मज़हब ही सिखाता है आपस में बैर करना - एक हिन्दू धर्म के सिवा

अंतर्राष्ट्रीय मानक पुस्तक क्रमांक ISBN 81-89746-15-4 प्रकाशित 15 जनवरी 2006

पुस्तक समीक्षायें

श्री श्रुतिवन्त दुबे 'विजन', राष्ट्रपति पदक प्राप्त, राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित, विद्यावाचस्पति (मा0), 
जिला अध्यक्ष इण्डियन प्रेस कौंसिल, जिला सीधी, मध्य प्रदेश, दिनांक 6 मार्च 2006 
"मानोज रखित की कृति "मज़हब ही सिखाता है आपस में बैर करना" मेरे हाथ में है। अभी तक मैंने पढ़ा था मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना और अपने इस दृष्टिहीन ज्ञान को सगर्व प्रचारित भी करता आया हूँ। किन्तु आज समझा कि मैने तोतारटन्त इस पुस्तैनी अज्ञान को विरासत में पाया और श्रृंखला का सूत्र बनता रहा। "मैं" हूँ व्यक्ति, चर समष्टि का प्रतीक हूँ, एक सिम्बल हूँ। इसलिए यह अज्ञान भी व्यक्ति तक सीमित न होकर समूह का सच है।
कृति धर्म पर चढ़ी आदर्श की कलई को खोलती धर्म के काले चेहरे को उजागर करती है। लेखक की कलम धर्म का पोस्टमार्टम करती है तथा अंग-प्रत्यंग चिंतन के द्वार पर सोचने के लिए छोड़ देती है। ऐ वे सच्चाईयाँ हैं जो पाठक की सोच को बदल सकती हैं। अन्य मज़हबों की संकीर्णता, कट्टरता, दुराग्रहता तथा हिंसात्मकता का बयान करता लेखक सनातन धर्म की वैज्ञानिकता और सर्वग्राह्यता का भौतिक खुलासा करता है।
पुस्तक धर्म का फ़ोटोग्राफ़ है, लेखक एक फ़ोटोग्राफ़र। जो मज़हब के चेहरे को हू-बहू दर्शक के सामने रख दिया है। फ़ोटोग्राफ़र फ़ोटो में अपना कुछ नहीं देता। लेखक ने भी नहीं दिया, पर सोचने के लिए जगह दिया है। इसीलिए वह कहता है - मुझमें अब कोई इच्छा नहीं रही, कि मैं उन व्यक्तियों को समझाने में, अपना समय एवं अपनी उर्जा नष्ट करूँ, जो मेरी बात को समझने की स्थिति तक, अभी नहीं पहुँचे। ऐसे व्यक्ति इन लेखों कि महत्ता को तभी समझेंगे जब पानी सर तक आ पहुँचेगा, एवं डूबने की संभावना उन्हें बहुत ही निकट से दिखने लगेगी।
और लेखक का इच्छाराहित्य ही संगठन का प्राबल्य है। यही पाठक का आमंत्रण है जहाँ वह चिन्तन के लिए जगह पाता है। इस छोटी सी पुस्तक में बाइबिल ओल्ड व न्यू टेस्टामेन्ट, ईसाई गॉस्पेल, कुरआन और उनकी आयतें तथा सनातन धर्म का निष्पक्ष व निष्काम भाव से यथारूप, यथा आदेश एवं उपदेश प्रस्तुत किया गया है। मज़हब के खेमे में घुटती मानवीयता की पीड़ा ही लेखक का लेखन, सत्यकथन, अध्ययन एवं अध्यात्म है, लेखक की नज़रों ने मज़हब के खंजरों से असहायों, निरीहों, बेगुनाहों के कटते सिर देखा है, बस्तियों की जलती होली देखी है, खून की नदियों में उफ़ान देखा है। यही कारण है कि भावों का साधक चिन्तन के कर्म-मठ में साधनारत होकर सत्यधर्म के द्वार पर पहुँचता है। इस पहुँच में न खीझ है, न उदासी है, न कचोट है, न हथौड़ा प्रहार का कोई आग्रह। वह शान्त निर्लिप्त भाव से अपने अध्ययन के निष्कर्ष धर्मसार को पाठक के मन मस्तिष्क में निचोड़ देता है, जो धीरे-धीरे रिसता हुआ पाठक की सोई हुई चेतना को बिना आवाज के ही जागृत करता है। यह जागृति ही लेखक को अभीष्ट है।
लेखक कोई उपदेशक नहीं, पर मानव धर्म का रक्षक है। इसीलिए उसका पहला और अन्तिम संदेश - यदि अपने हितों की सुरक्षा चाहते हो तो पहले सनातन धर्म के हितों की रक्षा करो - है। यह कोई उपदेश नहीं, बल्कि आत्मक्लेश व धर्मक्लेश है।
अपने अध्ययन व चिन्तन से लेखक ने निष्कर्ष निकाला है कि - मज़हब ही सिखाता है आपस में बैर करना - सटीक एवम् तर्कसंगत है। पर सनातन धर्म ही मानव धर्म है जिसमें --सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया--के भाव-पुष्प चिन्तन-उद्यान में विहँसते रहते हैं।
कुल मिलाकर, कृति संप्रेषणीय, पठनीय एवम् संग्रहणीय है। पाठक पुस्तक खोजकर पढ़ें, मेरी अपील है।"
महामण्डलेश्वर डॉ स्वामी शिवस्वरूपानन्द सरस्वती, हरिद्वार, 12-3-2006 
"आपकी दूसरी पुस्तक "मज़हब ही सिखाता है आपस में बैर करना" बहुत ही अच्छी लगी। आपने कुरान की सभी आयतें प्रमाण के रूप में दी हैं। आज समय बदला है अतः हमें भी बदलना होगा, अब सन्यासी समाज को भी माला के साथ भाला, व समाज संगठन की विशेष आवश्यकता है; अतः हिन्दू धर्म पर होने वाले आघातों के प्रति जवाब देना होगा, नही तो संस्कृति व हिन्दू धर्म समाप्त हो जायेगा। ईसाई व मुसलमानों का हर कीमत पर विरोध भी करना होगा, नही तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दू बाहुल्य देश भारतवर्ष पर मुसलमानों का शासन होगा और हम पुनः गुलाम बन जायेंगे। ... आपके प्रयास की पुनः पुनः सराहना करते हुए आपसे आग्रह है कि अपने कार्य को आगे बढ़ाते रहें तथा हम सभी को भी अवगत कराते रहें। आपका शुभेच्छु।"
स्वामी संकल्पानन्द सरस्वती, आर्य समाज, मुम्बई, अप्रैल 2006 
"मैने इसे आद्योपान्त पढ़ा हूँ। पुस्तिका तथ्यात्मक है और भण्डाफोड़ करने वाली है। आपने जो उद्धरण दिये हैं, वे बहुत मार्मिक एवं हिन्दु जाति के प्रत्येक घटक को जानने योग्य है। आपका ब्रीद (तथ्य) वाक्य "तुम्हारी आज की उदासीनता तुम्हारे कल के आने वाली सन्तानों को बड़ी महंगी पड़ेगी" बहुत चेतावनी देने वाला है। आपने इसे अन्यान्य भाषा में छपवाने हेतु भी लिखा है। मैं इसे मराठी में छपा सकता हूँ। आप जैसे धर्मप्रेमी, मानवतावादी एवं सत्यासत्य का निर्णय करने वाले लोग चाहिए। मैं आपको धन्यवाद देता हूँ। अस्तु!"
 स्वामी नर्मदानन्द सरस्वती 'हरिदास', जबलपुर, म प्र, 26-5-2006 
"आपकी रचित पुस्तिका 'मज़हब ही सिखाता है आपस में बैर करना' प्राप्त हुई जिसे अवलोकन कर बहुत प्रसन्नता हुई। आपने बड़े विचार पूर्वक अपने विषय का पूर्णता से प्रतिपादन किय है तथा इस तरह जनमानस को एक नई दृष्टि देते हुए जागृत करने का आपका यह प्रयास सर्वथा अनूठा एवं स्वागत योग्य है। वर्तमान समय में ऐसे ही जागृति पूर्ण क्रान्तिकारी विचारों के प्रचार प्रसार की परमावश्यकता है, एतदर्थ ऐसे सत्प्रयास के लिए बहुशः साधुवाद। हमारी शुभकामनायें सदैव आपके साथ हैं।"
साधु अमृतवदनदास, स्वामीनारायण संस्था, मुम्बई, 22-2-2006
"आपका भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम और सत्य बात का उद्घाटन करने का उत्साह, आनन्द, प्रशंसनीय है। आपका यह कार्य और ऊँचाई प्राप्त करे एवं देश की अधिक सेवा हो इसलिए भगवान स्वामीनारायण एवं परम पूज्य प्रमुखस्वामी महाराज के चरणों में प्रार्थना सह शुभेच्छा।"
 साधु डॉ राधेश्याम 'योगी', गाँधी शांति प्रतिष्ठान केन्द्र, जालौन, उ प्र, 4-3-2006 
"पुस्तक अद्वितीय है - साहसिक कदम है।"
श्री शरद शर्मा, संपादक, अयोध्या संवाद, अयोध्या, उ प्र, 12-2-2006 
"आप द्वारा लिखित बिंदु समाज व राष्ट्र को सजग करने में अहम भूमिका निभा रहा है, वही हिन्दु समाज को अपने प्रति आत्म-चिंतन के लिए प्रेरित भी कर रहा है। आप जैसे लेखकों के द्वारा ही भारतीय संस्कृति आज भी इतनी समस्याओं से जूझने के बाद भी सुरक्षित है। आपका मार्गदर्शन इस देश की भावी पीढ़ी के लिए परम आवश्यक है। जन-जन को राष्ट्र के प्रति सजग करने का जो पवित्र कार्य आपने अपने हाथों में लिया है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है। आप द्वारा भेजी गयी पत्रिकाओं को राष्ट्र कार्य में संलग्न व्यक्तियों के हाथों में पहुँचा दी है। अयोध्या के अनेक संत धर्माचार्य समाज को सही दिशा देने में निरन्तर तत्पर हैं। ऐसे में आपकी पत्रिकायें उनका और भी मार्गदर्शन करने में सहायक सिद्ध होगी।"  
श्री आनन्द 
मुझे आपके द्वारा लिखित पुस्तकें तीन पुस्तकें 1. मजहब ही सिखाता है आपस में बैर करना 2. राम मंदिर तुम्हें पुकारता 3. हमारे न्यायाविद् ...... मिलीं। महोदय यह पुस्तकें हमारे भ्राता डाo ओमप्रकाश जी के करकमलों द्वारा हमारे गृह जनपद बाराबंकी से दशहरा की छुट्टियों में पढ़ने के लिए प्राप्त हुर्इं। पढ़कर अति प्रसन्नता हुई और इस बात की अनुभूति हुई कि अभी भी कोई हिन्दू इस धरा पर हिन्दू धर्म के उत्थान के लिए मौजूद है। आपके द्वारा प्रस्तुत किए गए साक्ष्य चीख-चीख कर उत्तर दे रहें हैं कि किस तरह ईसाई एवं इस्लाम धर्म के धर्म ग्रन्थ हिन्दू धर्म का खुला विरोध कर रहे हैं। हम हिन्दुओं को दिग्भ्रमित करने हेतु बाईबिल एवं कुरान को जिस रूप में प्रस्तुत किया गया है वह मात्र छलावा है। आपने हमारी आँखें खोल दी हैं और हमें यह अहसास हो रहा है कि अब वह समय आ गया है कि हम अपने धर्म के प्रति जागरूक होना होगा वरना हिन्दू धर्म का अस्तित्व मिटाने के लिए ये बाज ताक लगाए हुए हैं। जरा सी पलक झपकी कि ये उसका ग्रास बनाना चाहेंगे।

पुस्तक

बस केवल एक झलक देख लें

बचपन से मैं सुनता आया था —

जीवन के पचास वर्षों तक मैंने इन बातों पर विश्वास भी किया। शिक्षा, मीडिया और प्रचार का प्रभाव मानव की सोच और भावनाओं को इस हद तक प्रभावित कर सकता है। पर अब मैंने स्वयं उन धर्मग्रंथों को पढ़ा। फिर, उन सीखों के आधार पर, उन धर्मों के अनुयायियों ने, मानवता के साथ क्या वीभत्स व्यवहार किया, इसका इतिहास भी पढ़ा।

पवित्र बाइबिल

यहूदी बाइबिल — ओल्ड टेस्टामेंट टिप्पणियाँ

संदर्भ
  1.  होली बाइबल, पॉकेट-साइज़ एडिशन, (वैटिकन में पोप द्वारा प्राधिकृत) किंग जेम्स वर्ज़न, पाइलट बुक्स, एथेन्स, जॉर्जिया, ब्रॉडमैन ऐंड हॉलमैन पबलिशर्स, बेलजियम, 1996
  2.  फ़ादर कामिल बुल्के, अंगरेजी-हिन्दी कोश, काथलिक प्रेस, राँची, 1968
  3.  डॉ हरदेव बाहरी, राजपाल अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश, राजपाल एण्ड सन्ज़़, दिल्ली, 2005

यहूदी बाइबिल ओल्ड टेस्टामेंट — डिउटेरॉनॉमी (संदर्भ 1)

12:1 — ये हैं (बाइबिल के) गॉड (ईश्वर) के विधान (कानून) जिनका तुम पालन करोगे तब तक जब तक तुम इस पृथ्वी पर जिओगे
12:2 — तुम पूरी तरह विनाश कर दोगे उन सभी स्थानों का जिन पर तुमने अधिकार किया, यदि वहाँ के लोग किसी भी अन्य भगवान की पूजा करते हों, चाहे वे ऊँचे पर्वतों पर बसते हों, या पहाड़ियों पर, या फिर हरी-भरी वादियों में
12:3 — और तुम उनके पूजा की वेदियों विध्वंश कर दोगे, उनके पूजा के स्तम्भों को तोड़ दोगे, उनके उपवनों को जला दोगे, उनके देवी-देवताओं के अंकित चित्रों को चीर डालोगे, गढ़ी हुई मूर्तियों को काट डालोगे, उनका नाम तक वहाँ से मिटा डालोगे। संदर्भ—1
13:6 — यदि तुम्हारा सगा भाई जो है तुम्हारी अपनी माँ का बेटा, या तुम्हारा पुत्र, या तुम्हारी पुत्री, या तुम्हारी पत्नी जो तुम्हारे हृदय में बसती हो, या तुम्हारा वह मित्र जो तुम्हारी अपनी आत्मा के समान है — इनमें से यदि कोई तुम्हें चुपके से फुसलाए कि चलो हम चल कर दूसरे धर्म के भगवान की पूजा करें जो न तुम्हारे भगवान हैं न तुम्हारे पूर्वजों के
13:8 न तुम अपनी सहमति दोगे, न तुम उसकी बात सुनोगे, न तुम्हारी नज़र में उसके प्रति दया होगी, न तुम उसे क्षमा करोगे, न तुम उसे छुपाओगे
13:9 तुम उसे अवश्य ही मार डालोगे, तुम्हारा हाथ वह पहला हाथ होगा जो उसे मृत्यु के द्वार तक पहुँचाएगा, उसके पश्चात दूसरे लोगों के हाथ उस पर पड़ेंगे
13:10 और तुम उसे पत्थरों से मारोगे ताकि वह मर जाए क्योंकि उसने तुम्हें तुम्हारे अपने भगवान से दूर ले जाने की चेष्टा की। संदर्भ-1 
20:16 - उन शहरों को जिनका तुम्हें तुम्हारे भगवान ने उत्तराधिकारी बनाया, उन शहरों के लोगों में से किसी को भी साँस लेता न छोड़ना
20:17 उन्हें पूर्णतया नष्ट कर देना। संदर्भ 1
32:24 - उन्हें भूख से तड़पाओ और जलती हुई आग की लपटों को निगल जाने दो उनके शरीरों को, उनकी मौत अत्यंत दुःखद हो, मैं भी भेजूँगा जानवरों को जिनके दाँत उनके शरीरों पर गड़ेंगे और साँपों को जिनका विष उन्हें धूल चटाएगा
32:25 बिना तलवार के उनके दिलों में आतंक भर दो, नष्ट कर दो जवाँ मर्दों को, कुमारियों को, माँ का दूध पीते नन्हे बच्चों को, और वृद्धों को जिनके बाल पक चुके हों।

यहूदी बाइबिल ओल्ड टेस्टामेंट — ईसाइयाह (संदर्भ 1)

13:16 - उनकी आँखों के सामने उनके बच्चों को पूरी शक्ति के साथ उठा कर पटको ताकि उनके टुकड़े-टुकड़े हो जायें, और उनकी पत्नियों का बलात्कार करो।

यहूदी बाइबिल ओल्ड टेस्टामेंट — नम्बर्स (संदर्भ 1)

31:17 - बच्चों में प्रत्येक नर का कत्ल कर डालो और प्रत्येक उस स्त्री का भी जिसने किसी पुरुष के साथ सहवास किया हो 31:18 पर उन सभी मादा बच्चों को जिन्होंने किसी पुरुष के साथ सहवास न किया हो, उन्हें अपने लिए जीवित रखो।  

यहूदी बाइबिल ओल्ड टेस्टामेंट — एक्सोडस (संदर्भ 1)

23:24 - तुम दूसरों के गॉड (ईश्वर) के सामने न तो झुकोगे और न उनकी सेवा करोगे, बल्कि उन्हें पूरी तरह से विध्वंश कर दोगे, उनकी मूर्तियों तोड़-फ़ोड़ कर नष्ट कर दोगे।
34:13 - तुम उनकी पूजा की वेदियों ध्वंश कर दोगे, उनकी मूर्तियों को तोड़ दोगे, उनके उपवनों को काट डालोगे 34:14 तुम किसी भी दूसरे भगवान की सेवा न करोगे क्योंकि लॉर्ड, जिसका नाम ईर्ष्यालु है, वह एक ईर्ष्यालु ग़ॉड हैं। 

यहूदी बाइबिल ओल्ड टेस्टामेंट — नाहुम (संदर्भ 1)

1:2 - गॉड ईर्ष्यालु हैं, और लॉर्ड बदला लेते हैं; जब लॉर्ड बदला लेते हैं तो वह क्रोधोन्मत्त हो जाते हैं; लॉर्ड प्रतिशोध लेंगे अपने विरोधियों से; वे अपना क्रोध बरसाते हैं अपने शत्रुओं पर   

ईसाई बाइबिल — निउ टेस्टामेंट टिप्पणियाँ

ईसाई बाइबिल निउ टेस्टामेंट — मैथ्यू (संदर्भ 1)

सेंट मैथ्यू ईसा मसीह के बारह मुख्य शिष्यों में से एक थे और उन्होंने ईसा से जो सुना और सीखा उसे गॉस्पेल में लिपिबद्ध किया। गॉस्पेल कहते हैं ईसा की जीवनी एवं उनकी शिक्षाओं के संकलन को। सुनिए ईसा की कथनी मैथ्यू की जबानी।

10:34 - न सोचो कि मैं आया हूँ विश्व में शांति लाने के लिए - मैं आया हूँ शांति के लिए नहीं बल्कि तलवार लिए
10:35 क्योंकि मैं आया हूँ आदमी को अपने पिता के विरुद्ध खड़ा करने के लिए - पुत्री को माता के विरुद्ध - बहू को सास के विरुद्ध
10:36 और मनुष्य का शत्रु होगा उसका अपना परिवार।
12:30 वह जो मेरे साथ नहीं वह मेरे विरुद्ध है।

ईसाई बाइबिल निउ टेस्टामेंट — ल्यूक

सेंट ल्यूक बाइबिल में एक गॉस्पेल के लेखक हैं।

12:51 - तुम समझते हो कि मैं आया हूँ इस धरती को अमन चैन देने? मैं तुम्हें बताता हूँ - नहीं। मैं आया हूँ बँटवारा करने
12:52 क्योंकि अब से घर में पाँच बटे होंगे - तीन दो के विरुद्ध - दो तीन के विरुद्ध 
12:53 पिता होगा पुत्र के विरुद्ध - पुत्र होगा पिता के विरुद्ध - माँ होगी पुत्री के विरुद्ध - पुत्री होगी माता के विरुद्ध - सास होगी बहू के ख़िलाफ़ - बहू होगी सास के ख़िलाफ़।
14:26 - यदि एक व्यक्ति मेरे पास आता है और वह अपने पिता से घृणा नहीं करता - एवं माता से, पत्नी से, संतानों से, भाई-बहनों से, एवं अपने-आप से भी - तो वह मेरा शिष्य नहीं बन सकता।

ईसाई गॉस्पेल ऑफ थॉमस

सेंट थॉमस ईसा मसीह के बारह मुख्य शिष्यों में से एक थे और उन्होंने ईसा से जो सुना और सीखा उसे गॉस्पेल में लिपिबद्ध किया। सुनिए ईसा की कथनी थॉमस  की जबानी।

16 ईसा ने कहा संभवतः लोग सोचते हैं कि मैं आया हूँ विश्व में शांति स्थापना हेतु - वे नहीं जानते कि मैं आया हूँ इस धरती पर फूट डालने के लिए - आग, तलवार और युद्ध फैलाने के लिए - जहाँ पाँच होंगे एक परिवार में - वहाँ तीन होंगे दो के विरुद्ध और दो होंगे तीन के विरुद्ध - पिता होगा पुत्र के विरुद्ध और पुत्र पिता के - और वे डटे रहेंगे क्योंकि वे दोनों अपने आप में अकेले होंगे।
56 जो अपने पिता से घृणा नहीं करेगा और अपनी माता से भी, वह मेरा शिष्य नहीं बन सकता। वह जो अपने भाइओं एवं बहनों से घृणा नहीं करेगा, और अपना क्रॉस नहीं ढोयेगा जैसा कि मैंने किया है, वह मेरे योग्य न बन पायेगा।

पवित्र कुरआन

कुरआन से प्रस्तुत किए गए उद्धरणों में सूरा 2 अल'बकरा आयत 193 का अर्थ है अध्याय 2 शीर्षक अल'बकरा श्लोक 193

संदर्भ

  1. कुरआन मजीद, हिंदी अनुवाद मुहम्मद फ़ारुक खाँ, अँग्रेज़ी अनुवाद मु0 मा0 पिक्थाल, मक्तबा अल-हसनात, दरिया गंज, नई दिल्ली, 2003
  2. द कैलकटा कुरान पेटिशन, संकलन एवं संपादन सीता राम गोयल, वॉयस ऑफ इंडिया, नई दिल्ली, 1999
  3. कुरआन मजीद, हिंदी अनुवाद हज़रत मौलाना अब्दुल करीम पारेख साहब, एजुकेशनल पबलिशिंग हाउस, लाल कु आँ दिल्ली, इंडिया रिलिजस बुक सेंटर, नागपुर
  4. एमिनेंट हिस्टोरियन्स, अरुण शोउरी, ए एस ए, नोयडा, 1998
  5. अ हिंदू विउ ऑफ द वर्ल्ड, एन एस राजाराम, वॉयस ऑफ इंडिया, नई दिल्ली, 1998  

मुस्लिम कुर'आन सूरा 2 अल'बकरा

आयत 193 - तब तक उनसे लड़ते रहो जब तक मूर्ति पूजा बिल्कुल खत्म न हो जाये और अल्लाह का मज़हब सबपर राज करे (संदर्भ 2)
आयत 216 - लड़ना तुम्हारी मजबूरी है, चाहे तुम कितना भी नापसंद करो इसे। (संदर्भ 2)

मुस्लिम कुर'आन सूरा 4 अन'निसा

आयत 91 - वे जो पीठ मोड़ लें, उन्हें पकड़ो जहाँ भी उन्हें पाओ, और उन्हें हिंसा पूर्वक कत्ल कर डालो। संदर्भ 4
आयत 56 - वे जो अल्लाह के आदेश को नहीं मानते हैं, हम उन्हें आग में झोंक देंगे और जब उनकी चमड़ी पिघल जाए तो हम उनकी जगह नई चमड़ियाँ डाल देंगे ताकि उन्हें स्वाद मिले यंत्रणा का। अल्लाह सबसे अधिक शक्तिमान हैं एवं विवेक पूर्ण हैं। (संदर्भ 1)

मुस्लिम कुर'आन सूरा 8 अल'अन्फ़ाल

आयत 12 - जो मेरे अनुयायी नहीं हैं, मैं उनके हृदयों में आतंक भर दूँगा। उनके सर धड़ से अलग कर दो, उनके हाथ और पाँंव को इस कदर जखमी कर दो कि वे किसी भी काम के लायक न रह जायें। संदर्भ 2
आयत 15 से 18 तक - वो तुम नहीं, बल्कि अल्लाह था, जिसने हिंसापूर्ण ढंग से उन्हें मार डाला। वह तुम नहीं थे जिसने उन पर दृढ़ता पूर्वक प्रहार किया। अल्लाह ने उन पर दृढ़ता पूर्वक प्रहार किया ताकि वह तुम जैसे अनुयायी को भरपूर पुरस्कार दे सके। संदर्भ 2
आयत 39 तब तक उन पर हमला करते रहो जब तक मूर्ति पूजा का नामों निशाँ न मिट जाये और सब अल्लाह के मज़हब के अधीन न हो जायें। संदर्भ 2
आयत 67 - पैगंबर, युद्ध बंदी तब तक न बनायेगा, जब तक वह, उस जमीन पर कत्लेआम न कर ले। संदर्भ 2

मुस्लिम कुर'आन सूरा 9 अत'तौबा

आयत 2-3 अल्लाह एवं उनके पैगंबर मुक्त हैं, किसी भी दायित्व से, मूर्ति पूजकों के प्रति... उन्हें ऐसी सजा दो कि वे शोक ग्रस्त हो जायें। संदर्भ 2
आयत 5 - जब हराम महीने बीत जायें तो मूर्तिपूजकों को कत्ल कर डालो जहाँ भी पाओ उन्हें। छिप कर घात लगाये बैठे रहो उन पर आक्रमण करने के लिए। उन्हें घेर लो और बन्दी बना लो। यदि उन्हें मूर्तिपूजक होने का पछतावा हो और वे इस्लाम कबूल कर लें, नमाज़ पढ़ें, ज़कात (कर) दें तब उनका मार्ग छोड़ दो। अल्लाह ने उन्हें क्षमा किया और उन पर दया की। (संदर्भ 5)
आयत 7 - अल्लाह और उनके पैगंबर मूर्ति पूजकों को विश्वास की दृष्टि से नहीं देखते।
आयत 39 - ऐ मुसलमानों, अगर तुम युद्ध न करो तो अल्लाह तुम्हें कड़ी सजा देगा और तुम्हारी जगह पर दूसरे आदमी को लायेगा। संदर्भ 2
आयत 41 - चाहे तुम्हारे पास हथियार हों या न हो, चल पड़ो और लड़ो अल्लाह की खातिर, अपने धन और अपने शरीर के साथ संदर्भ 2
आयत 73 - ओ पैगंबर! जो मुझमें विश्वास नहीं करते, उनसे युद्ध छेड़ो। उन पर कठोर बनो। उनका अंतिम ठिकाना नरक है, एक दुर्भाग्य पूर्ण यात्रा का अंतिम चरण। संदर्भ 2
आयत 111 - अल्लाह ने खरीद लिया है, अल्लाह पर विश्वास करने वालों से (अर्थात मुसलमानों से), उनकी जिन्दगी और उनकी धन-सम्पत्ति क्योंकि (जन्नत) स्वर्ग उनका होगा -वे लड़ेंगे अल्लाह के लिए, हिंसा पूर्वक कत्ल करेंगे अल्लाह के लिए, और कट मरेंगे अल्लाह के लिए। यह वचन है अल्लाह का तोराह में (यहूदियों का धर्मग्रंथ), गॉस्पेल में (ईसा की जीवनी एवं शिक्षायें), एवं कुरआन में, जिससे वह बधें हैं। अल्लाह से बेहतर कौन पूरा करता है अपनी प्रतिज्ञा? आनन्द मनाओ कि यह जो सौदा तुमने किया है (अल्लाह से) यही तुम्हारी सबसे बड़ी उपलब्धि है। संदर्भ 1
आयत 123 - मुसलमानों, तुम्हारे आस-पास जो भी गैर-मुसलमान बसते हैं, हमला बोल दो उन पर, उन्हें जताओ कि तुम कितने कठोर हो। संदर्भ 2

मुस्लिम कुर'आन सूरा 22 अल'हज़्ज़

आयत 19-22 आग के परिधान (वस्त्र) बनाये गए हैं उनके लिए जो इस्लाम को नहीं अपनाते। उबलता हुआ पानी उनके सर पर डाला जायेगा ताकि उनकी चमड़ी भी पिघल जाए और वह सब भी पिघल जाए जो उनके पेट में है (अँतड़ियाँ भी)। उन पर कोड़े बरसाये जाएँ, आग में तपते  हुए लाल लोहे के बने कोड़ों से। संदर्भ 2

मुस्लिम कुर'आन सूरा 33 अल'अहज़ाब

आयत 36 जब अल्लाह एवं उसके पैगंबर ने निर्णय कर लिया है, किसी भी बात पर, तो किसी मुसलमान मर्द या औरत को यह हक नहीं कि वह उस बारे में, कुछ भी कह सके। संदर्भ 1

मुस्लिम कुर'आन सूरा 47 मुहम्मद

आयत 4 से 15 तक - जब तुम्हारा सामना हो गैर-मुसलमानों से, युद्धभूमि पर, उनके सर काट डालो। जब तुम उन्हें कुचल डालो तो कस कर बाँधो। उनसे धन वसूल करो। उनके हथियार डलवा दो। तुम ऐसा ही करोगे। यदि अल्लाह ने चाहा होता तो वह स्वयं उन्हें नष्ट कर देता, तुम्हारी सहायता के बिना। पर उसने यह आदेश दिया है, ताकि वह तुम्हारी परीक्षा ले सके। और वे जो अल्लाह के लिए लड़ते हुए कट मरेंगे, अल्लाह उनके काम को व्यर्थ न जाने देगा। वह उन्हें जन्नत में बुला लेगा। अल्लाह का वचन है यह। मुसलमानों, यदि तुम अल्लाह की सहायता करते हो, तो अल्लाह तुम्हारी सहायता करेगा, और तुम्हें मज़बूत बनायेगा। पर जो अल्लाह का न होगा वह अनन्त काल तक नरक में सड़ेगा। अल्लाह केवल मुसलमानों की ही रक्षा करेगा। गैर-मुसलमानों का कोई भी रखवाला नहीं। जो सच्चे धर्म (इस्लाम) को अपनायेंगे उन्हें अल्लाह जन्नत में दाखिल करेगा। जो मुसलमान नहीं बनेंगे, वे वही खायेंगे जो जानवर खाते हैं, नर्क उनका घर होगा... वे वहाँ अनन्त काल तक रहेंगे, और खौलता हुआ पानी पिएँगे जो उनकी अँतड़ियों को चीर देगा। संदर्भ 2 

मुस्लिम कुर'आन सूरा 48 अल'फ़तह

आयत 29 - मुहम्मद अल्लाह के पैगंबर हैं। जो उनका अनुसरण करते हैं वे गैर-मुसलमानों के प्रति बेरहम होते हैं पर एक दूसरे (मुसलमानों) के प्रति कृपालु होते हैं। संदर्भ 2

मुस्लिम कुर'आन सूरा 60 अल'मुम्तहना

आयत 4 - शत्रुता एवं घृणा ही रहेगी हमारे बीच तब तक जब तक तुम केवल अल्लाह के बंदे न बन जाओ। संदर्भ 2

मुस्लिम कुर'आन सूरा 66 अत'तहरीम

आयत 9 - ओ पैगंबर! जो मुझमें (अल्लाह में) विश्वास नहीं करते, उन पर हमला करो और उनके साथ कठोरता से पेश आओ। नर्क उनका निवास होगा, दुर्भाग्य पूर्ण उनका भाग्य होगा। संदर्भ 2

मुस्लिम कुर'आन सूरा 69 अल'हक्का

आयत 30-33 उसे पकड़ो और उसे बाँधो। जलाओ उसको नर्क की आग में और उसके बाद बाँधो उसे एक जंजीर से, जो हो सत्तर क्युबिट लंबा, क्योंकि उसने अल्लाह को नहीं स्वीकारा, जो हैं सबसे ऊपर। संदर्भ 2

सनातन धर्म — हिन्दू धर्म

संदर्भ

  1. श्रीमद्भगवद्गीता, गीता प्रेस, गोरखपुर
  2.  अ हिंदू विउ ऑफ द वर्ल्ड, एन एस राजाराम, वॉयस ऑफ इंडिया, नई दिल्ली, 1998
  3.  चान्ट्स ऑफ इंडिया, पंडित रवि शंकर, ऐंजेल रेकॉर्ड्स, 2002
  4.  सेलेक्शंस फ़्रॉम हिंदू स्कृप्चर्स - मनुस्मृति, प्रोफ़ेसर जी सी असनानी, पुणे, 2000

भगवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 29

मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है; परन्तु जो भक्त मुझको प्रेमसे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं भी उनमें प्रत्यक्ष प्रकट हूँ। संदर्भ 1

ऋग्वेद 1-164-46

ब्रह्माण्डीय सत्य एक है परन्तु प्रज्ञावान उसे भिन्न-भिन्न ढंग से अनुभव करते हैं - जैसे इंद्र, मित्र, वरुण, अग्नि, शक्तिशाली गरुत्मत, यम एवं मतरिस्वन। संदर्भ 2

शिवमहिम्ना स्तोत्र 3

जिस प्रकार से अनगिनत नदियाँ भिन्न-भिन्न मार्गों से, सीधे या टेढ़े-मेढ़े रास्तों से, बहती हुई अंत में जाकर उसी सागर से मिलती हैं, उसी प्रकार सभी इच्छुक  तुम (ईश्वर) तक जा पहुँचते हैं, अपनी-अपनी चेष्टाओं के द्वारा, अपनी-अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार। संदर्भ 2 

तैत्रीय उपनिशद, ब्रह्मवल्लि एवं भृगुवल्लि, शांति मंत्र

ईश्वर हम सभी की रक्षा करें। ईश्वर हम सभी का पोषण करें। हम सभी साथ काम करें, एक होकर मानवता की भलाई के लिए। हमारा ज्ञान ज्योतिर्मय हो एवं अर्थपूर्ण हो। हममें एक-दूसरे के प्रति घृणा न हो। चारों तरफ शांति हो, शांति एवं सम्पूर्ण शांति हो। संदर्भ 3

तैत्रीय अरण्यक, चतुर्थ प्रश्न, प्रवर्ग्य मंत्र, 42वा अनुवाक

पृथ्वी पर शांति हो, आकाश में शांति हो, स्वर्ग में शांति हो, सभी दिशाओं में शांति हो, अग्नि में शांति हो, वायु में शांति हो, सूर्य में शांति हो, चंद्रमा में शांति हो, ग्रहों में शांति हो, जल में शांति हो, पौधों में शांति हो, जड़ी-बूटियों में शांति हो, पेड़ों में शांति हो, गाय-बैलों में शांति हो, बकरियों में शांति हो, घोड़ों में शांति हो, मानवों में शांति हो, ब्रह्म में शांति हो, उन व्यक्तियों में शांति हो जिन्होंने ब्रह्म को पाया हो, शांति हो, केवल शांति हो। वह शांति मुझमें हो, केवल शांति! उस शांति के द्वारा अपने-आपमें शांति स्थायी कर सकूँ, और सभी द्विपादों में एवं चतुर्पादों में। ईश्वर करें मुझमें शांति हो, केवल शांति। संदर्भ 3

सर्वे शाम

सब का भला हो। सब के लिए शांति हो। सभी पूर्णता के योग्य हों एवं सभी उसकी अनुभूति करें जो शुभ हो। सभी आनन्दित हों। सभी स्वस्थ हों। सभी के जीवन में वह हो जो भला है एवं कोई भी कष्ट में न हो। संदर्भ 3

तैत्रीय उपनिषद, शिक्षावल्लि, 10वा अनुवाक

देवी-देवताओं एवं पूर्वजों के प्रति अपने दायित्वों की अवहेलना न करो। तुम्हारी माता तुम्हारे लिए एक देवी स्वरूप हों। तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए एक देवता स्वरूप हों। तुम्हारे गुरु तुम्हारे लिए एक देवता स्वरूप हों। तुम्हारे अतिथि तुम्हारे लिए एक देवता स्वरूप हों। जहाँ भी तुम दोष रहित कर्मों को किए जाते हुए देखो, केवल उन्हीं का अनुसरण करो, अन्य कर्मों का नहीं। हम जो तुम्हारे गुरु हैं, जब तुमने देखा है हमें अच्छे कर्म करते हुए तो केवल उन्हीं कर्मों का अनुसरण करो। संदर्भ 3 

बृहद अरण्यक उपनिषद, प्रथम अध्याय, तृतीय ब्रह्मणा, 28वा मंत्र

हे ईश्वर! कृपया मुझे ले चलो नश्वर से अनश्वर की ओर। ले चलो अज्ञान से ज्ञान की ओर। ले चलो मुझे आवागमन की प्रक्रिया से मुक्त कर मोक्ष की ओर। शांति हो, शांति एवं सम्पूर्ण शांति। संदर्भ 3

मनु स्मृति

7-90 जब राजा अपने शत्रु से युद्ध भूमि पर लड़े तो वह किसी ऐसे अस्त्र का प्रयोग न करे जो छुपा हुआ हो, कँटीले तारों से बुना हुआ हो, विष बुझा हो, अथवा जिसके फलक से आग लपलपा रही हो।
7-91 राजा उस पर वार न करे जो युद्ध भूमि छोड़ कर भाग रहा हो अथवा डर के मारे पेड़ पर चढ़ गया हो। राजा उस पर वार न करे जो नपुंसक हो, या जिसने विनय पूर्वक दोनों हाथ जोड़ लिए हों, अथवा जो युद्ध भूमि से पलायन कर रहा हो, या जिसने घुटने टेक दिए हों और कहता हो कि मैं तुम्हारी शरण में हूँ।
7-92 न उस पर जो सो रहा हो, या जिसके कवच खो गए हों, अथवा जो नग्नावस्था में हो, या फिर जिसने हथियार डाल दिए हों, न उस पर जो युद्ध में भाग न लेता हुआ केवल एक दर्शक मात्र हो, न उस पर जो एक दूसरे शत्रु से युद्ध कर रहा हो।
7-93 न उस पर जिसके अस्त्र टूट चुके हों, न उस पर जो शोक में डूबा हुआ हो, न उस पर जो भीषण रूप से घायल हो, न उस पर जो आतंकित हो, न उस पर जो युद्ध क्षेत्र से भाग रहा हो। राजा के ध्यान में रहे एक गौरवपूर्ण योद्धा की आचरण-संहिता। संदर्भ 4

 

तुम्हारी आज की यह उदासीनता, आने वाली कल की तुम्हारी सन्तानों को बड़ी महंगी पड़ेगी

बाइलिंगुअल से यूनिकोड

20 मई 2011 — यह पुस्तिका 2005 में बाइलिंगुअल फ़ॉन्ट में लिखी गई थी। 2011 में इसे सॉफ़्टवेयर द्वारा यूनिकोड में परिवर्तित किया गया ताकि इसे इंटरनेट पर पढ़ा जा सके। जब सॉफ़्टवेयर द्वारा परिवर्तन किये जाते हैं तो कुछ (वर्तनी / स्पेलिंग) की अजीब गलतियाँ सॉफ़्टवेयर द्वारा जोड़ दी जाती हैं। जहाँ मेरी दृष्टि पड़ जाती है उसे मैं ठीक कर देता हूँ पर समयाभाव में पूरी जाँच करना मेरे लिये वर्तमान में संभव नहीं। यदि आपकी दृष्टि ऐसी किसी गलती पर पड़े तो कृपया मुझे सूचित करें ताकि मैं उन्हें ठीक कर दूँ तथा अन्य पाठकों को असुविधा न हो। आपकी इस सहायता के लिए आभारी रहूँगा।

टिप्पणियाँ  पवित्र बाइबिल के संदर्भ में

कोई दो-तीन महिनों पहले मैं बाइबल के एक हिंदी संस्करण की खोज में चर्च के एक प्राधिकृत पुस्तकों की दुकान पर गया। खरीदने के पहले मैंने कुछ हिस्सों का परीक्षण किया। मैंने पाया कि भाषा की चतुराई का प्रयोग कर मूल भावों को एक नया जामा पहना दिया गया था। स्पष्ट था कि यह हिन्दी संस्करण विशेष रूप से उन हिन्दुओं के लिए तैयार किया गया था जिनका धर्म परिवर्तन किया गया होगा। चर्च यह नहीं चाहता होगा कि इन लोगों को सांकृतिक आघात मिले।

उनके प्रोत्साहन के लिए बड़े (8.5"x5.5") 1957 पृष्ठों की इस हिंदी संस्करण का मूल्य केवल 50 रुपये रखा गया था जबकि उसकी "लगभग एक-चौथाई परिमाण" की छोटे (6.5"x4") 986 पृष्ठों की अंग्रेज़ी संस्करण के लिए, कोई दो वर्ष पहले इसी मुम्बई में, मैंने 220 रुपये दिये थे (4 गुणा से अधिक मूल्य)। स्वाभाविक है कि उस यूरोपियन संस्करण को किसी विशेष उद्देश्य से नहीं तैयार किया गया था।

प्रदर्शन-मंजूषा में रखी हुई, बाइबल के एक बड़े एवं मोटे-से आकर्षक अँग्रेज़ी संस्करण पर मेरी नज़र पड़ी। एक विश्व-विख्यात प्रकाशक का नाम इससे जुड़ा हुआ था, इस पर प्रामाणिकता की मुहर लगाने के लिए। आकर्षक ढंग से लिखा हुआ था कि इस संस्करण का उद्देश्य बाइबल को सहज भाषा में प्रस्तुत करना मात्र था। उसके कुछ नमूनों का मैंनें परीक्षण किया। इस संस्करण का निहित उद्देश्य सामने आ गया। भाषा को सहज बनाते समय मूल भावों को बड़ी  सहजता के साथ बदल दिया गया था।

टिप्पणियाँ  पवित्र कुरआन के संदर्भ में

कुरआन के हिंदी अनुवादों में मूल भावों की गम्भीरता को कम करने के लिए दो प्रकार के प्रयोग नजर आ रहे हैं

  1. शब्दों का चयन चतुराई के साथ।
  2. कठिन उर्दू शब्दों का अत्यधिक प्रयोग ताकि अर्थ एवं भाव दोनों अस्पष्ट रहें

इस कारण, मैं अँग्रेज़ी में उपलब्ध अनुवादों पर अधिक निर्भरशील हूँ क्योंकि कई लेखकों की सामग्री के परीक्षण के पश्चात मैंने पाया कि वे सभी लगभग एक ही बात कहते हैं, शब्दों के थोड़े हेर-फेर के साथ 

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