वे जो, हिन्दू देवी-देवताओं के बारे में, इतनी गंदी-गंदी बातें कहते हैं
और आप हैं कि बस चुप्पी साधे बैठे रहते हैं

अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मानक संख्या ISBN 978-81-89746-16-2 प्रकाशित 25 जनवरी 2006

पुस्तक समीक्षायें

12 मार्च 2006

महामण्डलेश्वर श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ परमहंस परिव्राजकाचार्य
श्री श्री 1008 डॉ स्वामी शिव स्वरूपानन्द सरस्वती
भागवत, ज्योतिष, वेदान्त, षडदर्शनाचार्य (पी-एच.डी.)
श्री मानव कल्याण आश्रम, कनखल, हरिद्वार पिन कोड 249 408

"परमप्रिय आत्म स्वरूप मानोज रखित जी
जय श्री कृष्ण।
आपकी पुस्तक मिली। पढ़ कर अत्यन्त प्रसन्नता हुई कि कम से कम कोई तो ऐसा व्यक्ति है जो विदेश में अपमानित देवी-देवताओं के विषय में बोलने का साहस रखता है। यह हमारी सनातन संस्कृति का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि सब कुछ होने के बाद भी कोई हिन्दू बोलने को तैयार नहीं है। आज आवश्यकता है कि ईसाइयों एवं मुसलमानों द्वारा जो सनातन धर्म के साथ में कुकृत्य किये जा रहे हैं उनका जवाब दिया जाय। जिसके लिए नवीन पीढ़ी को भी तैयार करना होगा।
मैं भी अपने प्रवचनों में इस बात को उठाता रहता हूँ तथा सभी को इन सभी बातों का विरोध करने के लिए भी कहता हूँ। इस तरह के प्रयास की मैं आपकी प्रशंसा करता हूँ तथा आगामी समय में मेरे लायक जो भी सेवा हो निःसंकोच बताने का कष्ट करें। जिससे अन्य सभी समाज के सामने इन चीजों को रखा जा सके।
आपके प्रयास की पुनः पुनः सराहना करते हुए आपसे आग्रह भी है कि अपने इस कार्य को आगे बढ़ाते रहें तथा हम सभी को भी अवगत कराते रहें।"
आपका शुभेच्छु
महामण्डलेश्वर डॉ स्वामी शिवस्वरूपानन्द सरस्वती
हस्ताक्षर
10 अप्रैल 2006

डॉ ओम प्रकाश उर्फ़ 'विवेकानन्द प्रकाश',
ग्राम छोटीपुरवा, पोस्ट इस्माइलपुर, जिला बाराबंकी,
उप्र, पिन 225301

"आप द्वारा प्रेषित 'कहानी एक षड़यंत्र की' पुस्तिका प्राप्त हुई। इसके पहले 'हिन्दू देवी-देवताओं' के प्रति अश्लील प्रचार संबंधी पुस्तिका प्राप्त हुई थी, जिसे पढ़कर अन्य जागरूक लोगों को पढ़वा रहा हूँ। लखनऊ के माननीय श्री रवि कान्त खरे बाबाजी से 'मज़हब ही सिखाता है आपस में बैर रखना' कुछ पुस्तिकायें प्राप्त हुईं थीं जिनका क्षेत्र में क्रमवार अध्ययन हो रहा है। आपके विचार प्रभावशाली एवम प्रेरक होने के साथ ही हिन्दू समाज के जागरण हेतु महत्वपूर्ण हैं। इसके लिए हम आपके प्रति आभार व्यक्त करते हुए साधुवाद देते हैं। यदि सम्भव हो तो ये पुस्तिकायें अपनी सुविधानुसार भेजने का कष्ट करें जिन्हें हम लोगों में वितरित कर आपके विचार जनसामान्य तक पहुँचाते हुए जनजागरण में अपने कर्तव्य का पालन कर सकें।" डॉ ओम प्रकाश (10-4-2006)
8 जुलाई 2006

स्वामी नर्मदानन्द सरस्वती 'हरिदास',
फार्मा ट्रेडर्स के सामने, राइट टाउन,
जबलपुर, म प्र 482-002

"आपके द्वारा प्रेषित 4 पुस्तकें (16, 18, 19, 20) प्राप्त हो गई हैं तदर्थ बहुशः साधुवाद। आपकी सभी पुस्तकें सनातन धर्मियों की आखें खोलने वाली, सुन्दर रूप में उत्तम विचार-प्रणाली को लेकर, पुष्ट तर्क से संपुटित सरल, बोधगम्य भाषा में लिखित हैं जिससे समाज समाधान की दिशा में अग्रसर हो सकता है। भैया हमारे राम की 67 वर्ष की आयु है शरीर रोगवश जीर्ण हो गया है सो हम तो भगवन्नाम एवं भगवत महिमा लेखन ही यकिंचित कर पाते हैं। अतएव आपके इस जनता को चैतन्य करने के कार्य में हार्दिक शुभकामनायें हमारी आपके साथ हैं और सदैव रहेंगी। शेष श्री हरिकृपा।" स्वामी नर्मदानन्द सरस्वती 'हरिदास' (8-7-2006)

उत्तर — यहाँ पुस्तक क्रमांक 20 की विषय-वस्तु का एक और पहलू उजागर होता है। हम सभी जीवन के अलग-2 मोड़ों पर खड़े हैं। यही निर्धारण करता है हमारे आज के कर्तव्य का। जब मनुष्य का शरीर जराजीर्ण हो चुका हो एवं वह इहलोक त्यागकर परलोक की ओर एक-एक कदम बढ़ा रहा होता है, तो भगवद्चिन्तन ही सर्वथा उचित है। मानोज रखित (20-11-2006)

मार्च 2006

श्री प्रमोद प्रकाश सक्सेना, 
91 चित्रगुप्त नगर, कोटरा,
भोपाल, म प्र

"आपने निश्चित रूप से इस पुस्तक को लिखने में काफ़ी परिश्रम किया है और इसमें जो तथ्य प्रकट किए हैं वे किसी भी चिन्तनशील व्यक्ति पर भावनात्मक प्रभाव डालने में सक्षम हैं। पुस्तक में वर्णित अनेक तथ्य सत्य प्रतीत होते हैं, यह वास्तव में अत्यन्त दुःख की बात है कि हमारा हिन्दू समाज बहुत सारे तथ्यों से अनभिज्ञ है और अनेक मौकों पर उसकी एकजुटता का अभाव विपरीत स्थितियों को जन्म देता है।
आपने इस बाबत एक इतिहास की भांति कुछ तथ्यों पर प्रकाश डाला किन्तु इन सब विपरीत परिस्थितियों में समाधान क्या हो सकता है, इसका उल्लेख अथवा संकेत नहीं किया। आपने जब इतना विशद अध्ययन और श्रम किया है तब आपके दिमाग में कहीं न कहीं उसका समाधान अथवा उसके लिए किये जाने वाले क्रियाकलापों का विचार अवश्य होगा। मैं चाहूँगा कि वह दिशादर्शन आप प्रस्तुत करें तो आपके साथ अधिक से अधिक लोग क्रमशः जुड़ते जायेंगे।
अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद के लिए मै अपनी सेवायें प्रस्तुत कर सकता हूँ। हाँ, विषय-वस्तु महत्वपूर्ण होना आवश्यक है।"

उत्तर (2006) — श्री प्रमोद प्रकाश सक्सेना जी का आभार मानते हुए कि उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाये हैं, मैं उन्हें एवं बाकी पाठकों को - जिनके भी मन में ये प्रश्न उठे होंगे - उन सभी को यह आश्वासन देना चाहूँगा कि समाधान की बातें अवश्य होंगी पर उपयुक्त समय आने पर।

संकेत का कोई एक पहलू प्रत्येक पुस्तक में छुपा होता है पर उसे समाधान का नाम देकर नहीं। हमें एक-एक कदम लेना होगा। राह बीहड़ है। अँधेरा घना है। पहले रोशनी की जरूरत है। राह की पहचान आवश्यक है। तब न वे आगे बढ़ेंगे जो मेरे साथ जुडेंगे।

स्थिति की जटिलता से उन्हें पहले पूरी तरह अवगत कराना है। तब समाधान स्वयं नज़र आने लगेगा। थोड़ा समय लगेगा, पर उतना नहीं जितना उन्हें लगा था हमें तोड़ने के लिए (1835 से 1990)।

युद्ध की ओर अग्रसर होने से पहले शत्रु की पूरी पहचान, उसकी शक्तियों एवं आसक्तियों की समझ, अपनी जड़ों की मजबूती की परख, एवं कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर खड़े नारायण के प्रति पूर्ण समर्पण की भावना जगानी आवश्यक है।

क्रान्ति का बीज मस्तिष्क में बोया जायेगा, जड़ें हृदय तक पहुँचेंगी और मजबूत बनेंगीं। तब उठ खड़ा होगा आम हिन्दू। राजनीति उसे उद्वेलित न कर सकेगी। धर्म उसे प्रेरित करेगा अपने कर्म की ओर।

वह होगा तब, जब आयेगी आम हिन्दू को "धर्म" की सही समझ। आज हर कोई धर्म का व्याख्याता बन बैठा है। और उनमें से सबसे अधिक पहुँच है टीवी सीरियल वालों की जिनके जरिए पटकथा लेखक, निर्माता, निर्देशक आपस में तय कर लेते हैं - क्या होनी चाहिए गीता की व्याख्या अलग-अलग पारिवारिक स्थितियों में।

उदाहरण के लिए, आज (दिनांक 27-3-2006 समय 2030-2100) 'स्टार प्लस' पर प्रेरणा नामक मुख्य पात्र के सामने एक कठिन समस्या रखी गई 'देख प्रेरणा, उधर जाता है तेरे धर्म का रास्ता, और ठीक उसकी विपरीत दिशा में जाता है वह तेरा कर्म का रास्ता। अब तू किसको चुनेगी जब तेरे धर्म व कर्म हैं एक दूसरे के ठीक विपरीत?' दुविधा में पड़े प्रेरणा को, पृष्ठभूमि में गीता के ये दो श्लोक बार-बार याद दिलाये जाते रहे 'कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' एवं'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत'। उसके बाद आती है एक आवाज़ पृष्ठभूमि से 'तुझे चुनना है कर्म का रास्ता, जब हो वह धर्म के रास्ते के ठीक विपरीत।'

इस प्रकार, करोड़ों दर्शकों की ज्ञान की पोंटली में समा गया गीता की व्याख्या का एक नया पहलू - धर्म व कर्म के रास्ते एक-दूसरे के ठीक विपरीत भी हो सकते हैं। यदि कर्म को धर्म के विरुद्ध खड़े होने की आवश्यकता हुई तो कहीं न कहीं कर्म एवं धर्म की समझ में कोई खोट रह गई है।

ऐसी खोटी व्याख्याओं का पृष्ठांकन (इन्डॉःसमेंट) "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" एवं "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत" जैसे ऐतहासिक महत्व के उद्धरणों के परिप्रेक्ष्य में नहीं किया जाना चाहिए। कर्म एवं धर्म जैसी महत्वपूर्ण संकल्पनाओं को जन-साधारण के समक्ष प्रस्तुत करते हुए कुछ सावधानी बरती जानी चाहिए। यह नौटंकी लिखने वालों का काम नहीं। 

भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को प्रेरित किया था उस कर्म के लिए जो धर्म के विपरीत नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए था। यह बात सम्भवतः इन लोगों की समझ के बाहर है।

कुछ इसी प्रकार 'स्टार प्लस' के एक और अत्यधिक लोकप्रिय सीरियल में (सन 2002-03) पटकथा लेखक, निर्माता, निर्देशक ने कहानी के एक वयस्क पात्र के माध्यम से, करोड़ों हिन्दुओं को यह सिखा दिया कि भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि - "एक झूठ सौ सच के बराबर होता है, यदि उस झूठ से किसी का भला होता हो"।

जब मैं 'स्टार प्लस' के वेब-साइट पर गया और दर्शकों के पुनर्निवेशन (फ़ीडबैक) के स्थान पर इस प्रसंग का जिक्र करते हुए उनसे पूछा कि बताइये मुझे गीता के किस अध्याय में, कौन से श्लोक में ऐसा कहा गया है कि 'एक झूठ सौ सच के बराबर होता है...'। उनका कोई उत्तर न आया मेरे ईमेल पर।

उन दिनों मैंने गीता का गभीरता से अध्ययन किया था और लगभग सारी गीता मेरे हृदय में स्थित थी (आज नहीं है), और मैं भली-भाँति जानता था कि श्रीमद्भग्वद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने 'एक झूठ को सौ सच के बराबर' कहीं भी, किसी भी श्लोक में नहीं कहा है। मैने उनसे अपने फीडबैक में यह भी आग्रह किया था कि यदि वे मुझे गीता का वह अध्याय और वह श्लोक नहीं बता पाते हैं तो उन्हें अपने सीरीयल के आरम्भ में अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए ताकि दर्शक इस भ्रम में न जीयें, और उससे भी महत्वपूर्ण, कि इस मिथ्या को गीता की आड़ में, उनकी ही तरह, आगे फैलाते न रहें। पर ऐसी कोई स्वीकारोक्ति मुझे देखने को न मिली।

मैं सोचता रहा, क्या वह कबीर ही था जो कह गया था "एक अंधा दूसरे अंधे को राह दिखायेगा, तो दोनों कुँए में जा गिरेंगे"। क्या यही बात लागू होती है इन टीवी सीरियलों के बारे में?

टिप्पणी - यद्यपि मैं इस बात को अस्वीकार नहीं करता हूँ कि इन 'एकता कपूर' के सीरियलों में अनेक अच्छी बातें भी रहती हैं, विशेषकर इनका प्रयास आजकी पीढ़ी को हमारी संस्कृति से बाँधे रखने की दिशा में। यह अलग बात है कि यह प्रयास भी अनेक स्थानों पर सही-गलत कि खिचड़ी जैसी हुआ करती है। इन सबके बावजूद, 'आज की पैदावार एकता कपूर' के इन प्रयासों में बहुत-कुछ अच्छा भी है, जिसे किसी भी तरह नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। मानोज रखित (मार्च, अप्रैल तथा नवम्बर 2006)  

टिप्पणी (31 जनवरी 2012, 03:06 AM) — तुरंत अंग्रेज़ी की समस्त पुस्तकों की एक-एक प्रति उन्हें रजिस्ट्री डाक द्वारा भेज दी जो उन्हें मिल भी गई। महीनों बीत गए, प्रतीक्षा करता रहा, फिर उन्हें पत्र लिख कर हिन्दी रूपान्तर में प्रगति के बारे में पूछा। उन्होंने मुझे लिखा उनकी शिक्षा साधारण स्तर की है तथा अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद करने जैसी योग्यता उनमें है ही नहीं। यह पढ़कर मेरे मन में सवाल उठा कि "हाँ, विषय-वस्तु महत्वपूर्ण होना आवश्यक है" कह कर उन्होंने क्या जतलाना चाहा था?

पुस्तक

ईसाई धर्मावलम्बी, हिन्दू देवी-देवताओं को, किन गंदी नज़रों से देखते हैं?

उनकी नजर में हिन्दू धर्म एक नारकीय/राक्षसी धर्म है, असभ्य लोगों का धर्म है, केवल ईसाई बनाकर हिंदुओं को सुसभ्य बनाया जा सकता है

अमरीका के ईसाई धर्माध्यक्षों के परिवार में जन्मे डॉ डेविड फ़्रावले (वामदेव शास्त्री) अपनी आत्मकथा स्वरूप पुस्तक में लिखते हैं - "वे हमेशा धन माँगते हैं अमरीकी जनसमुदाय से कि हम भारतवर्ष में जाकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करना चाहते हैं। हम यह देखते हैं नित्य विभिन्न टेलिविज़न चैनेलों पर। पैट रॉबर्टसन जो उनके मुख्य धार्मिक नेताओं में से एक हैं उन्होंने कहा है कि हिंदू धर्म एक नारकीय/राक्षसी धर्म है । वे हिंदू देवताओं को जानवरों के सिरों के साथ दिखाते हैं और कहते हैं जरा देखो इन्हें कितने असभ्य हैं ये लोग। वे भारतवर्ष के राज नैतिक एवं सामाजिक समस्याओं को अमरीकी जन समुदाय के समक्ष रख कर कहते हैं यह सब हिंदू धर्म के कारण हैं। वे अमरीकी जन समुदाय से कहते हैं कि हमें धन दीजिए ताकि हम भारतवर्ष जाकर उन्हें इस भयावह हिंदू धर्म के चंगुल से छुड़ाएँ और उन्हें ईसाई बना सकें।" ISBN 81-85990-60-3

पश्चिमी देशों में लाखों-करोड़ों व्यक्ति, हिंदूधर्म के बारे में, इन धारणाओं के साथ जीते हैं

आप अमरीका में रहते होंगे, पर सैकड़ों में से उन्हीं पाँच-सात चैनलों को देखते होंगे जिनमें आपकी रुचि है। अतः आप न तो बुरा देखते हैं, न बुरा सुनते हैं, न आपको बुरा लगता है। पर अमरीका और कैनेडा में ऐसे लाखों गोरी चमड़ी वाले होंगे जो उन चैनलों को देखते हैं और हिंदुओं के बारे में ऐसी-ही धारणाओं के साथ जीते हैं। आप भारतवर्ष में रहते हैं, आपको वे अमरीकी चैनल देखने को मिलते नहीं। आप न बुरा देखते हैं, न बुरा सुनते हैं, न बुरा मानते हैं।

अधिकांशतः हिंदू धर्मगुरू इन समस्यायों के प्रति जागरूक नहीं हैं और इसकी 'तोड़' के बारे में प्रयत्नशील नहीं दिखायी देते हैं

अमरीका में आप अपने गुरु के पास जाते हैं, उनका अपना एक सम्प्रदाय जैसा होता है। वहाँ पाँच-सौ हिंदुओं में दो-तीन गोरी चमड़ी वाले भी होते हैं। अनुयायी उनके पाँव छूते हैं, उनका पंथ अपने पर फैला रहा होता है। आप भी खुश, आप के गुरू भी खुश। किसी को क्या पड़ी है कि सार्वजनिक रूप से विरोध करें कि हिन्दू धर्म का अपमान हम नहीं सह सकते।

किसी ने आपको सिखा दिया है कि 'बुरा मत सुनो, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो' और आपने उसे अपना 'कवच' जैसा बना लिया है

आप भारतवर्ष में रहते हैं, अपनी पसन्द की दो-चार चैनलों को देखते हैं। उन चैनलों को आप देखते नहीं जिनमें हिन्दूओं के विरुद्ध उट-पटांग बातें दिखायी जाती हैं। इस प्रकार आप न बुरा देखते हैं, न बुरा सुनते हैं, न बुरा मानते हैं।

वे मुट्ठीभर जो आपको लगातार सचेत किये रखना चाहते हैं, उनसे आपको 'परहेज' है

ऐसी पत्र-पत्रिकायें जो आपको हिन्दू धर्म के विरुद्ध हो रहे अभियानों के बारे में सचेत करते रहते हैं उन्हें आप पढ़ना नहीं चाहते क्योंकि आपकी दृष्टि में वे सब उग्रवादी हैं, साम्प्रदायिक हैं, धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं (उदाहरण के लिए 'हिन्दू वॉइस' एवं 'सनातन प्रभात')।

स्वाभिमान को तजकर आप उदार बनने की चेष्टा में लगे हैं

आपकी सोच कुछ ऐसी बन चुकी है कि यदि कोई आपको कहता है कि 'मेरे भाई, तुमने तो मुझे केवल एक थप्पड़ मारा है, एक और मार दो' तो आप उसे महान आत्मा घोषित कर देंगे। मानसिक नपुंसकता की महिमा आपके दिलो-दिमाग पर इस तरह छा चुकी है कि स्वाभिमान जैसा शब्द आपके शब्दकोश से कोसों दूर जा चुका है।

क्षात्रधर्म तो आप भुला बैठे और गीता को जाने क्या समझ लिया है

क्षात्रधर्म तो आपने भुला दिया है क्योंकि आपके दिग्दर्शकों ने आपको समझाया कि भगवद्गीता आपको त्याग का सन्देश देती है, आपको अन्तर्मुखी बन कर ईश्वर की साधना में लीन होने को कहती है। महाभारत तो एक पारिवारिक कलह एवं अनावश्यक रक्तपात की कहानी है, अतः उसमें सीख लेने जैसी कोई बात नहीं है।

कोई आपसे यह नहीं कहता कि भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश कुरुक्षेत्र की रणभूमि में ही क्यों दिया, त्याग और ईश्वर प्राप्ति की बातें करनी थीं तो अर्जुन को लेकर किसी वन में क्यों न चले गए?

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि एक समय आयेगा जब मानव-जीवन अपने आप में एक रणक्षेत्र बन जायेगा और आज हम उसी स्थिति में पहुँच गए हैं। आज गीता के संदेश को एक बार फिर से समझने की आवश्यकता है, और वह भी एक नई दृष्टि से।

उनके शब्दों में अमरनाथ की यात्रा का उद्देश्य है विनाश के देवता शिव के कामवासना के अंगों की पूजा

डॉ डेविड फ़्रावले (वामदेव शास्त्री) लिखते हैं -

"न्यूयॉर्क टाइम्स अमरनाथ की तीर्थयात्रा के बारे में लिखता है कि हिंदू जा रहे हैं विनाश के देवता शिव के कामवासना के अंगों की पूजा के लिए।" ISBN 81-85990-60-3

न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे ख्याति प्राप्त समचार पत्र, जो अमरीकी जनमत तैयार करते हैं

न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे ख्याति प्राप्त समचार पत्र, जो अमरीकी जनमत तैयार करते हैं, वे अपने पाठकों को बताते हैं शिव हैं विनाश के देवता और उनके कामवासना के अंगों की पूजा है अमरनाथ तीर्थ यात्रा का मुख्य उद्देश्य।

जरा सोच कर देखिए क्या प्रभाव पड़ता होगा विश्व जनमत पर हिंदू धर्म के बारे में।

 कब तक इस भ्रम में जीयेंगे कि हिंदू धर्म की क्या साख है सारे विश्व में

आप में से अनेक हैं जो फूले नहीं समाते जब देखते हैं मुट्ठी भर गोरी चमड़ी वालों को हिंदू धर्म अपनाते। आप इसी खुशफ़हमी में जीते हैं कि देखो हिंदू धर्म की क्या साख है सारे विश्व में, जो इन गोरी चमड़ी वालों को भी प्रेरित करती है हिंदू धर्म को अपनाने।

कुछ तो यहाँ तक छाप देते हैं कि आज सारा विश्व हिंदू धर्म की महत्ता को मानता है पर हमारे अपने हिंदू उस महत्ता को नहीं समझते। ये अति ज्ञानी लोग उन मुट्ठी भर गोरी चमड़ी वालों को सारे विश्व का प्रतिनिधि मान बैठते हैं।

क्या ऐसा नहीं लगता कि आप अपनी ही नज़रों में इतना गिर चुके हैं कि कोई जरा सा आपकी पीठ थपथपाता और आप फूल कर कुप्पा बन जाते हैं।

आपने खो दी अपनी शिक्षा, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान

यही तो चाहा था उस टीबी मॅकॉले ने जो 'टी-बी' की तरह घुन लगा गया हमारे स्वाभिमान को, जब वह लेकर आया ईसाई मिशनरियों की बटालियन सन 1835 में, हमें ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा पद्धति के साँचे में ढालने के उद्देश्य से।

वह तो सफल हो गया अपने उद्देश्य में और उसका मूल्य चुकाया आपने। आपने खो दी अपनी शिक्षा, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान।

उनके शब्दों में शिव नशे में धुत्त गाँव-गाँव में नंगा घूमता है, शिव मंदिरों में पाओगे एक खड़ा लंड जो है शिव की निरंकुश कामुकता का प्रतीक, शिव की पत्नि 'शक्ति' मद्यपान, व्यभिचार, लाम्पट्य, मंदिरों में वेश्यावृत्ति को प्रोत्साहित करती है, 'काली' दुष्ट, डरावनी, ख़ून की प्यासी

क्या ये रक्तबीज जैसे किसी असुर की ही संतानें हैं?

माँ काली ने रक्तबीज नामक असुर का संहार किया था, जिसके खून का एक कतरा धरती पर गिरने से एक और वैसा ही असुर पैदा हो जाता था। अतः स्वाभविक है कि कोई भी ऐसा असुर माँ काली को श्रद्धा की दृष्टि से नहीं देखेगा। ईसाई भी माँ काली को श्रद्धा की दृष्टि से नहीं देखते। क्या इसका मतलब यह हुआ कि ये ईसाई भी उसी रक्तबीज जैसे किसी असुर की ही संतानें हैं?

प्रतिदिन पैंतीस हज़ार लोगों के मन में हिंदू धर्म के प्रति कैसा विष बोया जाता है 

आज इंटरनेट का बोलबाला है। विश्व के कोने कोने तक अपनी बात पहुँचाने का यह सबसे सस्ता एवं द्रुतगामी माध्यम है। वेब साइट पर एक काउंटर होता है। यह काउंटर गिनता रहता है कितने लोग अब तक इस साइट पर आए हैं। जब भी कोई व्यक्ति विश्व के किसी भी कोने से कंप्यूटर के द्वारा उस साइट पर जाता है तो तत्काल काउंटर उसे रेकॉर्ड कर लेता है। जब मैं गया था तो काउंटर ने 71,11,525 दिखाया। यह कोई साल भर पहले की बात है, 14 फ़रवरी 2005। डॉ जेरोमे का दावा है कि इस साइट को विश्व भर से पैंतीस हज़ार लोग प्रतिदिन देखते हैं। अब सुनिए उनकी जबानी हिंदू धर्म की कहानी। http://religion-cults.com/Eastern/Hinduism/hindu11.htm

भगवान शिव एवं माँ शक्ति की आज यह छवि प्रस्तुत की जाती है

"हिन्दू धर्म है जमघट विभिन्न पंथों का जिसे कहा जा सकता है धार्मिक अराजकता का ज्वलंत उदाहरण। शिव उनमें से सबसे अधिक लोकप्रिय है। उसके सबसे अधिक भक्त मिलेंगे आपको। नटराज के रूप में वह चार हाथों के साथ नाचता है। चारों ओर नंगा घूमता है गाँव गाँव में, नंदी नामक एक सफ़ेद साँड़ के पीठ पर चढ़ कर। नशे में धुत्त, भूखे रहने और अपने शरीर को विकृत करने की शिक्षा देता वह। भैरव के रूप में अपने पिता की हत्या करने वाला, अपने बाप की खोपड़ी को एक कटोरे के रूप में प्रयोग करने वाला है वह। अर्धनारीश्वर के रूप में स्त्री व पुरुष के काम वासना की छवि है वह। उसके मंदिरों में सदा पाओगे एक बड़ा लिंगपुरुष, रूढ़ शैली का एक खड़ा लंड जो है शिव की निरंकुश कामुकता का प्रतीक (Erect Penis symbolizing his rampant Sexuality)
शिव की पत्नियाँ बड़ी लोकप्रिय हैं। शक्ति रहस्यानुष्ठान, मद्यपान-उत्सव, व्यभिचार, लाम्पट्य, मंदिरों में वेश्यावृत्ति एवं बलि देने की प्रथा को प्रोत्साहित करती है। शक्ति ने आरम्भ किया सती प्रथा का जिसमें विधवा आग में कूद जाती है अपने पति की चिता में। शक्ति काली के रूप में दुष्ट, डरावनी और ख़ून की प्यासी और सबसे अधिक लोकप्रिय है। वह खड़ी होती है एक छिन्न-मस्तक शरीर के ऊपर, गले में मनुष्यों के कटे सरों की माला डाले। ख़बरों के अनुसार प्रति वर्ष सौ व्यक्तियों का ख़ून किया जाता है, बलि के लिए, भारतवर्ष में काली के सम्मान में। हिंदू धर्म के जंगल में न घुसो, निकल भागो इस जंगल से जब यह तुम्हारे बस में हो।"  http://religion-cults.com/Eastern/Hinduism/hindu11.htm

अनुवाद करते समय मैंने लंड जैसे अशिष्ट शब्द का 'चयन' क्यों किया?

आप पूछेंगे कि मैंने अनुवाद करते समय लंड जैसे असभ्य शब्द का प्रयोग क्यों किया जब कि मेरे पास लिंग एवं जननेन्द्रिय जैसे सभ्य शब्द थे। यहाँ मैं अनुवादक की भूमिका निभा रहा हूँ। मेरा कर्तव्य है मूल लेखक की वास्तविक भावनाओं को पाठक के सामने लाना, न कि उन्हें पाठक से छुपाना। मुझसे इस कलाकारी की आशा न करें कि मैं मूल लेखक की अश्लील भावना को श्लीलता का जामा पहना कर आपके समक्ष प्रस्तुत करूँगा।

उस ईसाई धर्माध्यक्ष ने क्या सोच कर अपने अंग्रेजी मूल में erect penis शब्द का 'चयन' किया,
genital का क्यों नहीं ?

आप स्वयं सोच कर देखें कि इस ईसाई धर्माध्यक्ष ने genital (जननेन्द्रिय) शब्द का प्रयोग नहीं किया। उसने erect (खड़ा, तना हुआ) विशेषण का प्रयोग किया है genital के साथ नहीं बल्कि penis के साथ। जब penis erect होता है तब पुरुष के मन में कामुकता की भावना प्रबल होती है। इसी बात पर जोर देते हुए ईसाई धर्माध्यक्ष हमारे भगवान शिव की rampant (निरंकुश) sexuality (कामुकता) का वर्णन करते हुए उन्हें काम वासना की छवि बताया। अतः erect penis की बात करते हुए उनकी भावना स्पष्टतः कामुकता से उद्वेलित खड़े लंड की ओर संकेत करती है, किसी जननेन्द्रिय (सृजन प्रक्रिया का एक अंग) अथवा किसी लिंग (gender जैसे स्त्रीलिंग या पुलिंग) की नहीं।

दो हिंदू संस्थाओं के द्वारा किये गए घोर आपत्ति के बावज़ूद उस ईसाई धर्म गुरु ने अपने वेबसाइट पर कोई भी परिवर्तन करना स्वीकार नहीं किया

भगवान शिव ने कामुकता पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली थी। उसी भगवान शिव के बारे में, अश्लील भावना का प्रदर्शन करते हुए, उस प्रख्यात ईसाई धर्माध्यक्ष ने अपने शब्दों का चयन किया था बहुत ही सोच-समझ कर। अमरीका में दो हिंदू संस्थाओं के बारे में मैं जानता हूँ जिन्होंने घोर आपत्ति की, भगवान शिव के लिए erect penis एवं rampant sexuality जैसे शब्दों के प्रयोग पर। पर उस ईसाई धर्म गुरु ने अपने वेबसाइट पर कोई भी परिवर्तन करना स्वीकार नहीं किया। ऐसा क्यों?   विवरण - http://www.IndiaCause.com

अब तक एक करोड़ लोग देख चुके होंगे उस वेबसाइट को - क्या प्रभाव पड़ता होगा सारे विश्व पर हिंदू धर्म के प्रति?

आपके सामने आपके धर्म का बलात्कार हो रहा है और आपकी आत्मा को यह स्वीकार भी है

आपकी सोच - हमारा हिंदू धर्म विश्व भर में कितने आदर के साथ देखा जाता है

ईसाई ऐसा क्यों करते है? क्या छुपा है उनकी शिक्षा एवं उनके चरित्र में?

यह समझने की भूल न करें कि ये सारे हथकण्डे केवल ईसाई धर्मगुरुओं और चंद कलाकारों के ही हैं - बाकी साधारण ईसाई दूध के धुले हुए हैं

चप्पलों पर गणेश जी की छविअप्रैल 2003 में अमेरीकन ईगल आउटफिटर्स (American Eagle Outfitters) नामक कम्पनी ने इन चप्पलों को 12.50 डॉलर (500 रुपये उन दिनों) में बेचना शुरू किया जिन पर हमारे पूजनीय श्री गणेश की मूर्ति अंकित थी। इस कंपनी के लगभग 750 स्टोर्स मिलेंगे आपको, अमरीका एवं कैनेडा में।

27-4-2003 को अमरीका की IndiaCause नामक हिंदू संस्था ने इस पर आपत्ति करते हुए कम्पनी को लिखा। 29-4-2003 को कम्पनी के वाइस-प्रेसिडेन्ट नील बुलमैन जूनियर ने क्षमायाचना करते हुए IndiaCause को फैक्स भेजा इस आश्वासन के साथ कि वे उन सारी चप्पलों को अपनी दुकानों से वापस मंगा लेंगे। विवरण - www.indiacause.com   इस संस्था ने चेष्टा की। इस चेष्टा का फल भी मिला।

 

श्री गणेश की छवि पखाने के स्थान परमाँ काली की छवि पखाने के स्थान परसिआटल (Seattle अमरीका) की एक कंपनी सिटिन प्रेटी (Sittin Pretty) कोमोड (toilet seat) बेचनी शुरू की श्री गणेश एवं माँ काली की तस्वीरों के साथ।

कई हिंदू संस्थाओं ने इस पर आपत्ति उठाई। हजारों की संख्या मे ईमेल गए, फैक्स एवं टेलीफोन किए गए। कोशिशें ज़ारी रहीं। काफी लम्बा चला यह आन्दोलन। अंत में कंपनी ने इन डिज़ाइनों को बजार से वापस लेना स्वीकार किया। American Hindus against Defamation नामक संस्था इस अभियान में सबसे आगे रही। विवरण - http://www.iVarta.com

सन 2005 - हिंदू देवी-देवताओं की छवि की नुमाइश ईसाई औरतों की बिकनियों पर

"विश्व के चंद सर्वोत्कृष्ट डिज़ाइनरों में से एक हैं रोबेर्टो कावाल्लि जिन्होंने हिंदू देवी देवताओं की छवि बिकनियों के ऊपर छापी." विवरण - Hindustan Times, 20-11-2005, p 10

अब विदेशों में इन चड्डियों को पहन कर गोरी-भूरी-पीली-काली ईसाई औरतें समुद्र तट पर धूप सेंकेंगी, घूमेंगी-फिरेंगी, खेलेंगी-कूदेंगी, खिलखिलायेंगी और मर्दों का ध्यान आकर्षित करेंगी।

साथ ही हिंदू देवी-देवताओं की छवि की नुमाइश करेंगी अपने शरीर के उन अंगों पर जिनसे वे पेशाब एवं टट्टी करती हैं (चड्डियाँ इन्हीं अंगों को ढाँकती हैं, उनके शरीर का बाकी हिस्सा तो प्रदर्शन के लिए होता है, यहाँ तक कि उनके वक्षस्थल भी — प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार गोवा, वेनिस, ऑन्टैरियो के समुद्र-तट)।

यही है अधिकांशतः ईसाइयों की नज़रों में हिंदू धर्म का स्थान।

हमारे देश के धर्मान्तरित ईसाई तो विदेशियों से भी एक कदम आगे - गाँव में जिस शिवलिंग की नियमित पूजा होती थी उसी पर ये ईसाई टट्टी कर जाते हैं - उस ईसाई धर्मगुरु की शह पर जिसने उनका धर्मान्तरण किया

मेरे बोलों में शब्दों की सुंदरता न खोजें

कब तक आप सत्य से भागते फिरेंगे?

क्या कभी आपने सोचा है कि स्वाभिमान जैसी भी कोई चीज होती है?

क्या यही नहीं हो रहा है आज के युवा वर्ग के साथ?

आइये देखिए कुछ झलकियाँ, ईसाई धर्म के सर्वोच्च धर्माध्यक्षों एवं अन्य धर्मगुरुओं के चरित्र की, और फिर स्वयं सोचिए कि जब इनके अपने चरित्र इतने गंदे होंगे, तो उनकी सोच कितनी गंदी होगी, और उन्हें शिवलिंग में एक खड़ा शिश्न नहीं तो और क्या दिखेगा, तथा शक्ति में एक व्यभिचारिणी नही तो और क्या दिखेगी?

"पोप जॉन 13वे उपस्थित हुए महासभा के सामने अपने आचरणों का हिसाब देने। यह सिद्ध हुआ सैंतिस प्रत्यक्षदर्शी साक्षियों के द्वारा, जिनमें से अधिकांशतः धर्माध्यक्ष एवं पुरोहित थे, कि पोप दोषी थे कुमारीसंभोग के, परस्त्रीगमन के, कौटुम्बिक व्यभिचार के, लौण्डेबाजी के, चोरी के एवं हत्या के। विशाल संख्या में साक्षियों के द्वारा यह भी सिद्ध हुआ कि पोप ने 300 मठवासिनीयों का शील भंग एवं बलात्कार किया।" ISBN 81-85990-46-8 p 97fn [quoting Dwight, Roman Republic in 1849 p 115 and  The Priest, Woman and Confessional p 268] अधिक विवरण के लिए पढ़ें पुस्तक 12, 10, 08, 04

इन नराधमों के अनुयायी भी ऐसे ही नराधम बनेंगे

ऐसे नराधम जब किसी धर्म के सर्वोच्च रक्षक होंगे तो उनका अनुकरण करने वाले धर्माधिकारी कितने बदनीयत होंगे। आइये देखें चन्द उदाहरण

"1274 में लीग के धर्माध्यक्ष हेनरी तृतीय ने (न्यायालय में) बयान दिया कि उनकी पैंसठ अवैध संतानें थीं। इसी धर्माध्यक्ष ने जनसमुदाय के महाभोज में अपनी शेखी बघारते हुए कहा कि बाईस महीने के बीच उनसे चौदह बच्चे पैदा हुए।" ISBN 81-85990-46-8 p 97fn [quoting Lecky, History of European Morals p 350]  
"इस बात की खुलकर पुष्टि की जाती है कि एक लाख स्त्रियों को इग्लैंड में पुरोहित-वर्ग द्वारा दुराचारी-लंपट बनाय गया।" ISBN 81-85990-46-8 p 97fn [quoting Intellectual Development of Europe p 498]

इन दोगलों की संतानें भी दोगली ही बनेंगी

"रोम में पैदा होने वाले दोग़ले बच्चों की संख्या इतनी विशाल होती है कि उनको रखने के लिए प्रकाण्ड मठों की व्यवस्था करनी पड़ती है, जहाँ उन्हें पाल-पोस कर बड़ा किया जाता है एवं पोप उनका पिता कहलाता है। जब रोम में किसी महान शोभायात्रा का आयोजन किया जाता है तो ये सभी दोगले बच्चे पोप के आगे-आगे चलते हैं।" ISBN 81-85990-46-8 p 97fn [quoting Familiar Discourses 383]

गले तक डूबे ये 'यौनाचारी' जिन्हें हमारे पूर्वजों ने 'यवन' का नाम दिया था

"पोप ग्रेगरी के अविवाहित जीवन की पुष्टि करने के पश्चात उन्हें एक मछली तालाब में छः हजार नवजात शिशुओं के सर मिले जिसके कारण उन्हें पुनः पुरोहितों के विवाह का अनुमोदन करना पड़ा।" ISBN 81-85990-46-8 Ibid.
"यह मछली तालाब उस (महिला) मठ के पास था जिसमें 'ईसा मसीह के नववधुओं' का निवास था।" ISBN 81-85990-46-8 preface

सर्वोच्च धर्माधिकारी पोप भ्रष्टाचार का प्रतीक बना और अपने अनुयायियों को भ्रष्टाचार की सीख दी

"वह स्पेन से लेकर आया इटली में, चरित्रहीन सगे-संबंधियों का एक झुण्ड, जिन्होंने फैलाया भ्रष्टाचार एवं चरित्रहीनता सभी दिशाओं में, एवं खोला घिनौनेपन का एक ऐसा पन्ना इतिहास में जिसकी समता नहीं किसी भी धर्म के उच्च अधिकारियों के जीवन में।" ISBN 81-85990-21-2 p79fn [quoting Joseph McCabe, A Testament of christian Civilization]

पुत्री के साथ सम्भोग और पुत्र के साथ वेश्यालयों में जाना, अपने अनुगतों को विष देकर उनकी सम्पत्ति हथियाना - यह सब कोई सीखे तो ईसाई धर्म के सर्वोच्च धर्माधिकारी पोप से

"उसने दुर्दम्य शक्ति-राजनीति का खेल खेला, चर्च के विशेषाधिकारों को खरीदा और बेचा। पोप के महल में होने वाली उछछृंखल पार्टियाँ बहुत प्रसिद्ध थीं जहाँ अनियंत्रित रूप से शराब बहता था और अंधाधुंध यौनाचार होता था। इस पोप ने अपनी ही पुत्री के साथ सम्भोग किया (यौन संबध रखे)। वह अपने पुत्र के साथ वेश्यालयों में जाता रहा। उसने अपने कार्डिनलों को विष देकर मारा उनकी धन-सम्पत्ति हड़पने के लिए। अंत में उसकी अपनी मृत्यु भी विष दिये जाने के कारण ही हुई।"   ISBN 81-85990-21-2 p79 

कार्डिनल पोप के द्वारा नियुक्त किए जाते हैं और उन्हीं में से एक कार्डिनल अगला पोप बनता है, वर्तमान पोप के मरनोपरान्त।

अपने आपको भुलावे में न रखें कि यह सब सूदूर अतीत की बाते हैं कारण उनके 'कल' और 'आज' में कोई बदलाव नहीं आया

"प्रायः 800 व्यक्तियों ने कहा कि जब वे छोटे थे तब बॉस्टन के महाधर्मप्रान्त में 1940 से उनका यौन दुरुपयोग किया गया था। बॉस्टन चर्च के विरुद्ध इस प्रकार के आरोपों के इस पहले राजकीय लेखे में मैसाचुसेट्‌ट्स के महान्यायवादी टॉम रेली ने कहा कि इस महाधर्मप्रान्त में पुरोहित-वर्ग द्वारा यौन-दुरुपयोग का इतिहास आश्चर्यजनक है। बॉस्टन में होते रहे यौन दुरुपयोग के अपयश की प्रतिध्वनि समस्त विश्व के कैथोलिक धर्मप्रांतों में सुनाई देने लगी एवं विभिन्न दिशाओं से ऐसे आरोप सामने आने लगे।" The Free Press Journal, Mumbai, 25-7-2003
"रोमन कैथोलिक धर्मगुरुओं ने रिपोर्ट दी कि पुरोहितों द्वारा यौन दुरुपयोगों के 1,092 नए आरोप सामने आये हैं। डॉ मैक्चेस्ने ने कहा कि 1950 से चर्च का खर्च 800 मिलियन डॉलर अर्थात 34 अरब 40 करोड़ रुपये से अधिक हो चुका है। केवल पिछले वर्ष ही इनके निपटारे, रोगोपचार एवं वकीलों की फ़ीस में 139.6 मिलियन डॉलर अर्थात 6 अरब रुपये खर्च हुए। पिछले वर्ष न्यू यॉर्क के जॉन जे कॉलेज ऑफ़ क्रिमिनल जस्टिस द्वारा किए गए एक विश्लेषण से पता चला कि 1950 से 2002 के बीच 10,667 नाबालिग ईसाई धर्मगुरुओं के द्वारा यौन दुरुपयोग के शिकार हुए। डॉ मैक्चेस्ने ने कहा कि वास्तविक संख्या सम्भवतः कभी न जानी जा सकेगी क्योंकि अनेक व्यक्ति (इस प्रकार की आपबीती बताने) सामने नहीं आते।" The Times of India, Mumbai, 20-2-2005, p 10

ईसाई राष्ट्रों में यौनाचार को बड़ी गरिमा प्रदान की जाती है

सम्भवतः इसी कारण ईसाई राष्ट्रों में यौनाचार को बड़ी गरिमा प्रदान की जाती है। इन्हीं असाधारण चरित्रों की झलकियाँ आप देखते हैं आज अमरीका के जन-जीवन में।

(1) अमरीकी जनता में 84% ईसाई हैं (2) अमरीकी सेना में जो भर्ती होते हैं उनमें 98% ईसाई हैं (विवरण - वॉशिन्गटन पोस्ट, पुनरुद्धृत हिंदू वॉयस)

इन ईसाइयों ने हम हिन्दुओं को भी अपने ही साँचे में ढाल दिया और उनकी संगत में हम उनके जैसे ही बदजात बन गये

हमारे देश में भी, पिछले छः पीढ़ियों से ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा पद्धति के प्रभाव में, हम हिंदुओं की सोच उसी साँचे में ढल चुकी है। आज हमारे समाचारपत्र, सिनेमा एवं टेलीविज़न यौन प्रदर्शन को बड़ा महत्व देते हैं।

सदियाँ बीत गईं पर वे तो न बदले

सदियाँ बीत गईं पर उनका चरित्र नहीं बदला। ये सारे उदाहरण केवल अपवाद मात्र नहीं हैं। सैकड़ों उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं पर मेरा उद्देश्य आपका मनोरंजन करना नहीं, अपितु आपको सावधान करना है।

हमारे इतिहास को फिर से लिखा उन्होंने अपने ही रंग में रंग कर

पिछले छः पीढ़ियों के दौरान आपका इतिहास आपके नियंत्रण में रहा ही कहाँ?

जब आपके ये गंदी सोच और गंदे चरित्र वाले मालिक, आपका इतिहास लिखने बैठे होंगे, तो क्या उन्हें कहीं दूर जाने की आवश्यकता हुई होगी?

मैं शिक्षा पर ही इतना ज़ोर क्यों देता हूँ

अब तुलना कीजिए इन सब की हमारे पुरातन हिंदू समाज से

"विलासिता, लाम्पट्य, व्यभिचार से रहित होने का यह गुण हिदुओं को श्रेष्ठता प्रदान करता है। आचरण की पवित्रता की दृष्टि से उनकी (हिंदुओं की) श्रेष्ठता हमारे (अँग्रेज़ों के) अहंकार की संतुष्टि नहीं करता।" ISBN 0-14-100437-1 [quoting Elphinstone's History of India, ed. Cowel]

एलफिन्सट्न मुम्बई प्रेसीडेन्सी के प्रथम गवर्नर थे। मुम्बई में उनके नाम पर एलफिन्सटन कॉलेज  एवं एलफिन्सटन रोड नामक रेलवे स्टेशन आज भी है।

यदि हम हिन्दू अपने पूज्य शिवलिंग में एक कामातुर खड़ा शिश्न देखते, और शिव की पत्नी शक्ति में एक व्यभिचारिणी को देखते, तो क्या हम अपना आचरण विलासिता, लाम्पट्य, व्यभिचार से रहित रख सकते थे?

आप अपने-आप से यह प्रश्न पूछ कर देखें और आपको उत्तर स्वयं ही मिल जायेगा। इसे समझने के लिए न तो आपका बहुत पढ़ा-लिखा होना आवश्यक है, न ही बड़ा विद्वान-बुद्धिमान होना। 

तो फिर ईसाइयों को शिवलिंग में एक खड़ा शिश्न, और शिव की पत्नी शक्ति में एक व्यभिचारिणी, ही क्यों दिखती है?

उनका साथ पाकर, हममें से भी अनेक, उनके जैसे, नाली के कीड़े ही बन गये हैं

जब इस पुस्तक का पहला संस्करण प्रकाशित हुआ तो उत्तर-पश्चिम भारतवर्ष के एक स्थान (पंचकूला) से एक फोन आया। ये महाशय किसी 'भारतीय सुराज्य मंच' के 'अध्यक्ष' हुआ करते थे। यह लगभग दो वर्ष पहले की बात है। उनके पास मेरी यह पुस्तक घूमते-घामते पहुँची होगी जैसा कि मेरी पुस्तकों के साथ अक्सर होता है, एक प्रति दस हाथों से गुजरती है।

उन्होंने इतनी दूर से मुझे फोन किया यह जताने के लिए कि जो ये ईसाई कहते हैं शिवलिंग के बारे में, उसमें गलत क्या है। उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं शिव-पुराण पढ़ूँ।

जब तक हमने अपने आपको ईसाई-अँग्रेज़ों से दूर रखा, तब तक हमने अपने आचरण की पवित्रता को बनाए रखा

यह क्यों आवश्यक है कि हम जानें कि उनके बिना हम क्या थे और उनकी संगत में हम क्या बन गए

सात फेरों का दृष्टांत

और हमारे टी वी गुरु क्या कहते हैं?

वे जो कहते हैं, कि इस दुनिया में अच्छी और बुरी दोनों चीजें है - अच्छी को ग्रहण करो, बुरे की ओर से मुँह फेर लो

आप में से कुछ बड़े दरिया-दिल होतें हैं। उनका कहना और सोचना है कि जो बुरा करते और कहते हैं, उन्हें करने दो, उन्हें उनके कर्मों का फल स्वयं मिलेगा, हम क्यों उसकी चिंता करें? हमें अपनी दृष्टि और सोच को अच्छी बातों कि ओर लगाना चाहिए।

समाज एक समष्टि है, जहाँ अनेक प्रकार के लोग रहते हैं —

किस भ्रम में जीते हैं, कि आपके बच्चे, आपके-ही संस्कार, पाते हैं?

आप इस भ्रम में न रहिये कि आप अच्छे संस्कार देते हैं अपने बच्चों को, इसलिए आपके बच्चे ऐसी गंदी सोच से प्रभावित नहीं होंगे। जरा अपने बच्चों की ओर ध्यान से देखिए।

कितना समय आपके बच्चे आपके साथ बिताते हैं? सुबह उठकर भागा-भागी में स्कूल जाते हैं, जहाँ शिक्षक उन्हें हमारे देवी-देवताओं के बारे में कुछ अच्छी बातें नहीं बताते क्योंकि आप अपने बच्चों को 'इंग्लिश-मीडियम' 'कॉनवेंट-मिशनरी-ईसाई' स्कूलों में भेजते हैं उन्हें 'स्मार्ट' बनाने के लिए।

स्कूल से लौटकर जल्दी-जल्दी खाना खाकर वे भागते हैं खेल के मैदान की ओर। वहाँ से लौटकर बैठ जाते हैं स्कूल का 'होमवर्क' पूरा करने के लिए। फिर समय मिला तो टी वी देखने बैठ जाते हैं।

इन सब व्यस्तताओं के बाद यदि उन्हें बात करने का समय मिलता भी है तो वह फोन पर अपने दोस्तों के साथ बात करने में बीत जाता है। और यदि आपके बच्चों में 'रोमांस' का बुखार चढ़ा हो तो फिर उन्हें खयालों की दुनिया में जीने की आदत पड़ जाती है, तब उनके पास और किसी से बात करने का कोई समय नहीं होता। 

इन सब के दौरान यदि थोड़ा-सा समय उन्हें आपके साथ बात करने को मिल भी जाता  है तो वे आपसे 'दिल खोलकर' कितनी बातें करते हैं? क्या वे मन ही मन ऐसा नहीं सोचते कि आपके और उनके खयाल मिलते नहीं? उनकी नजर में आपका 'नजरिया' पुराना है, सम-सामयिक नहीं।

वे कलाकार जो अपनी कला के माध्यम से सारे विश्व को बताते हैं कि उनकी नजरों में हमारे भगवान शिव एक कुत्ते जैसे हैं

भगवान शिव को कुत्ते के रूप में दिखाया इस ईसाई कलाकार नेइन ईसाई धर्मगुरुओं की सीख को आगे बढ़ाते हैं वे कलाकार जो अपनी कला के माध्यम से विश्व को बताते हैं कि हमारे शिव-शंकर की अहमियत उनकी नज़रों में क्या है। उदाहरण के लिए देखिए http://www.timnortonart.com/pages/painting%20pages/Saints%201.html यह चित्रपट (कैनवास) के ऊपर एक तैलचित्र (ऑयल पेंटिंग) है जिसमें कलाकार टिम नॉर्टन ने हमारे भगवान शिव को कुत्ते के रूप मे दिखाया है। इस तैलचित्र का आकार 30" x 24" है और इसका मूल्य एक हज़ार डॉलर रखा गया है (चालीस-पैंतालीस हजार रुपये)।

19-11-2006 2:05 AM  अभी मैं टिम नॉर्टन के वेब साइट पर गया क्योंकि अगले दो-तीन दिनों में इस तृतीय संस्करण को प्रेस में भेजने की तैयारी में लगा हुआ हूँ। वह फोटो मुझे वहाँ नहीं दिखी। आज से नौ महीने पहले द्वितीय संस्करण को लिखते समय मैंने वह फोटो वहाँ देखी थी। मुझे आश्चर्य हुआ और मैंने अभी-अभी टिम नॉर्टन को एक ईमेल भेजा। उसके बाद मैं 'हिन्दू जागृति समिति' के वेब-साइट पर गया (www.hindujagruti.org). उन्होंने एक 'आपत्ति अभियान' चलाया था जिसमें मैंने भी हस्ताक्षर किये थे। वहाँ जाकर पता चला कि टिम नॉर्टन ने क्षमा-प्रार्थना के साथ उस तैल-चित्र को अपने वेब-साइट से हटा लिया है।

इटली की कम्पनी मिनेल्ली ने जूतों पर भगवान श्री राम के चित्र छापे

श्री राम का स्थान इटली की जूतियों परइटली की कम्पनी मिनेल्ली ने जूतों पर भगवान श्री राम के चित्र छापे। अपने विज्ञापनों में इस बात विशेष रूप से उल्लेख किया ताकि अधिकाधिक लोग उन्हें खरीदें।

पर जो खरीद चुके थे, उनसे वापस नहीं लिया जा सकता। उनके लिए अब यह अपने दोस्तों के साथ चर्चा एवं नुमाईश की वस्तु बन गई।  

 

न्यू यॉर्क (अमरीका) की कम्पनी ने मोजों पर ॐ छाप कर बेचना शुरू किया

मोजों पर ॐ छाप कर बेचना न्यू यॉर्क अमरीका की गोल्ड मेडल होज़ियरी (Gold Medal Hosiery) नामक कम्पनी ने मोजों पर ॐ छाप कर बेचना शुरू किया। इन मोजों की डिज़ाइन तैयार की गई थी न्यू यॉर्क की लिन्डा मैड्डॉक्स (Linda Maddocks) के द्वारा एवं मोजे बनवाये गए थे दक्षिण कोरिया में।

4-7-2003 को अमरीका की IndiaCause नामक हिंदू संस्था ने इस पर आपत्ति करते हुए कम्पनी को लिखा। 11-7-2003 को कम्पनी के अध्यक्ष पॉल रोटस्टीन (Paul Rotstein) ने खेद प्रगट करते हुए IndiaCause को ईमेल भेजाइस आश्वासन के साथ कि वे इस गलती को दुहरायेंगे नहीं, पर उन्होंने न ही इस बात का आश्वासन दिया कि बाजार में बिक रहे मोजों को वापस लेंगे या नहीं, और जो माल उनके गोदामों में है उन्हें  बाजार में बिकने लिए छोड़ेंगे या नहीं। विवरण - www.indiacause.com

वैसे जो हानि होनी थी वह तो हो चुकी। लाखों ईसाई जनसाधारणों के घर-घर पहुँच गयीं ये मोजे, और उन्हें मौका मिल गया इस बात का कि वे हमारे ॐ को अपने पाँवों मे अपने जूतों के साथ स्थान दें।

ग्रीस में माँ दुर्गा को शराब बेचते हुए दिखाया जा रहा है

"एथेन्स (ग्रीस) के बालोन ओरिएन्टल डिस्को बार के अंदर एवं बाहर लगे पोस्टरों पर  दुर्गा अपने दाहिने हाथ में सदर्न कम्फ़र्ट ह्विस्की (शराब) की बोतल लिए।" विवरण - Hindustan Times, 14-2-2005, p 1  

अब विदेशों में नाचने के स्थलों पर शराब बेचने के लिए हमारी पूजनीय माँ दुर्गा की छवि का प्रयोग किया जा रहा है।
वहाँ के रहने वाले भारतीय पिछले तीन महीनों से उन पोस्टरों के हटाये जाने की माँग कर रहे हैं पर इसे सदर्न कम्फ़र्ट ह्विस्की बनाने वाली शराब की अमरीकी कम्पनी पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करती रही है।

ग्रीस का ईसाई धर्म के साथ बड़ा पुराना रिश्ता है। बाइबिल ग्रीक भाषा में लिखी गई थी। अमरीकी मूर्तिकला (Sculpture) पर ग्रीक मूर्तिकला का प्रभाव बहुत गहरा है। आधुनिक (ईसाई) औषधि विज्ञान का जन्मस्थान भी ग्रीस ही माना जाता है। 
वहाँ हिन्दुओं की तादात कम होगी। उनकी आवाज़ उतनी बुलन्द न होगी। सो वहाँ व्यवसाय करने वाली अमरीकी कम्पनी ने इस बात का फ़ायदा उठाया। हिन्दुओं की माँग को नजरअंदाज कर दिया।

टोरॉन्टो स्टार माँ दुर्गा की नंगी तस्वीर छापता है

टोरॉन्टो स्टार के पास यह पूर्ण वस्तावृत सुसज्जित अतीव सुंदर मूर्ति थी पर इसे उन्होंने छापने योग्य न समझा

टोरॉन्टो स्टार के पास यह पूर्ण वस्तावृत सुसज्जित अतीव सुंदर मूर्ति थी Mega City Toronto कैनेडा मे स्थित है। भौगोलिक आयाम के अनुसार सन 2000 में यह विश्व का सबसे बड़ा शहर हुआ करता था। टोरॉन्टो स्टार नामक दैनिक वहाँ का सबसे अधिक जनप्रिय समाचार पत्र है। बात 2003 की है। जब उन्हें दुर्गा पूजा के अवसर पर माँ दुर्गा की फोटो अपने दैनिक में छापने की इच्छा हुई तो उनके पास चार चित्र थे जिनमें से तीन मूर्तियाँ जो बनकर तैयार थीं और एक मूर्ति जो अभी पूरी नहीं हुई थी।

टोरॉन्टो स्टार के पास ये तीन पूर्ण वस्तावृत मूर्तियाँ थीं जिनमें से एक वह चुन सकते थे यदि उनकी भावना माँ की फोटो को दर्शाने की होती। वे उनमें से एक को चुन सकते थे यदि उनकी दृष्टि में हिन्दुओं की एवं हिंदुओं के भावनाओं की कोई कद्र होती।

टोरॉन्टो स्टार के पास यह दूसरी वस्तावृत सुसज्जित मूर्ति भी थी टोरॉन्टो स्टार के पास यह दूसरी वस्तावृत सुसज्जित मूर्ति भी थी पर इसे भी उन्होंने छापने योग्य न माना

 

 

 

 

टोरॉन्टो स्टार के पास यह तीसरी वस्तावृत मूर्ति भी थी टोरॉन्टो स्टार के पास यह तीसरी वस्तावृत मूर्ति भी थी पर इसे भी उन्होंने छापने योग्य न जाना

 

 

 

 

यह मूर्ति जो अभी अपूर्ण थी उसे ही उन्होंने छापा पर उन्होंने जानबूझकर उस असमाप्त मूर्ति को छापा। हिन्दू धर्म के प्रति ईसाइयों में घृणा इतनी प्रखर है कि उन्होंने माँ को पूर्ण नग्नावस्था में दिखाना अधिक आनन्ददायी पाया।

यह मूर्ति जो अभी अपूर्ण थी उसे ही उन्होंने छापा — पूरे पृष्ठ के एक-तिहाई हिस्से पर फैला कर ताकि हरेक की नजर पड़े — जो फोटो उन्होंने छापी उस फोटो में ये काली पट्टियाँ नहीं थीं
source: http://www.hindujagruti.org/ 22-11-2006 

यह उपहार था, टोरॉन्टो स्टार की तरफ से, दुर्गा पूजा के दिन, हिन्दुवों को। तारीख थी 4 अक्टूबर 2003। फोटो तो इतना बड़ा था कि समाचार पत्र के इतने बड़े पृष्ठ का एक-तिहाई हिस्सा उसने घेर लिया था। उस फोटो को इतनी महत्त्ता देकर छापने का कारण स्पष्ट था। वे जानबूझकर अ-हिन्दू पाठकों के मन में हिन्दू धर्म के बारे में गलत धारणा फैलाना चाहते थे।

10 अक्टूबर को इंडिया-कॉज़ ने ऑन-लाइन आपत्ति-अभियान आरम्भ किया। पहले चन्द घन्टों के अन्दर एक से दो हजार के बीच आपत्ति-ईमेल टोरॉन्टो स्टार के कार्यालय में पहुँचे। 11 अक्टूबर को टोरॉन्टो स्टार ने प्रकाशित किया दो पंक्तियों का खेद स्वीकारोक्ति — "हमें खेद है कि हमारे द्वारा प्रकाशित देवी के चित्र ने कुछ व्यक्तियों की भावनाओं को ठेस पहुँचायी"। आधे-मन से दिया गया यह खेद, इंडिया-कॉज़ को स्वीकार न था। आपत्ति-अभियान जारी रहा। स्थानीय भारतीयों ने घोर आपत्ति की - टोरॉन्टो स्टार के कार्यालय के सामने दो बड़े प्रदर्शन किये गये। अन्त में 15 नवम्बर को टोरॉन्टो स्टार ने स्पष्ट रूप से क्षमा-याचना प्रकाशित की, देवी माँ की एक उपयुक्त फोटो के साथ, उसी पृष्ठ पर जहाँ पहले वह नग्न तस्वीर छापी थी।

अमरीकी नारी रोबिन फ़ोले की बनायी हुई माँ दुर्गा के अर्धनग्न गुड़िये बाजार में

माँ दुर्गा के अर्धनग्न गुड़िये बाजार में पोर्टलैंड, अमरीका कि रॉबिन फ़ोले ने माँ दुर्गा की अधनंगी गुड़िया (dolls) बनाकार बेचना शुरू किया अपने वेबसाइट के द्वारा। हिन्दू जाग्रुति समिति ने ईमेल द्वारा अपत्ति की। अनेक आपत्तियों के पश्चात उसने वेबसाइट के मुख्य पृष्ठ से माँ की वह तस्वीर हटा दी पर इंडेक्स से नहीं हटाया।
आरम्भ में वह इसके लिए भी तैयार न थी। जब आपत्ति-अभियान शुरु की गई थी तो उसे हटाने के बजाय उसने धमकी दी थी कि वह यह मामला एफ़-बी-आई (FBI) को सौंप देगी। इसका जवाब दिया गया - "एफ़-बी-आई ही नहीं, तुम सारी अमरीकी फ़ौज को बुला लो" और "एफ़-बी-आई दुर्गा माई से बड़ी नहीं है"।
आपत्ति अभियान बढ़ता गया और अन्ततोगत्वा उसने मुख्य पृष्ठ से तस्वीर हटा ली और यह भी कहा कि वह स्वयं भी ये गुड़िये नहीं बेचेगी। पर चूँकि इंडेक्स सेक्शन में अभी छोटी तस्वीर बची है, हिन्दू जनजाग्रुति समिति ने अपना अभियान बंद नहीं किया है। विवरण - http://www.hindujagruti.org 23-11-2006

संदर्भ सूची

क्रम - अंतर्राष्ट्रीय मानक पुस्तक क्रमांक ISBN [संस्करण] लेखक, शीर्षक
ISBN 0-14-100437-1 [2000] F Max Muller, INDIA what can it teach us?
ISBN 81-85990-21-2 [1995] Ishwar Sharan, The Myth of Saint Thomas and the Mylapore Shiva Temple
ISBN 81-85990-46-8 [1997] Matilda Joslyn Gage, Woman, Church and State - a historical account of the status of woman through the Christian ages with reminiscences of the matriarchate
ISBN 81-85990-60-3 [2000] David Frawley (Vamadeva Shastri), How I became a Hindu-my Discovery of the Vedic Dharma
The Free Press Journal, Mumbai edition
Hindustan Times, Mumbai edition
The Times of India, Mumbai edition
दैनिक जागरण, नई दिल्ली
फ़ादर कामिल बुल्के, अंगरेजी-हिन्दी कोश, काथलिक प्रेस, राँची, 1968
हिन्दू वॉइस, मासिक पत्रिका, मुम्बई 

 

यदि अपने हितों की सुरक्षा चाहते हो तो पहले हिन्दू धर्म के हितों की रक्षा करो, अन्यथा,
तुम्हारी आज की यह उदासीनता, आने वाली कल की तुम्हारी सन्तानों को बड़ी महंगी पड़ेगी

1 इसी कारण ईसाई-अंग्रेज़ों के देश जाकर उनकी शिक्षा ग्रहण करना उचित नहीं मानते

कई वर्ष पहले जब यह पुस्तिका लिखी गई थी, उन दिनों यूनिकोड का प्रचलन नहीं था। इस कारण तब TTF ट्रूटाइप फ़ॉन्ट्स का प्रयोग किया गया था। अब उन अक्षरों का OTF (ओपन टाइप फ़ॉन्ट्स) यूनिकोड में रूपांतर एक सॉफ़्टवेयर द्वारा किया गया है। यह ग्यारह हज़ार की सॉफ़्टवेयर अच्छा काम करती है पर सभी सॉफ़्टवेयरों की अपनी-अपनी सीमायें होती हैं। अतः कतिपय गलतियों की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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