम जी की एक विशेषता यह थी कि वे कई भाषाओं के ज्ञाता थे एवं उन्हें दूसरों के द्वारा किये गए अनुवादों पर निर्भरशील रहने की आवश्यकता नहीं हुआ करती थी। सबसे बड़ी बात उनमें यह थी कि वे हिंदुओं के हितों के प्रति सदा सजग रहा करते थे। इस कारण मैं उनकी पुस्तकों को बड़ा महत्व देता हूँ।

हिंदी में, कुरआन के, जो अनुवाद आजकल के संस्करणों में आ रहे हैं, वे बहुधा कठोर भाव को बखूबी छुपा जाते हैं -- या फिर हिंदी लिपि में कठिन उर्दू शब्दों की इतनी भरमार कर देते हैं कि, अर्थ एवं भाव, दोनों जाने कहाँ खो जाते हैं। ये सब हिंदी अनुवाद इस्लाम के बन्दों के लिए नहीं होते। वे तो उर्दू की लिपि में अनुवाद पढ़ते हैं, या फिर अरबी मूल को पढ़ते हैं -- उनमें क्या लिखा होता है, वह न आपको मालूम पड़ता है, न मुझे। अतः मैं अँग्रेज़ी में उपलब्ध अनुवादों को अधिक महत्व देता हूँ क्योंकि मेरे पास विभिन्न लेखकों की सामग्री है एवं वे सभी लगभग एक ही बात कहते हैं, शब्दों के थोड़े हेर-फेर के साथ।

आजकल एक नई हवा चल पड़ी है -- बहुधा अँग्रेज़ी समाचार पत्रों में, या उनके प्रांतीय भाषाओं के संस्करणों में, लेखों के द्वारा यह छवि आँकने की चेष्टा की जाती है कि इस्लाम अमन-चैन का मज़हब है। जो कुरआन की वास्तविकता से अनभिज्ञ हैं वे इस बात को सच मान बैठते हैं। इस पुस्तक के द्वारा, हम आपका परिचय करायेंगे, कुरआन की उन शिक्षाओं से, जिनके बारे में जानना, हम हिंदुओं के लिए अत्यंत आवश्यक है।

अँग्रेज़ी में उपलब्ध उद्धरणों (quotes) को आधार के रूप में लेकर, हिंदी में उनके शाब्दिक अर्थ एवं भावार्थ को, मैं अपने शब्दों में, सहज ढंग से आप के समक्ष प्रस्तुत करूँगा।

मेरा उद्देश्य है कि आप विषय को सहजता के साथ समझें ताकि उसकी प्रासंगिकता को, अपने जीवन एवं अपने परिवार के संदर्भ में रख कर, देख सकें।

जहाँ मैं इन उद्धरणों को प्रस्तुत करूँगा वहाँ यह भी बताऊँगा कि उन्हें किस प्रकाशित पुस्तक से लिया गया है, ताकि आप चाहें तो स्वयं, इनकी पुष्टि कर सकें।

भगवद्गीता में जैसे अध्याय, श्लोक होते हैं, वैसे ही कुरआन में सूरा एवं आयत हुआ करते हैं। प्रथम उदाहरण में सूरा 4 अन-निसा आयत 56 का अर्थ होगा (हमारी पद्धति से) अध्याय-4 शीर्षक अन-निसा श्लोक-56

अल्लाह का पैगाम, पैगंबर के नाम

कुरआन सूरा 4 अन-निसा आयत 56 -
"वे जो अल्लाह के आदेश को नहीं मानते हैं, हम उन्हें आग में झोंक देंगे और जब उनकी चमड़ी पिघल जाए तो हम उनकी जगह नई चमड़ियाँ डाल देंगे ताकि उन्हें स्वाद मिले यंत्रणा का। अल्लाह सबसे अधिक शक्तिमान हैं एवं विवेक पूर्ण हैं"
स्रोत - कुरआन मजीद पृष्ठ 231
मदीना में उतरी मुहम्मद के नाम अल्लाह का पैगाम

जैसे हम हिंदू वेदों को अपौरुषेय, ईश्वरीय रचना मानते हैं, उसी प्रकार मुसलमान कुरआन को अपौरुषेय, अल्लाह का पैगाम, मानते हैं। उसमें जो कुछ भी लिखा है, उसे अल्लाह का आदेश मान, उसका अक्षरशः पालन करना, प्रत्येक मुसलमान अपना प्रमुख कर्तव्य मानता है।

अल्लाह एवं पैगंबर के निर्णय का विरोध करने का हक किसी मुसलमान को नहीं

कुरआन सूरा 33 अल-अहज़ाब आयत 36 -
"जब अल्लाह एवं उसके पैगंबर ने निर्णय कर लिया है, किसी भी बात पर, तो किसी मुसलमान मर्द या औरत को यह हक नहीं, कि वह उस बारे में, कुछ भी कह सके"
स्रोत - कुरआन मजीद पृष्ठ 752
मदीना में उतरी मुहम्मद के नाम अल्लाह का पैगाम

अल्लाह के आदेश को कौन नहीं मानता? वह जो इस्लाम को अपनाने से इंकार करता है। इस्लाम को अपनाने से इंकार कौन करता है? वह जो अपने आप को हिंदू कहता है। उस बुतपरस्त काफ़िर का अंजाम क्या होगा? वही जो मंज़ूरे खुदा होगा। और खुदा का पैगाम क्या है? जिंदा झोंक दो उन्हें आग की लपटों में। चखने दो उन्हें स्वाद अल्लाह की सत्ता को न स्वीकारने का। किसी मुसलमान को हक नहीं कि वह इसका विरोध करे। क्या मुसलमानों ने अल्लाह के इस आदेश का पालन किया? बेशक किया, और बखूबी किया। इतिहास गवाह है। पर आपको तो वह इतिहास स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाया ही नहीं जाता तो आप उसे जानेंगे कैसे? मैं परिचय कराऊँगा आपकी उस इतिहास से जिसे बड़ी खूबी के साथ आपसे छुपा कर रखा गया है और आपको उसका उल्टा पढ़ाया जाता रहा है।

हिन्दुओं में आत्मग्लानि का प्रसार न करें

हम हिंदू तो ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा के प्रभाव में अपने धर्म के प्रति उदासीन हो चुके हैं, एवं होते जा रहे हैं, पर मुसलमानों ने ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा को सर्वदा शक की नज़रों से देखा है, इस कारण उन्होंने आज भी अपनी पहचान बनाये रखी है। इसके लिए न तो हमें मुसलमानों की वाह-वाही करनी चाहिए, न ही हमें हिन्दुओं में आत्मग्लानि का प्रसार करना चाहिए। हममें से जो अपने आपको बड़ा विज्ञ मानते हैं, ऐसी चेष्टा करते हुए अक्सर पाये जाते हैं। उन्हें इस बात अहसास तक नहीं होता कि ऐसा करके वे केवल अपने हिंदुओं का ही नुकसान कर रहे हैं। अपने आपको बड़ा विज्ञ मानते हुए, हिन्दू व्यक्तित्व की संरचना को न समझते हुए, एवं हिन्दू इतिहास की बारीकियों से अनभिज्ञ, ये अपने-आपको ज्ञानी और गुणी मानने वाले, अपने ही भाई-बन्दों के प्रति तिरस्कार की भावना रखते हुए, अपने ही अनजाने में हिन्दुओं के प्रति शत्रुवत व्यवहार करते हैं, और यह मानकर चलते हैं कि वे इस प्रकार हिन्दुओं का भला कर रहे हैं।

क्या होगा उसका जिसने अल्लाह को न स्वीकारा?

कुरआन सूरा 69 अल-हाक्का आयत 30-33 -
"उसे पकड़ो और उसे बाँधो। जलाओ उसको नर्क की आग में और उसके बाद बाँधो उसे एक जंजीर से, जो हो सत्तर क्युबिट लंबा, क्योंकि उसने अल्लाह को नहीं स्वीकारा, जो हैं सबसे ऊपर"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 257

अंजाम स्पष्ट है पर आप नहीं मानेंगे क्योंकि आपकी समझ से आज जमाना बदल चुका है। क्या सब कुछ सचमुच बदला है, या केवल ऊपरी तौर पर दिखावे के लिए? आप तो भोले हैं, जो दिखता है उसी पर विश्वास कर लेते हैं। सोचते नहीं कि दिखता वो है जो दिखाया जाता है। और आज की दुनिया में दिखाया वो जाता है जो आम तौर पर स्वीकार्य होता है। और स्वीकार्य वही होता है जिसकी हवा चल रही होती है।

आज जमाना मीडिया का है। मीडिया जो कुछ आपको दिखाती है टी-वी के जरिए, या फिर पढ़ाती है समाचार पत्रों के द्वारा, आपकी सोच उसी साँचे में ढलती जाती है। मीडिया आपको क्या दिखाती है या फिर क्या पढ़ाती है, यह निर्भर करता है बागडोर किसके हाथ में है। मीडिया की बागडोर उसके हाथ में होती है जिसके पास बेशुमार धन होता है। वह धन चाहे किसी भी रास्ते से कमाया गया क्यों न हो। यदि गलत रास्ते से कमाया गया होता है तो उसकी उपज आपकी सोच को गलत राहों की ओर, आपके अनजाने में ही ले जाती हैं।

आज जमाना अँग्रेज़ी शिक्षा का भी है। यह शिक्षा आपको जो भी सिखाती है आपकी पाठ्य पुस्तकों के द्वारा, आपकी सोच उसी साँचे में ढलती जाती है। शिक्षा आपको क्या सिखाती है या फिर क्या पढ़ाती है, यह निर्भर करता है बागडोर किसके हाथ में है। शिक्षा की बागडोर उसीके हाथ में होती है जिसके पास सत्ता होती है। वह सत्ता चाहे किसी भी रास्ते से हासिल की गई क्यों न हो। यदि सत्ता गलत रास्ते से हासिल की गई होती है तो उसकी अपनाई हुई शिक्षा पद्धति आपकी सोच को गलत राहों की ओर, आपके अनजाने में ही ले जाती हैं।

आपकी खातिरदारी के लिए क्या व्यवस्था है कुरआन में?

कुरआन सूरा 22 अल-हज़्ज़ आयत 19-22 -
"आग के परिधान (वस्त्र) बनाये गए हैं उनके लिए जो इस्लाम को नहीं अपनाते। उबलता हुआ पानी उनके सर पर डाला जायेगा ताकि उनकी चमड़ी भी पिघल जाए और वह सब भी पिघल जाए जो उनके पेट में है (अँतड़ियाँ भी)। उन पर कोड़े - आग में तपते हुए लाल लोहे के कोड़े - बरसाये जाएँ"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 266

हिंदुओं! क्या आप देख रहे हैं कि आपकी खातिरदारी की काफ़ी व्यवस्था है कुरआन में। पर मुसलमान चुप हैं क्योंकि आज हवा इस्लाम के खिलाफ़ चल रही है। उनका समय आने दीजिए और फिर खेल देखिए। जब से ईसाइयों की दुनिया पर सीधा हमला किया मुसलमानों ने, मीडिया का इस्तेमाल कर अमरीका ने बड़ी हाय-तोबा मचा रखी है। अब तो ईसाइयों का क्रूसेड और मुसलमानों का ज़िहाद चल रहा है, पर ईसाइयों की दुनिया अब बहुत चालाक हो गई है। 9/11 के तुरंत बाद प्रेसिडेंट बुश के मुँह से निकल गया था क्रूसेड का ऐलान, पर अपनी गलती का एहसास होते ही वे पहुँच गए अमरीका के मस्जिद में, इबादत के लिए। मीडिया के द्वारा दिखा दिया अमरीका के मुसलमानों को कि वे इस्लाम की इज़्ज़त करते हैं। हालाँकि यह दिखावे की इज़्ज़त इसलिये थी, कि उन्हें अचानक खतरे का एहसास हुआ, उन मुसलमानों से जो अमरीका में उस समय बसे थे। बुश को समय चाहिये था अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए।

कोई फरक नहीं पड़ता यदि आप निराकार ब्रह्म को मानते हों

कुरआन सूरा 2 अल-बकरा आयत 193 -
"तब तक उनसे लड़ते रहो, जब तक मूर्ति पूजा बिल्कुल खत्म न हो जाये और अल्लाह का मज़हब सबपर राज न करे"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 255

आप यदि हिंदू हो तो आप उनकी नज़रों में मूर्ति पूजक हो। कोई फर्क नहीं पड़ता उन्हें, आप यदि निराकार ब्रह्म को मानते हों। उनकी तलवार आपकी गर्दन पर उतनी ही तेजी से चलेगी जितनी तेजी से एक मूर्ति पूजक का सर धड़ से अलग होगा। वे निराकारी जो अपने-आपको मूर्तिपूजक हिन्दुओं से अलग सोच कर, स्वयं को सुरक्षित मान बैठे हैं वे अपने आपको ही धोखा दे रहे हैं।

तब तक जब तक मूर्ति पूजा का नामों-निशाँ न मिट जाये

कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 2-3 -
"अल्लाह एवं उनके पैगंबर मुक्त हैं, किसी भी दायित्व से, मूर्ति पूजकों के प्रति... उन्हें ऐसी सजा दो कि वे शोक ग्रस्त हो जायें"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 259
कुरआन सूरा 8 अल-अनफ़ाल आयत 39 -
"तब तक उन पर हमला करते रहो जब तक मूर्ति पूजा का नामों निशाँ न मिट जाये और सब अल्लाह के मज़हब के अधीन न बन जायें"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 255

प्रश्न यहाँ केवल मूर्ति पूजा का ही नहीं, यद्यपि सत्य है, मूर्ति पूजा के जरिए वे आपकी पहचान जल्दी कर सकते हैं, और खतरा आपकी तरफ तेजी के साथ बढ़ सकता है। बौद्ध मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं करते, उस प्रकार से जिस प्रकार से हिंदू करते हैं। फिर भी मुसलमान आए और बौद्धों का नामों-निशाँ मिटा गए, भारत की इस धरती पर से। कारण उन्होंने देखा कि बौद्ध मंदिरों में बुद्ध की प्रतिमा है। यही काफी था उनके लिए। हालाँकि बौद्ध, भगवान की मूर्ति तो क्या, भगवान तक में विश्वास नहीं करते। वे निर्वाण की बात तो अवश्य करते हैं, पर उस आशय से नहीं, जिस दृष्टि से हिंदू मोक्ष की बात किया करते हैं। हाँ, बौद्धों में भी कुछ संप्रदाय ऐसे भी हैं, जो कुछ हिंदू देवी देवताओं को मानते हैं, पर यहाँ मैं बौद्धों की उस अवधारणा की बात कर रहा हूँ जो गौतम बुद्ध की परिकल्पना में थी।

इस्लाम की सत्ता हो सारी धरती पर हो

खैर, प्रश्न यहाँ केवल मूर्ति पूजा की ही नहीं, बल्कि अल्लाह के मज़हब इस्लाम की सत्ता सारी धरती पर हो, यह उनकी सबसे बड़ी माँग है। किसी और धर्म के व्यक्ति को जीने का अधिकार इस धरती पर नहीं, यही सिखाता है मज़हब उनका।

कुरआन सूरा 60 अल-मुम्तहना आयत 4 -
"शत्रुता एवं घृणा ही रहेगी हमारे बीच तब तक जब तक तुम केवल अल्लाह के बंदे न बन जाओ"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 262

हिंदुओं, तुम्हारे लिए संदेश बहुत ही स्पष्ट है। जमाना बदले, या न बदले। तुम सपनों की दुनिया में खोये रहो, या न रहो। सर्व धर्म समभाव जैसी अवधारणाओं के भुलावे में पड़े रहो, या न रहो। हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई कह कर उन्हें गले लगाओ या नहीं लगाओ। एक बात स्पष्ट रूप से  समझ लो। कयामत तक हम तुमसे दुश्मनी निभायेंगे। तुम सदा हमारे लिए घृणा के पात्र रहोगे। प्रलय तक हम तुम्हें मुसलमान बनाते रहेंगे या फिर तुम्हारी गर्दन होगी हमारे हाथ।

अल्लाह और पैगंबर की दृष्टि में मूर्ति पूजक

कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 7 -
"अल्लाह और उनके पैगंबर मूर्ति पूजकों को विश्वास की दृष्टि से नहीं देखते"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 262

जब वे आप पर विश्वास ही नहीं करते तो आपका उन पर विश्वास क्या मायने रखता है? आप चाहें मानते रहें एक-तरफा विश्वास को, एक-तरफा प्रेम को, पर वास्तविक दुनिया में इसका कोई मूल्य नहीं। हाँ, यदि आप दूसरे हिंदुओं की नज़रों में बड़ा बनना चाहते हैं, जैसा कि कई टेलिविज़न-गुरुओं के उद्गारों से जाहिर होता है, तो यह अलग बात है। यदि आपने निर्णय कर ही लिया है कि आप अपने बड़े हृदय की पहचान देंगे, बाकी हिंदुओं को एक काल्पनिक दुनिया में ले जाकर, तो ठीक है, यह आपका व्यवसाय है, करते रहिए। आपके पाँव पड़ने वालों की कतार इस बात पर निर्भर करती है कि कितने बड़े महान आत्मा आप दिखते हैं। आपके भक्तगण सदा आपकी कृपा दृष्टि की आस लगाये आपकी समस्त सुख सुविधाओं की व्यवस्था में जुटे रहते हैं। आप यह सब भोगें पर कृपया हिंदुओं को और धोखे में न रखें।

कोई मुसलमान किसी काफ़िर से लड़ना या उसे मारना न चाहे तो उसका क्या हश्र होगा?

कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 39 -
"ऐ मुसलमानों, अगर तुम युद्ध न करो तो अल्लाह तुम्हें कड़ी सजा देगा और तुम्हारी जगह पर दूसरे आदमी को लायेगा"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 257

यहाँ धमकी का प्रावधान भी है। लड़ोगे नहीं तो तुम्हारी जगह दूसरा कोई ले लेगा। और यहीं बात खत्म न होगी। तुम्हें भी कड़ी सजा मिलेगी। अल्लाह ने इसकी व्यवस्था भी कर रखी है।

कुरआन सूरा 2 अल-बकरा आयत 216 -
"लड़ना तुम्हारी मजबूरी है, चाहे तुम कितना भी नापसंद करो इसे"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 255

ऐ मुसलमानों, अल्लाह का पैगाम है यह, चाहो या न चाहो, लड़ना तो तुम्हें पड़ेगा ही। कोई भी चारा नहीं तुम्हारे पास, इसके सिवा।

लड़ो अल्लाह की खातिर उनसे जो किसी दूसरे भगवान को पूजते हों

कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 41 -
"चाहे तुम्हारे पास हथियार हों या न हो, चल पड़ो, और लड़ो अल्लाह की खातिर, अपने धन और अपने शरीर के साथ"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 255

ऐ मुसलमानों, तुम्हें लड़ना है खुदा के वास्ते क्योंकि अल्लाह चाहते हैं कि तुम लड़ो, चाहे हथियार हों, या न हों तुम्हारे पास। अपना सारा धन लगा दो और अपना सब कुछ दे कर लड़ो। यदि यह पुकार अपनी रक्षा के लिए होती तो कितना अच्छा होता। यदि यही पुकार अपने धर्म, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान, अपनी माँ-बहनों, बहू-बेटियों की इज़्ज़त बचाने के लिए होती तो कितना अच्छा होता। पर इस लड़ाई की पुकार इन सबके लिए नहीं थी। यह पुकार थी अल्लाह की ख्वाहिश को पूरा करने की। वह ख्वाहिश क्या थी? काट डालो उन्हें जो मेरे सिवा किसी दूसरे भगवान को पूजते हों। मिटा दो उनका नामों-निशान, उनका धर्म, उनकी संस्कृति, उनकी पहचान।

तुम्हारे आस-पास जो भी गैर-मुसलमान बसते हों

कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 123 -
"मुसलमानों, तुम्हारे आस-पास जो भी गैर-मुसलमान बसते हैं, हमला बोल दो उन पर, उन्हें जताओ कि तुम कितने कठोर हो"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 255

ध्यान दीजिए इन शब्दों पर "तुम्हारे आस-पास जो भी गैर-मुसलमान बसते हैं"। आप का समय भी आने वाला है। यह सत्य है कि खतरा अभी आपकी दहलीज तक नहीं पहुँचा। कारण वे अभी भी उस संख्या तक नहीं पहुँचे, जिसकी उन्हें जरूरत है, आप पर धावा बोलने के लिए। पर इन खयालों में न रहिए कि वह दिन दूर है। वे फैल रहे हैं आपके इर्द-गिर्द। आप उनके घरों में झाँक कर नहीं देखते कि कितनी तेजी से बढ़ रही है उनकी संख्या। उन्हें पचास प्रतिशत की आवश्यकता नहीं होगी। पचीस बहुत होगा उनके लिए। उनके साथ उनका अल्लाह होगा। उनके मनों-मस्तिष्क पर जुनून सवार होगा। आप देखते रह जायेंगे, वे आपकी चौखट लाँघ कर आपकी बहू-बेटियों तक पहुँच जायेंगे। 

अल्लाह का पैगाम इंसानियत के नाम

कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 73 -
"ओ पैगंबर! जो मुझमें विश्वास नहीं करते, उनसे युद्ध छेड़ो। उन पर कठोर बनो। उनका अंतिम ठिकाना नरक है, एक दुर्भाग्य पूर्ण यात्रा का अंतिम चरण"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 255

यह है अल्लाह का पैगाम अपने पैगंबर के नाम। ओ पैगंबर! जो मुझ अल्लाह को अपना खुदा नहीं मानते, उन पर हमला कर दो। उनके साथ कठोरता का व्यवहार करो। उन्हें नर्क पहुँचाओ। अरे हिंदुओं, तुम कहाँ छुपोगे अल्लाह की नज़रों से बचकर? तुम में से जो यह कहते फिरते हैं कि अल्लाह तो इन्सानियत का पैगाम देता है, ये तो आदमी  है जो उसके पैगाम को नहीं मानता, वे एक बार अपने आप से पूछ कर देखें कि यह उनका अज्ञान बोल रहा था, या फिर उनकी मूर्खता या फिर उनकी धूर्तता? उन्हें अपने आप से एक और प्रश्न पूछना है कि वे अज्ञानी ही बने रहना चाहेंगे एवं अपने उस अज्ञान का शिकार दूसरों को भी बनाते रहेंगे, या फिर अपने आपसे एवं दूसरों से बेईमानी करना बंद कर देंगे? ध्यान दें कि पैसों की बेईमानी तो थोड़ा नुकसान करती है और उसका असर भी स्थायी नहीं होता। पर ज्ञान बाँटने में जब बेईमानी करते हैं तो वह संस्कृतियों को उजाड़ कर रख देता है। अतः यह पुस्तक उनके लिए भी है जो ज्ञान बाँटते हैं, अपने अधूरे ज्ञान का डंका बजाते हुए।

ताकि मुसलमानों के दिमाग में छप जाये वह बात

कुरआन सूरा 66 अत-तहरीम आयत 9 -
"ओ पैगंबर! जो मुझमें विश्वास नहीं करते, उन पर हमला करो और उनके साथ कठोरता से पेश आओ। नर्कउनका निवास होगा, दुर्भाग्य पूर्ण उनका भाग्य होगा"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 255

एक ही पैगाम, भिन्न-भिन्न ढंग से, भिन्न-भिन्न स्थलों पर, मिलेगा कुरआन में। अध्याय 9 में भी वही बात और फिर अध्याय 66 में भी। उद्देश्य स्पष्ट है। मुसलमान कभी भूले से भी, न भूले। चाहे वह कुरआन शुरुआत से पढ़ रहा हो, या मध्य से, या अंत में, उसे वही सब मिले बार-बार, लगातार। जब एक ही तरह की बातें दोहरायी जाती हैं तो उनका असर पढ़ने वालों के दिमाग पर गहरा होता है। जैसे कुरआन के पन्नों पर छपी होती है, वैसे ही मुसलमान के दिलो-दिमाग पर वह बात छप जाती है। आपका वास्ता दो-चार अँग्रेज़ी-दाँ मुसलमानों से पड़ता होगा, जो 0.00001 प्रतिशत होंगे, और आप उन्हें ही बाकी 99.99999 प्रतिशत का प्रतिनिधि मान बैठते हैं। आपको अहसास तक नहीं होता कि बाकी के दिलो-दिमाग पर क्या छाया हुआ है क्योंकि वह आपको दिखता नहीं। और आपको वह दिखता नहीं क्योंकि आप उनकी सोहबत (संगत) में नहीं रहते।

जन्नत किसका होगा और दोजख किसका

कुरआन सूरा 47 मुहम्मद आयत 4 से 15 तक -
जब तुम्हारा सामना हो गैर-मुसलमानों से, युद्धभूमि पर, उनके सर काट डालो। जब तुम उन्हें कुचल डालो तो कस कर बाँधो। उनसे धन वसूल करो। उनके हथियार डलवा दो। तुम ऐसा ही करोगे। यदि अल्लाह ने चाहा होता तो वह स्वयं उन्हें नष्ट कर देता, तुम्हारी सहायता के बिना। पर उसने यह आदेश दिया है, ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले सके। और वे जो अल्लाह के लिए लड़ते हुए कट मरेंगे, अल्लाह उनके काम को व्यर्थ न जाने देगा। वह उन्हें जन्नत में बुला लेगा। अल्लाह का यह वचन है।...मुसलमानों, यदि तुम अल्लाह की सहायता करते हो, तो अल्लाह तुम्हारी सहायता करेगा, और तुम्हें मज़बूत बनायेगा। पर जो अल्लाह का न होगा वह अनन्त काल तक नरक में सड़ेगा। अल्लाह केवल मुसलमानों की ही रक्षा करेगा। गैर-मुसलमानों का कोई भी रखवाला नहीं। जो सच्चे धर्म (इस्लाम) को अपनायेंगे उन्हें अल्लाह जन्नत में दाखिल करेगा। जो मुसलमान नहीं बनेंगे, वे वही खायेंगे जो जानवर खाते हैं, नर्क उनका घर होगा... वे वहाँ अनन्त काल तक रहेंगे, और खौलता हुआ पानी पियेंगे जो उनकी अँतड़ियों को चीर देगा"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 256

ईसाइयों का कहना तो आपने सुना होगा कि जो अपनी सहायता स्वयं करता है, गॉड भी उसकी सहायता करता है। यहाँ पर कुरआन की सोच जरा अलग है। तुम अपनी नहीं, बल्कि अल्लाह की सहायता करोगे, तभी अल्लाह तुम्हारी सहायता करेगा। अल्लाह चाहते तो खुद ही मिटा देते उन्हें, जो अल्लाह के बंदे न बने। पर वह तो तुम्हारी परीक्षा लेना चाहता है ताकि तुम्हें जन्नत दे सके।

जन्नत के हूर और अंतहीन ऐयाशी

"सदियों से मुसलमानों को, इस्लाम की जिस बात ने आकर्षित किया है, वह बात कुछ और ही है। जन्नत की खूबसूरत कुमारियों का झुंड। कुमारियाँ जिनकी उम्र कभी नहीं बढ़ती और जिनका आकर्षण कभी नहीं घटता। जो कभी नहीं थकते नए-नए मज़े देने में और ढेर सारे मज़े देने में। यह सब मिलता है केवल उनको जो इस्लाम के लिए जीए और इस्लाम की खातिर मरे। जन्नत के बारे में कामुकता भरे और चटकीले विवरणों से भरा पड़ा है इस्लाम के ज्ञान का पूरा साहित्य, कुरआन और हदीस से आरंभ कर"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, प्राक्कथन पृष्ठ XV, सीता राम गोयल

आप के घर की दहलीज पार करेंगे तो उनकी नजर सबसे पहले कहाँ जायेगी

सोच कर देखिए, जब उनके कदम आपके घर की दहलीज को पार करेंगे तो उनकी नजर सबसे पहले कहाँ जायेगी? आपकी बहू-बेटियाँ कितनी सुरक्षित रहेंगी? या फिर, पीछे मुड़ कर देखिए, आपकी बहू-बेटियाँ कितनी सुरक्षित रहीं थीं, जब यह हिन्दुओं का देश मुसलमानों के कब्जे में रहा था। या फिर, आज को ही देखिए, मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में हिन्दू घरों की बहू-बेटियाँ किस हाल में रहीं (पढ़ें Seed 7)।

अल्लाह उनके साथ क्या सलूक करेगा जो उसे नहीं मानते

कुरआन सूरा 8 अल-अनफ़ाल आयत 12 -
"जो मेरे अनुयायी नहीं हैं, मैं उनके दिलों में दहशत भर दूँगा। उनके सर धड़ से अलग कर दो, उनके हाथ और पाँव को इस कदर जखमी कर दो कि वे किसी भी काम के लायक न रह जायें"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 256

अल्लाह ने तो मुसलमानों को पक्की हिदायत दे ही रखी है कि उन्हें क्या करना है हिंदुओं के साथ। यदि प्रतीक्षा है किसी बात की तो वह है उनकी ताकत (जनसंख्या) थोड़ी और बढ़ने की।

मत सोचो कि तुमने किया, वास्तव में अल्लाह ने किया, तुम्हे माध्यम बनाकर

कुरआन सूरा 8 अल-अनफ़ाल आयत 15 से 18 तक -
"वो तुम नहीं, बल्कि अल्लाह था, जिसने उन्हें हिंसापूर्ण ढंग से उन्हें मार डाला। वह तुम नहीं थे जिसने उन पर दृढ़ता पूर्वक प्रहार किया। अल्लाह ने उन पर दृढ़ता पूर्वक प्रहार किया ताकि वह तुम जैसे अनुयायी को भरपूर पुरस्कार दे सके"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 257

गाजर सदा नज़रों के सामने, पुरस्कार का वादा भी। अगर तुम मुसलमान नहीं बनते तो अल्लाह तुम्हारे दिलों मे इतना खौफ (डर) भर देगा कि तुम मजबूरन मुसलमान बनने के लिए तैयार हो जाओगे। यह संदेश है गैर-मुसलमानों के लिए, और साथ ही, संकेत है मुसलमानों के लिए कि उन्हें कैसे पेश आना चाहिए गैर-मुसलमानों के साथ। और यदि उनके मन में जरा भी शंका उपजे कि यह सब उचित नहीं, उनका जमीर उन्हें कचोटे कि यह इंसानियत न होगी, तो इसकी भी व्यवस्था है कुरआन में। कुरआन उन्हें बताता है कि यह हिंसा तुम्हारा किया-कराया नहीं है, यह तो खुदा का कहर है जो बरसा उन पर, जिन्होंने खुदा का बंदा बनने से इंकार किया। मत सोचो, खुदा के बंदों, कि यह सब तुमने किया। नहीं, तुमने नहीं, अल्लाह ने किया, तुम्हे अपना जरिया बना कर।

काफिरों के प्रति बेरहम बनो पर मुसलमानों के प्रति दयालु बनो

कुरआन सूरा 48 अल-फ़त्ह आयत 29 -
"मुहम्मद अल्लाह के पैगंबर हैं। जो उनका अनुसरण करते हैं वे गैर-मुसलमानों के प्रति बेरहम होते हैं पर एक दूसरे (मुसलमानों) के प्रति दयालु होते हैं"
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 258

इस संदर्भ में एक घटना सुनिए। मुम्बई से एक अँग्रेज़ी दैनिक समाचारपत्र निकलता है Asian Age के नाम से। उसके सम्पादकीय पृष्ठ पर 29 जनवरी 2003 को मलेशिया के प्रधान मंत्री डॉक्टर महाथिर बिन मुहमद का एक पत्र छपा। उन्होंने लिखा कि (1) कुरआन कहता है सारे मुसलमान भाई-भाई हैं (2) इस्लाम शान्ति की वकालत करता है (3) भाई-भाई को आपस में लड़ना नहीं चाहिए (4) एक ही परिवार से होने के कारण भाइयों को आपस में प्रेम रखना चाहिए और एक-जुट होना चाहिए। प्रत्यक्ष रूप से वह सभी मुसलमानों को एक-जुट होने को कह रहे थे। परोक्ष रूप से वह कह रहे थे कि बस एक बार तुम एक-जुट हो जाओ, फिर वैसा ही करना जैसा कुरआन कहता है। वह जानते थे कि समझदार के लिए ईशारा ही काफी होता है। इसलिए उन्होंने यह अनकहा छोड़ दिया कि कुरआन तुम्हें हिदायत देता है कि बेरहम बनो काफ़िरों के प्रति और उन्हें तबाह कर डालो। वे जानते थे कि हर सच्चा मुसलमान जानता है कि वक्त आने पर उसे काफिरों के साथ क्या सलूक करना चाहिए। वह यह भी जानते थे कि काफिरों को तबाह करना तभी सम्भव होगा जब दुनिया भर के सभी मुसलमान आपसी गिले-शिकवे भूल कर एक-जुट होंगे। कुछ लोग अपने हिंदू नाम के सहारे हिंदुओं की बुराई करने मे अपना बड़प्पन मानते हैं। ये कहते फिरते हैं कि हिंदू बँटा हुआ है जबकि देखो मुसलमानों में कितनी एकता है। मुसलमानों की एकता का गुणगान करने वालों को मलेशिया के प्रधानमंत्री से यह पूछना चाहिए कि उन्होंने मुसलमानों को एक जुट होने की सलाह क्यों दी?

आप, जो बुराई को उसके असली रूप में, देखना नहीं चाहते

वैसे आप लोगों में से अनेक ऐसे हैं जो बुराई को उसके असली रूप में देखना नहीं चाहते। उनकी बस एक ही ख्वाइश होती है कि हर बुराई में बस अच्छाई को ढूंढो और बुराई को नज़र अंदाज़ करो। ऐसे लोग महाथिर बिन मुहमद की पैरवी करने सबसे पहले आयेंगे। वे मुझसे कहेंगे कि आप तो बात का बतंगड़ बना रहे हैं। उस भले-मानुस ने तो एक अच्छी बात कही थी - मुसलमानों को प्रेम और एकता की बात समझायी थी। तो फिर आप, जाने क्यों, उसका क्या-क्या, अनाप-शनाप अर्थ निकाल लेते हैं। ऐसे लोग आँख मूँदे रहेंगे और उनकी अकल पर से परदा तब उठेगा जब ये दरिंदे उनके अपने घर में घुस आयेंगे और उनकी बहू-बेटियों की इज़्ज़त, उनकी ही आँखों के सामने  लूटेंगे, तब उनके दिमाग से इस भलाई का भूत उतरेगा। यदि उन्हें यह सब बड़ी दूर की बात लगती है तो Seed 7 पढ़ कर हाल की सच्ची घटनाओं के बारे में अपनी जानकारी बढ़ाएँ। ऐसे लोगों को अपने-आपसे पूछना चाहिए कि डॉक्टर महाथिर बिन मुहमद ने झूठ क्यों बोला? वह झूठ यह था कि "इस्लाम शान्ति की वकालत करता है"। मैं बताता हूँ उसने झूठ क्यों बोला। वह जानता है कि इस दुनिया में आप जैसे लोगों की भरमार है जो अपनों की बात तो नहीं सुनेंगे पर दूसरों की बात पर बड़ी जल्दी भरोसा कर लेंगे। उसने सरे-आम यह झूठ इसलिए बोला ताकि वह आप जैसे मूर्खों को, मूर्ख ही बनाये रख सके।

हिंदू को, हिंदू की नजर में गिराने वाले षड़यंत्रकारी

उस Asian Age का मालिक, एक इस्लाम का बंदा कोई अकबर जैसे नाम का है, जिसकी बड़ी साख है हमारे बुद्धिजीवियों में। उसने कोई एक अच्छीसी टीवी सीरियल भी बनाई थी जिसमें हिन्दू सन्यासी को बड़े गंदे रूप में दिखाया था। आज मीडिया ऐसे ही लोगों के कब्जे में है जो हिंदू को हिंदू की नजर में गिराने के षड़यंत्र में कभी पीछे नहीं रहते।

समस्त हिंदू जाति की माताओं का अपमान

ये मीडिया वाले मकबूल फ़िदा हुसैन पर बड़े फ़िदा हैं। हुसैन जब हिंदू देवी-देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाता है, और दुनिया भर में लाखों/करोड़ों के भाव बेचता है, तब वे उसकी तारीफ़ में पुल बाँध देते हैं, कि क्या गज़ब की कला है। यह अस्सी वर्ष का बूढ़ा, जिसके दिमाग में इतनी गंदगी भरी है कि उसे आज इस उमर में भी, यौन-लिप्सा के सिवा कुछ भी नहीं सूझता और वह हिंदू देवी-देवताओं को पशुओं के साथ मैथुन करते हुए दिखाता है। जब उसने भारतमाता को नग्न रूप में पेंट किया तो कुछ गिने-चुने हिंदू संस्थाओं ने उसे कोर्ट में घसीटा। अब बारी थी इन जर्नलिस्टों एवं तथाकथित बुद्धिजीवियों की, अपनी राय जताने का, क्योंकि वे मानते हैं कि जनतंत्र उन्हें वह हर छूट देता है, जो वे कहना चाहें। बड़े-बड़े लेख छपे, बड़े-बड़े अखबारों में, कि हिंदुओं का आपत्ति करना सरासर गलत है, क्योंकि ऐसा करके वे कला का गला घोंट रहे हैं। कला का कोई मज़हब नहीं होता, कलाकार उन सबसे ऊपर होता है। उनमें से किसी ने यह नहीं पूछा कि हुसैन ने अपनी माँ की नंगी तस्वीर क्यों नहीं बनाई, आखिर वह भी तो एक बड़ी अनोखी कलाकृति होती, उसका भी दुनिया भर में बड़ा आदर होता, वह भी लाखों/करोड़ों के भाव बिकती। एम एफ़ हुसैन हिंदू देवी-देवताओं की नंगी तस्वीर बनाकर वस्तुतः समस्त हिंदू जाति की माताओं का अपमान करता है और हिंदुओं को हक नहीं कि वे अपना रोष जाहिर कर सकें। देखो, आज हिंद की इस धरती पर बसने वाले मुट्ठी भर मुसलमानों ने समस्त हिंदुओं को इतना बेबस बना कर रख दिया है। कल जब उनकी तादाद और बढ़ेगी, तो हिंदुओं का क्या हश्र होगा? आप अपने-आपको इस कदर लाचार पाते हैं आज, तो कल क्या करेंगे, जब स्थिति आपके हाथों से पूरी तरह निकल चुकी होगी। करें, शौक से इंतज़ार करें, तब तक, जब तक, खतरा आपके अपने घर की दहलीज पर नहीं आ जाता। आपको तब वह सीख मिलेगी जब वे आपकी पत्नी को, आपकी बेटी को, आपके घर से बाहर घसीट कर सड़क पर सबके सामने उसका बलात्कार करेंगे। आप इसी योग्य हैं। जब आप अपनी माँ समान देवी के मान की रक्षा नहीं कर सकते तो आप अपनी पत्नी और बेटी के मान की क्या रक्षा करेंग़े? आपकी नपुंसकता आपको मुबारक।

हिंदू धर्म गुरुओं से मेरी प्रार्थना

मेरी प्रार्थना है हिंदू धर्म गुरुओं से कि चेतायें अपने अनुयायियों को, कि आज समय अपने मोक्ष की चिंता करने का नहीं है बल्कि सनातन धर्म के ऊपर होने वाले हर प्रहार का समुचित उत्तर देने का है। धर्म गुरुओं का यह पावन कर्तव्य है आज, कि जगायें अपने अनुयायियों को, और उन्हे कमर कस कर एक अभेद्य दीवार की भाँति खड़ा करें जिसे तोड़ने का दुःसाहस कोई भी न कर सके।

हिंदुओं की बागडोर सन्यासियों के हाथ

आज हिंदुओं की बागडोर सन्यासियों के हाथ में है। जब उन्होंने हमारे समाज में, यह महत्वपूर्ण स्थान, स्वेच्छा से ग्रहण किया है, तो उनका कर्तव्य बनता है, कि वे समाज को आज की आवश्यकता के अनुसार मार्गदर्शन करें। यदि वे अपने अनुयायियों को अपने ही जैसा सन्यासी बनायेंगे तो हिंदू समाज के प्रति बहुत बड़ा अन्याय करेंगे। 

यदि ये सन्यासी अपना दायित्व निभाने से चूकते हैं

यदि ये सन्यासी अपना दायित्व निभाने से चूकते हैं तो वह दिन दूर नहीं जब इस धरातल पर एक नेतृत्व का उदय होगा जो सबसे पहले इन सन्यासियों को अपने पद से मुक्त करेगा और तब जनता-जनार्दन की बागडोर अपने हाथों में लेगा। उस दिन एक नये महाभारत की नींव पड़ेगी। समय-समय पर देवी का आविर्भाव होता है, महिसासुर-मर्दिनी के हाथों में त्रिशूल होता है, जब असुरों का संहार आवश्यक हो जाता है।

दरकार है स्वाभिमानी और साहसी सरकार की

अब चलें वापस डॉक्टर महाथिर बिन मुहमद की ओर। उनकी मलेशिया में, हाल ही में (सन 2006), हिंदुओं का एक महत्वपूर्ण मन्दिर तुड़वा दिया गया, उस समय जब देवी की पूजा चल रही थी। हिन्दुओं ने मिन्नतें की, कि पूजा तो कम से कम खत्म हो जाने दीजिए, पर यह उन्हें मंजूर न था। आपने समाचार पत्रों में विवरण तो पढ़ा ही होगा। सोच कर देखिए--यदि भारत सरकार यह चेतावनी देती कि "एक मन्दिर, मलेशिया की धरती पर, मलेशिया की सरकार तोड़ेगी, तो उतनी ही महत्वपूर्ण, एक मस्जिद, भारत भूमि पर, भारत सरकार तोड़ेगी"--तब देखते, हम भी, मलेशिया की मुसलमान सरकार में कितना दम है। हमें आज यदि आवश्यकता है तो ऐसी एक स्वाभिमानी और साहसी सरकार की। आज के इन हिंजड़ों से कुछ भी न बन पड़ेगा।

जब कश्मीर में सत्तर हजार हिंदू पंडित कत्ल किए गए

खैर, अब आगे बढ़ें। महाथिर बिन मुहमद ने इस एक-जुट होने का ऐलान किस संदर्भ में किया था, आइए इस पर एक नजर डालें। उन दिनों अमरीका ने बड़ी हाय-तोबा मचा रखी थी। उनके दो टावर क्या गिर गए उन्होंने सारी दुनिया को सर पर उठा लिया। हालांकि जब कश्मीर में हज़ारों की तादात में हिन्दू कत्ल किये जाते रहे, उनके कानों पर जूँ तक न रेंगी। ईसाई राष्ट्रों का यह दोगलापन कोई नई बात नहीं है।

अन्जान हिंदू पाठकों को दिग्भ्रमित किए रखना आवश्यक जान पड़ा होगा

महाथिर बिन मुहमद की परेशानी यह थी कि उन दिनों अमरीका ने अपने शक्तिशाली इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सहारा लेकर मुसलमानों को दुनिया में बड़ा बदनाम कर रखा था। Asian Age को पढ़ने वाले बहुत हिन्दू पाठक हैं जिन्होंने कुरआन पढ़ी नहीं। उन्हें दिग्भ्रमित किए रखना बड़ा आवश्यक जान पड़ा होगा। इसलिए महाथिर बिन मुहमद ने झूठ का सहारा लिया। हिन्दू पाठकों को बताया कि इस्लाम शान्ति की वकालत करता है। साथ ही मुसलमान पाठकों को बताया कि उन्हें एक-जुट होना है यदि वे इस्लाम के असली पैगाम को सच बनाकर दिखाना चाहते हैं।

बड़े समचार पत्र और उनके बड़े झूठ

यह जानते हुए कि Asian Age एक जाने-माने मुसलमान का समाचारपत्र है जिसने धर्म निरपेक्षता का चोगा पहन रखा है, मैनें उन्हें एक चुनौती भरा पत्र लिखा, कि यदि तुममे सत्साहस हो तो इस पत्र को छापो, जिसमें मैं कुरआन से उद्धरण दे रहा हूँ, संदर्भ सहित, ताकि तुम्हारे पाठक जानें, कि इस्लाम वाकई शान्ति की वकालत करता है, या नहीं। उसने उस पत्र को छापा नहीं।

इसी प्रकार की लेखों की एक शृंखला लगातार छप रही थी The Free Press Journal में। यह उन दिनों की बात है जब बीजेपी सरकार केन्द्र में थी। लेखक कोई कार्तिक खाण्डवाला थे। वह कुरआन से उद्धरण दिया करते थे, पाठकों को यह विश्वास दिलाने के लिए कि इस्लाम वाकई में अमन-चैन का पैगाम देता है। पर उनमें एक विशेषता थी--वे कभी संदर्भ नहीं देते थे। उन्हें डर था कि कोई कुरआन में झाँक कर देखेगा, तो यह  पायेगा, कि उस उद्धरण को पूरा पढ़ा जाये तो मायने उलट जाते हैं। वे बड़ी चलाकी से उद्धरण का उतना हिस्सा पाठकों के सामने पेश करते थे जिससे उनके झूठे प्रचार को बल मिल सके। नाम भी देखो उसने अपना कैसा चुना था--कार्तिक--एक हिन्दू देवता का नाम--वह देवता जो देव-सेना का सेना नायक था और जिसने असुरों का संहार किया था। आज के असुर भी हिंदू देवता के नाम का चोगा पहनते हैं ताकि हिंदुओं को धोखे में रख सकें।

पिछले कुछ समय से (2006) मैं देख रहा हूँ कि Hindustan Times में औसतन हर हफ्ते एक लेख Inner Voice के अन्तर्गत छपता है जो हिन्दू पाठकों को यह बताता है कि इस्लाम कितने प्रेम का धर्म है। हिन्दू बिचारा इतना अन्जान है कि वह इन पैंतरों की कलाबाजी में ही मात खा जाता है।  

मुसलमान के लिए केवल युद्ध जीतना ही काफ़ी नहीं, कत्लेआम भी जरूरी है

कुरआन सूरा 8 अल-अनफ़ाल आयत 12 -
"पैगंबर, युद्ध बंदी तब तक न बनायेगा, जब तक वह, उस जमीन पर कत्लेआम न कर ले''
स्रोत ISBN 81-85990-58-1, p 259

यह पर्याप्त नहीं कि यदि गैर-मुसलमान हथियार डाल दें तो उन्हें बन्दी बना लिया जाये। नहीं, बंदी तब तक न बनाये जायेंगे जब तक ढेर सारे लोगों को कत्ल न कर दिया जाये। खून की प्यास इतनी गहरी कि जीत ही काफी नहीं, बल्कि उनका कत्ल करना जरूरी है, जिनके हाथ में हथियार तक नहीं।  आपको कुरआन का यह कलाम याद रखना चाहिए क्योंकि आप इस भुलावे में जीयेंगे कि आप हथियार नहीं उठायेंगे तो बच जायेंगे। 

इस्लाम कबूल कर उसे छोड़ने की सजा

कुरआन सूरा 4 अन-निसा आयत 91 -
"वे जो पीठ मोड़ लें, उन्हें पकड़ो जहाँ भी उन्हें पाओ, और उनका हिंसा पूर्वक कत्ल कर डालो"
स्रोत Arun Shourie, Eminent Historians-Their Technology, Their Line, Their Fraud, p 93, ISBN 8190019988

यह आयत उन लोगों के संदर्भ में है, जो इस्लाम कबूल करने के बाद, उसे छोड़ कर अपने पुराने धर्म की ओर वापस चले जाते हैं" अतः अल्लाह तक आपका रास्ता केवल एक तरफा है। आप आगे तो जा सकते हैं, पर पीछे मुड़ कर वापस नहीं आ सकते। आप केवल जान से ही हाथ नहीं धोएंगे, बल्कि तकलीफ के साथ ही जान गवाँयेंगे। इसलिए जो एक बार मुसलमान हो गया, वह समझ लो सदा के लिए मुसलमान हो गया। क्या ये बातें सिर्फ कुरआन तक ही सीमित रही हैं, या उन्हें अंजाम तक भी पहुँचाया गया है? आइए देखें।

हदीस, जो पैगम्बर ने किया, उसे मुसलमान को दोहराते जाना होगा कयामत तक

इस्लाम के दो अंग हैं। एक कुरआन और दूसरा हदीस। कुरआन है अल्लाह का पैगाम हर मुसलमान के नाम। हदीस है अल्लाह के द्वारा किए गए काम, पैगंबर मुहम्मद के जरिए। कुरआन यदि अल्लाह की आवाज़ है तो हदीस अल्लाह के कारनामों का जीता-जागता नमूना। पैगंबर ने क्या किया, कब किया, कहाँ किया, कैसे किया, किसको किया, क्यों किया, यह सब बड़ी ही ईमानदारी, एवं बड़े ही गर्व, के साथ लिपिबद्ध किया गया है, हदीस में। जो लिखा है हदीस में वह सुन्ना बन गया और हर मुसलमान का फर्ज बन गया कि कयामत तक उनका अनुकरण करे।

कितना भयावह एवं क्रूर था वह सब जो आज के आम मुसलमान के लिए अनुकरणीय बना

साहीह बुखारी 82.794-7 एवं साहीह मुस्लिम 4130-7 -
"पैगंबर ने उन्हें पकड़वाया। उसके बाद उन्होंने आदेश दिया कि उनके हाथ और पाँव काट दिए जायें, उनकी आँखों में गर्म लोहे के सलिए घुसेड़ दिए जायें। उन्होंने आदेश दिया कि हाथ-पाँव के जख्मों को खुला छोड़ दिया जाये ताकि खून रिसता रहे उनके मरते दम तक। और जब उन्होंने पानी माँगा, तो उन्हें पानी नहीं दिया गया
(टिप्पणी - यह सजा दी गई थी, उक्ल जनजाति के कुछ लोगों को, जो इस्लाम कबूल करने के बाद, इस्लाम छोड़ गए)"
स्रोत ISBN 81-900199-8-8, p 94
साहीह बुखारी 84.057 -
"जो भी इस्लाम को छोड़ दूसरा धर्म अपनाये, उसका कत्ल कर डालो"
स्रोत ISBN 81-900199-8-8, pp. 93-94

जरा सोच कर देखिए

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इस पुस्तक को लिखने के पीछे मेरा एक ही उद्देश्य है कि आप सत्य को जानें, परखें तथा अपने निर्णय स्वयं लें।

इस कृति का कृतिस्वाम्य मानवता के नाम — आप इसे यथावत प्रकाशित कर सकते हैं — निःशुल्क/सशुल्क वितरित कर सकते हैं — समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं में छाप सकते हैं — प्रूफ़रीडिंग पर विशेष ध्यान दें कारण आपके द्वारा टाइपिंग में गलतियों के दायी आप होंगे — प्रकाशक तथा मुद्रणालय का पूरा पता दर्शाये बिना प्रकाशन अवैध होगा — एक प्रति मुझे भेजना न भूलें।

48 वर्ष की उम्र में कार्य निवृत हो कर मैंने एकांत की शरण ली। अब मैं अपना सारा समय शोध, लेखन, प्रकाशन तथा पुस्तक वितरण हेतु खर्च करता हूँ। अपने जीवीकोपार्जन के लिए कार्य करना वर्षों पहले छोड़ दिया — इस कारण मेरे साधन सीमित हैं। उपलब्ध साधन जब तक साथ देंगे तब तक ये पुस्तकें छपकर आप लोगों तक पहुँचती रहेंगी।

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