कहानी एक षड़यंत्र की
(श्रीराम मंदिर के संदर्भ में)

अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मानक संख्या ISBN 978-81-89746-18-6 प्रकाशित 23 मार्च 2006

प्रशंसा पत्र

महामण्डलेश्वर श्रोत्रिय ब्रहमनिष्ठ परमहंस परिव्राजकाचार्य, श्री श्री 1008 डॉ स्वामी शिव स्वरूपानन्द सरस्वती, 
भागवत, ज्योतिष, वेदान्त, षडदर्शनाचार्य (पी-एच.डी.), आनन्द कृष्ण धाम, सन्यास मार्ग, कनखल, हरिद्वार 249 408
30 अप्रैल 2006
परमप्रिय आत्म स्वरूप मानोज जी
जय श्री राम।
गंगा मैया एवं भगवत कृपा से आप सभी के साथ स्वस्थ व सानन्द होंगे।

मैं अभी बाहर भ्रमण के बाद आया, आपका पत्र व दो पुस्तकें (कहानी एक षड़यंत्र की व हमारे बुद्धिजीवी, हमारी मीडिया, हमारे न्यायाधीश) मिली। पुस्तकों को पढ़कर अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि कोई व्यक्ति अभी भी है जो सनातन धर्म, राम मन्दिर व मन्दिर बनने में व्यवधान के बारे में सटीक व न्यायोचित विचार व्यक्त कर सकता है। आपके ऊपर भारत वासी व प्रत्येक सनातन धर्मी को गर्व करना चाहिये।
मैने आपकी पूर्व पुस्तक जो शिक्षा से संबंधित थी उन सभी को प्रवचनों व कथाओं में लिया, लोगों ने बहुत पसंद भी किया। आशा है समाज की सोच में बदलाव होगा तथा वह प्राचीन भारत जो विश्व गुरु कहलाता था, पुनः समाज के सामने स्थापित होगा।
आप अपने विचार अवश्य ही मेरे तक पुस्तक या पत्र के माध्यम से पहुँचाते रहें जिससे आपके विचारों का लाभ समाज को प्राप्त होता रहे।
मैं आपका हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ तथा आशा करता हूँ कि समाज को अपने हिन्दूवादी व सनातन विचारों से अवश्य लाभान्वित कराते रहेंगे।
आपका
महामण्डलेश्वर डॉ स्वामी शिवस्वरूपानन्द सरस्वती

असमाप्त

राम मंदिर तुम्हें पुकारता को संक्षिप्त कर दो भागों में बाँटा गया तथा अलग ढंग से प्रस्तुत किया गया - यह उसका पहला भाग है

घटना क्रम

मुस्लिम लीडरों ने दावा किया था कि यदि यह सिद्ध कर दिया जाए कि उस जगह पर मस्जिद के पहले एक मंदिर हुआ करता था तो वे वह जगह हिंदुओं को दे देंगे। इस बात पर चंद्र शेखर सरकार ने यह तय किया कि सारा निर्णय इस बात पर टिका होना चाहिए कि क्या वहाँ मस्जिद के पहले मंदिर था? चंद्रशेखर सरकार के अनुरोध पर बीमैक (बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी) व विहिप (विश्व हिंदू परिषद्) इस बात के लिए सहमत हुए कि वे अपने-अपने पक्ष के ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत करेंगे (समय - दिसंबर 1990 एवं जनवरी 1991) और उन पर बहस कर इस निर्णय पर पहुँचेंगे कि क्या जन्मभूमि-मस्जिद के पहले वहाँ मंदिर हुआ करता था। ध्यान दीजिए 1990-1991 की बात है यह—बाबरी ढाँचा अभी गिरा नहीं था। प्रॉफ़ेसर हर्ष नारायण, प्रॉफ़ेसर बी पी सिन्हा, डॉ एस पी गुप्ता, डॉ बी आर ग्रोवर एवं श्री ए के चैटर्जी ने विहिप का प्रतिनिधित्व किया। डॉ एस पी गुप्ता विहिप से विधिवत् जुड़े हुए थे पर अन्य लोग नहीं। बीमैक के लोग, आइ-सी-एच-आर (इंडियन काउंसिल ऑफ़ हिस्टॉरिकल रिसर्च अर्थात् भारतीय ऐतिहासिक खोज परिषद्, नई दिल्ली) के प्रॉफ़ेसर इर्फ़ान हबीब के पास गए, जिन्होने सचमुच के इतिहासज्ञों की एक टोली जुटाई जिसका नेतृत्व प्रॉफ़ेसर आर एस शर्मा ने किया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के प्रॉफ़ेसर इर्फ़ान हबीब बहुत दूर की सोचते थे। उन्होने स्वयं इस टोली का नेतृत्व नहीं किया— इसके पीछे एक बड़ी सोची-समझी चाल थी।

एक प्रोफेसर जिसने दिशा दी आगे की घटनाओं को

बेल्जियम के डॉ कोएनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक में जे-एन-यू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) के स्वनामधन्य इतिहासज्ञ आर एस शर्मा का जिक्र किया है। जब उसका जन्म हुआ होगा तो उसके माता-पिता ने बड़े लाड़ से, उसे भगवान श्री राम के चरणों में समर्पित करते हुए, उसका नाम राम शरण रखा होगा। माता-पिता ने बड़ी आस से उसे ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा दिलाई होगी कि हमारा बेटा बड़ा आदमी बन कर वंश का नाम रोशन करेगा। उस बेटे ने वंश का नाम रोशन तो किया, पर किस प्रकार से यह आगे चल कर देखेंगे। फ़िलहाल उसके व्यक्तित्व का विकास किस प्रकार से हुआ होगा इसके बारे में थोड़ी सी कल्पना कर लें तो सम्भवतः आप अपने आज के बच्चों को थोड़ा-बहुत समझ पायेंगे। एक बार एक ईसाई फ़ादर ने कहा था कि हम अपने स्कूल में तुम्हारे बच्चों को ईसाई तो शायद न बना पायेंगे पर जब हमारे स्कूल से शिक्षा पाकर निकलेंगे तो वे सच्चे हिंदू भी न रह जायेंगे। यह एक अकाट्य सत्य है जिसे हम हिन्दू माता-पिता सहजता से नहीं समझ पाते। वह मेधावी बच्चा ईसाई तो न बन पाया पर श्री राम की शरण से भी बहुत दूर चला गया। जब वह सच्चा हिन्दू न रहा तो अपनी जड़ों से कट गया। ईसाई भी न बन सका तो अध्यात्मिक स्तर पर त्रिशंकू की भाँति अपने आप को शून्य में लटका पाया। यही विडम्बना थी हमारे जवाहरलाल नेहरू की जिन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा जाता है। तो फिर कैसा भारत बना होगा इसकी कल्पना आप स्वयं ही कर लें! खैर, राम शरण की विडम्बना थी कि वह शून्य उसे जीने न देता। उस खालीपन को भरना उसके लिए आवश्यक था। आयु में जवान था और उसका दिल सीने के बायीं ओर धड़का करता था। भावनात्मक झुकाव का वाम पंथ की ओर जाना उस आयु में एक स्वाभाविक प्रक्रिया थी। यह कहानी केवल राम शरण की ही नहीं बल्कि आपके परिवार अथवा आपके आसपास के अनेक युवाओं की है।

झूठ की बुनियाद पर खड़ा एक महल

प्रॉफ़ेसर आर एस शर्मा एवं उनकी सचमुच के इतिहासज्ञों की टोली ने अच्छा प्रचार किया कि वे सब स्वतंत्र इतिहासज्ञ थे। जनसाधारण की दृष्टि में स्वतंत्र वह है जो किसी पर निर्भरशील नहीं है, कम से कम आर्थिक दृष्टि से। स्वतंत्र व्यक्ति से यही आशा की जायेगी कि उसका दृष्टिकोण स्वतंत्र होगा, दूसरे के कहे के अनुसार सजाया-सवाँरा गया न होगा। लोग यही सोचेंगे कि वह जो कह रहा है वह उसकी अपनी सोच है जो उसके अपने परीक्षण एवं अपने अनुभव के आधार पर ही बनी है। लोग यह आशा नहीं करेंगे कि वह केवल एक नौकर है जो परदे के पीछे छुपे मालिक की बोली बोल रहा है। उसके पास विश्वविद्यालयों की पदवियाँ एवं उनके आधार पर अर्जित किये गए अन्तर्राष्ट्रीय मान्यतायें हैं। अतः लोग यह शंका नहीं करेंगे कि उसका योगदान केवल अपनी मुहर लगाने तक ही सीमित है। बाद में यह बात सामने आई कि वे सभी बीमैक की चाकरी में थे और वे जो भी कह रहे थे वह, स्वतंत्र रूप से नहीं, अपितु अपने निहित स्वार्थ से प्रेरित होकर, बीमैक से पैसा लेकर। यह तो उनका चरित्र है—चरित्र जो झूठ की बुनियाद पर टिका हुआ है। यह एवं बहुत सारी अन्य बातें उनके चरित्र के बारे में हम जान पाते है युरोपियन इतिहासज्ञ डॉ कोएनराड एल्स्ट से, जिन्होने भारत में आकर और यहाँ रहकर इन बातों पर खोज बीन की।
उस प्रचार के पीछे छुपी हुई गहरी चाल

प्रश्न उठता है कि उन्होने आरंभ से जान बूझकर इस झूठ का प्रचार क्यों किया? इस झूठ को बड़े समाचार पत्रों के माध्यम से फैलाने की क्या आवश्यकता थी? इसके पीछे छुपी हुई एक बड़ी सोची समझी चाल थी। वे जानते थे कि जनता उस बात को याद रखती है, जो बात शुरू-शुरू में ज़ोर-शोर से कही जाती है। आरंभ में पाठकों की रुचि प्रत्येक नए विषय पर होती है। समय के साथ वे विषय पुराने पड़ जाते हैं एवं पाठकों की रुचि उनसे हट जाती है। उनकी जगह नए विषय पाठकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं, या फिर बना दिए जाते हैं। लोग वही याद रखते हैं जो उन्होने आरंभ में हो-हल्ले के साथ सुनी थी। बाद में, अगर कहीं समाचार पत्र के किसी अंदरूनी पृष्ठ पर, किसी छोटे से कोने में, एक छोटा सा खंडन, या विरोध छपता भी है, तो यह आवश्यक नहीं कि उन्हीं पाठकों की दृष्टि उस पर पड़े जिन्होंने पहले जोर-शोर से फ़ैलाये गए असत्य को पढ़ा था। इस बात का भरपूर लाभ उठाया उन्होने। जनता के मन पर यह छाप छोड़ दी कि वे सभी स्वतंत्र इतिहासज्ञ थे, और जो कुछ भी वे कह रहे थे, बिना किसी स्वार्थ के, केवल सत्य से प्रेरित हो कर के, जबकि यह सब वे बीमैक से पैसा लेकर कर रहे थे, सत्य को असत्य से ढाँपने के लिए, और इसलिए उन्होनें बेईमानी का सहारा लिया आरम्भ से ही।

एक अन्य प्रोफेसर जिसने शतरंज के मोहरों को चुना

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रॉफ़ेसर इर्फ़ान हबीब जानते थे कि स्वयं मुस्लिम होने के कारण उनकी स्वतंत्र भावना पर संदेह किया जा सकता है। उन्होने ख़रीद लिया बड़ी ही सहजता से, हिंदू नाम रखने वाले कॉम्युनिस्ट-मार्कसिस्टों को, जो पहले से ही कट्टर हिंदू-विरोधी रहे थे। अनेक हिंदुओं में एक विशेष प्रकार की ग़लतफ़हमी पायी जाती है। बहुधा वे एक हिंदू नाम को दूसरे हिंदू नाम से अलग नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि जिसका नाम सुनने में हिंदू जैसा है वह हिंदू ही होगा। उन्हें यह ध्यान नहीं रहता कि हिंदू होने के लिए हिंदू देवी-देवताओं के प्रति आस्था एवं श्रद्धा अनिवार्य है। वे जब किसी हिंदू जैसे नाम रखने वाले व्यक्ति को हिंदू-विरोधी क्रिया में संलग्न देखते हैं तो यह धारणा बना लेते हैं कि हिंदू ही हिंदू का सबसे बड़ा दुश्मन है! धर्म परित्याग कर भी अनेक हिंदू अपने हिंदू नाम का परित्याग नहीं करते। वे भेड़ की खाल ओढ़े रहकर, भेड़िए की ज़बान बोलना, अपने हित में पाते हैं। अधिकांशतः हिंदू इन्हें पहचान नहीं पाते। वे जब शर्मा नाम पढ़ते तो यही समझते कि जब हिन्दू स्वयं कह रहे हैं तो संभवतः उनकी बात सच ही होगी। वे क्या जानते कि ये सभी हिन्दू-नामधारी घोर नास्तिक (कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट) हैं, जो श्री राम तो क्या, भगवान तक के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते। इर्फ़ान ने शर्मा को, और शर्मा ने अपनी टोली को बड़ी खूबसूरती से चुना।

एक असत्य अपने आप में पर्याप्त नहीं होता

आरंभ से ही, दोनों पक्षों की सहमति से, ऐसा निश्चय किया गया था कि विहिप को, उनके प्रमाणों पर, बीमैक लिखित उत्तर देगी 10 जनवरी से पहले, पर उन्होने अभी तक यह किया नहीं था। उसके बाद और दो सप्ताह बीत चुके थे, 24 जनवरी को दोनों पक्ष मिले, अपने-अपने प्रमाणों पर बात करने के लिए। अब तो कम से कम उन्हें वह लिखित उत्तर देना था, पर नामी कॉम्युनिस्ट इतिहासज्ञ प्रॉफ़ेसर आर एस शर्मा ने इस बैठक में कहा, कि उन्हें और उनके साथियों को, विहिप के द्वारा प्रस्तुत किए गए प्रमाणों को अध्ययन करने का समय ही नहीं मिला। यहाँ दो बातें ध्यान देने के योग्य हैं। पहली कि यह टालमटोल की नीति। समय पर (10 जनवरी) उत्तर न देना। उसके बाद और समय बीतने देना। बाद में (24 जनवरी) कहना कि हमें आपके प्रमाणों को पढ़ने का समय ही नहीं मिला, इतने व्यस्त थे हम! पर दूसरी बात इससे भी कहीं अधिक संगीन थी जिसमें साफ़ बेईमानी झलकती है, सुनिए उसकी कहानी। 24 जनवरी को जिस दिन उन्होने बैठक में कहा कि हमें आपके प्रमाणों को देखने का समय तक नहीं मिला, उसके एक सप्ताह पहले ही इसी प्रॉफ़ेसर आर एस शर्मा ने अपने 41 इतिहासज्ञ साथियों के हस्ताक्षर के साथ एक वक्तव्य जारी किया था, जिसका उन्होने बहुत ज़ोर-शोर से प्रचार करवाया था। उन सभी इतिहासज्ञों ने उस वक्तव्य में भारत की जनता को यह बताया था कि निश्चित रूप से, अवश्य ही, कहीं भी, कोई भी, प्रमाण नहीं है कि उस स्थान पर मस्जिद के पहले कोई राम-मंदिर हुआ करता था। इसी बात पर प्रॉफ़ेसर आर एस शर्मा ने “राम के अयोध्या का सांप्रदायिक इतिहास” (अँग्रेज़ी में) नाम की एक छोटी पुस्तक भी छपवाई थी (संदर्भ - डॉ कोएनराड एल्स्ट, पृ 152)। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि यदि शर्मा एवं 41 इतिहासज्ञों ने विहिप के दिए हुए प्रमाण पढ़े नहीं थे, तो किस आधार पर ज़ोर-शोर से प्रचार कर उन्होने जनता को बताया था कि निश्चित रूप से, अवश्य ही, कहीं भी, कोई भी, प्रमाण नहीं है कि उस स्थान पर मस्जिद के पहले कोई राम-मंदिर था? इसी प्रश्न का दूसरा पहलू यह है कि यदि वे इतने अधिकार के साथ कह सकते थे कि निश्चित रूप से, अवश्य ही, कहीं भी, कोई भी, प्रमाण नहीं है कि उस स्थान पर मस्जिद के पहले कोई राम-मंदिर था, तो फिर 24 जनवरी की बैठक में उन्होने यह बहाना क्यों प्रस्तुत किया कि हम बहस के लिए तैयार नहीं हैं? कौन सा उनका असली झूठ था? यह कि निश्चित रूप से, अवश्य ही, कहीं भी, कोई भी, प्रमाण नहीं है कि उस स्थान पर मस्जिद के पहले कोई राम-मंदिर था, या कि इस वक्तव्य को जारी करने के बहुत पहले आपने हमें जो प्रमाण अध्ययन करने के लिए दिए थे हमने उन्हें पढ़े तक नहीं?

उन्होंने ऐसा क्यों किया

वे जानते थे कि जनता के मन में घर कर जाएगी वह बात जो पहले एक बार ज़ोर-शोर से प्रचारित की गई, और जनता उसे ही याद रखेगी। आगे बैठक में क्या हुआ इस बात की जनता को कोई भनक तक न होगी क्योंकि समस्त बड़े समाचार पत्र उसे छापेंगे ही नहीं। यह एक सोची समझी साज़िश थी। अगली बैठक निश्चित की गई अगले दिन 25 जनवरी के लिए। पर बीमैक के इतिहासज्ञ आये ही नहीं। उन्होने न तो ऐसे कोई लिखित प्रमाण उपस्थित किए जो दर्शाते हों कि राम मंदिर वहाँ कभी नहीं था, न ही उन्होने कोई लिखित खंडन दिया विहिप के प्रमाणों का, न ही उन्होने उपलब्ध प्रमाणों पर आमने-सामने बैठ कर चर्चा की, वे इन सबसे दूर ही रहे। इस प्रकार से भारत सरकार की चेष्टा व्यर्थ गई, एक समाधान खोजने की, उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर, आपसी चर्चा से (संदर्भ - डॉ कोएनराड एल्स्ट, पृ 153)। आप देख रहे हैं कि यह एक सोची समझी चाल का नतीजा है। जब प्रमाणों की बात आए तो पीछे हट जाओ। पर साथ ही बड़े समाचार पत्रों का सहारा लेकर झूठ को फैलाओ ताकि जनता झूठ को ही सच्चाई जाने, और ऐसा ही माने।

अब बड़े समाचार पत्रों का भी चरित्र देख लीजिए

डॉ कोएनराड एल्स्ट के शोधों से हमें पता चलता है, कि जब जन-सभा में यह प्रश्न पूछा गया कि इतिहासज्ञों के वाद-विवाद का क्या परिणाम हुआ, तो प्रॉफ़ेसर इर्फ़ान हबीब (अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहासज्ञ) और सुबोध कांत सहाय (जो उस समय गृह मंत्री थे) ने कहा कि विहिप वाले भाग गए वाद-विवाद से। और उनकी समाचार पत्रों के साथ मिलीभगत देखिए, सभी बड़े समाचार पत्रों ने इस सरासर झूठ का खंडन छापने तक से मना कर दिया (संदर्भ - डॉ कोएनराड एल्स्ट, पृ 170)। जनता को झूठ की जानकारी दी गई और सच को दबा दिया गया। यह है चरित्र हमारे बड़े समाचार पत्रों का। यह चरित्र उस ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा पद्धति की देन है जहाँ हम अपने बच्चों को भेजने में बड़ा गर्व अनुभव करते हैं। समस्या को समस्या के रूप में देखना पर्याप्त नहीं, हमें उसकी जड़ तक पहुँचने की आवश्यकता है। अपनी आने वाली पुस्तकों में हम इस समस्या के जड़ तक आपकी यात्रा कराएँगे, धीरे-धीरे एक-एक कदम लेकर। अधर्म जब फैलता है चारों तरफ़ तो घोर अँधेरा कर देता है। तब आवश्यकता होती है किसी अर्जुन की जो अधर्म का नाश करे।

झूठ के पुलिंदों को ढाँकने के लिए चोरी की भी तो आवश्यकता होती है

डॉ कोएनराड एल्स्ट हमें यह भी बताते हैं कि कम से कम चार बार विहिप के विद्वानों ने बीमैक के विद्वानों को प्रमाण छुपाते या प्रमाण नष्ट करते हुए पकड़ा। ये वे अवसर थे जिन पर ये चोरियाँ पकड़ी गई। कितनी और ऐसी चोरियाँ जो पकड़ में नहीं आईं उनका हमें ज्ञान तक नहीं। इन चार पकड़ी गई चोरियों का खंडन बीमैक के विद्वानों ने नहीं किया। न ही बीमैक के विद्वानों ने ऐसा कोई आरोप विहिप के विद्वानों पर लगाया (संदर्भ - डॉ कोएनराड एल्स्ट, पृ 17-18)। इससे स्पष्ट होता है कि जहाँ एक तरफ़ विहिप के विद्वानों को चोरी का सहारा लेना नहीं पड़ा क्योंकि सच्चाई उनके साथ थी, वहीं दूसरी तरफ़ बीमैक के विद्वान बार-बार झूठ और चोरी का सहारा लेते रहे, अपनी झूठी बुनियाद को छुपाए रखने के लिए। सभी बड़े समाचार पत्रों ने भी उनका भरपूर साथ दिया। क्या सब बिक गए थे? अरब देशों का अपार धन और कब काम आता?

डॉ एन एस राजाराम अपनी पुस्तक ए हिंदू विउ ऑफ़ द र्वल्ड—एस्सेज़ इन द इन्टेलेक्चुल क्षत्रिय ट्रडिशन (प्रकाशक वॉयस ऑफ़ इंडिया, नई दिल्ली, 1998) में लिखते हैं - अयोध्या बहस ने हिंदुओं में एक ऐतिहासिक बोध को जगाया। अतः अब यह कुछ समय की ही बात है कि (अपने आप को) धर्मनिरपेक्ष (कहने वाले) इतिहासज्ञों के द्वारा तैयार किए गए जाली इतिहास का भाँडा फूट जाएगा। उनकी जीविका एवं प्रतिष्ठा अब दाँव पर लगी है। राजनयिक व शासकीय स्वार्थों के प्रश्रय की वजह से, इन पुरुष और इन स्त्रियों ने अनेक वर्षों से वह मान्यता, पद एवं विशेष सुविधाएँ भोगीं, जो उनकी योग्यताओं की तुलना में असाधारण रूप से अधिक थीं। उससे भी बुरी बात यह है कि उन्होने अपने राजनीतिक उद्देश्यों एवं पेशे गत स्वार्थों की उन्नति के लिए इतिहास में बड़ी मात्रा में जालसाज़ियाँ की। आज दाँव पर लगी है इन पुरुषों और इन स्त्रियों की न सिर्फ़ जीविका और प्रतिष्ठा बल्कि एक साधारण मानव के रूप में उनकी पहचान भी। यह स्वीकार करना कठिन होता है कि हम असत्य के आधार पर जीते रहे थे, उससे भी कठिन होता है यह स्वीकार करना कि हमने अपनी जीविका की नींव रखी थी झूठ पर (उद्धृत पृ 91-92)।

काश यह स्थायी हो पाता! पर, केन्द्र में सरकार बदल गई और यही लोग पुनः आ गए तथा आई-सी-एच-आर एवं एन-सी-ई-आर-टी दिल्ली (नैशनल काउन्सिल ऑफ़ एजुकेशनल रिसर्च ऐण्ड ट्रेनिंग अर्थात् राष्ट्रीय शैक्षणिक खोज एवं प्रशिक्षण परिषद्) जैसी केन्द्रीय संस्थाओं पर एक बार फिर से कुण्डली मार कर बैठ गए। साथ ही पुनः आरम्भ हो गया ऐतिहासिक जालसाजियों का वही पुराना दौर। आज हमारे समाज में बौद्धिक बेईमानी इतनी बढ़ गई है क्योंकि इन्हें उचित सजा का प्रावधान ईसाई-अँग्रेज़ों द्वारा हम पर थोपे हुए आधुनिक न्यायशास्त्र में नहीं है। जब समाज के कर्णधार ही बेईमानों की जात होगी तो बाकी प्रजा कैसी पैदा होगी? जब ऐसे कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट प्राध्यापक एवं प्राध्यापिकाएँ ही बेईमानों के सरताज होंगे तो उनके पद चिह्नों पर चलने वाले छात्र-छात्राएँ कैसे बनेगें?

एक ज्वलंत उदाहरण आपके सामने

अब उनके पद चिह्नों पर चलने वाली एक आदर्श छात्रा का उदाहरण देखिए। प्रॉफ़ेसर मंजरी काट्ज़ू तुलना करतीं हैं श्री राम की हिटलर व मुसोलिनी से (संदर्भ - पुस्तक समीक्षा, द फ़्री प्रेस जरनल में प्रकाशित, मुम्बई संस्करण, 30 मार्च 2003, स्पेक्ट्रम पृष्ठ 6 स्तम्भ 3)

इस पर उन्हें मिलती है डॉक्टरेट की उपाधि। धन्य है वह विश्वविद्यालय जिसने दी उपाधि उनको डॉक्टर की, बनाया उन्हें प्रॉफ़ेसर। उन्हें डॉक्टर की उपाधि देने वाले एवं उन्हें प्रॉफ़ेसर बनाने वाले भी तो ये प्राध्यापक एवं प्राध्यापिकाएँ ही हैं जिन्होंने झूठ विरासत में पाई है और जो झूठ बाँटते फिरते हैं। इस प्रकार से उनकी फ़सलें बढ़ती जाती हैं — एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी तैयार होती रहती है। सोचिए क्या होगा, आप के बच्चों का, जो सीखेंगे उनसे कि हमारे श्री राम थे, एक जानवर उन हिटलर व मुसोलिनी की तरह। और यह मंजरी काट्ज़ू हैं कौन? इनके दादाजी हुआ करते थे अध्यक्ष विश्व हिंदू परिषद् के। वही विश्व हिंदू परिषद् जो श्री राम मंदिर के लिए लड़ने को बना था! क्या बीती होगी उन पर? क्या उन्होने सोचा होगा कि एक दिन ऐसे भी नमूने पैदा होंगे उनके वंश में? दोष वंश का नहीं, दोष शिक्षा का है और हमारी चाहत का। हम भेज देते हैं अपने बच्चों को ईसाई स्कूलों में और फिर दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्टों के गढ़ में। ईसाई और नास्तिक कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट उन्हें सिखाएँगे क्या? यही तो सीखेंगे, जो सीखा है हमारी प्यारी मंजरी काटज़ू ने!

धर्म निरपेक्षता का यह आडम्बर

कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट को आसानी से पहचानना मुश्किल है। नेहरू ने उसे एक नया नाम दे दिया था धर्मनिरपेक्ष क्योंकि उसके पास अपना कोई धर्म न था और वह अपने को शिक्षा से ईसाई, रुचि से मुसलमान, दुर्घटना से हिन्दू कहता था। ऐसे व्यक्तियों का एकमेव धर्म होता है सत्ता एवं उस सत्ता के द्वारा हासिल की गई शोहरत, धन एवं वह सब कुछ जिसका वह हकदार न रहा हो। धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट बुद्धिजीवी हिंदू समाज के ब्राह्मण की छवि को सतत मलिन करने की चेष्टा में लगा रहा, कारण उसे स्वयं हिंदू समाज में ब्राह्मण के स्थान पर अधिकार जमाना था। हिंदू समाज में ब्राह्मण हुआ करता था अन्य वर्णों का अध्यापक एवं दिग्दर्शक। उसी स्थान की होड़ में परोक्ष रूप से लगे रहे हैं, ये आज के कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट बुद्धिजीवी एवं कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट प्राध्यापक-प्राध्यापिकाएँ। यही कारण रहा है कि वे हर एक उस कोशिश में लगे रहते हैं, कि किस प्रकार से ब्राह्मण का स्थान हिंदू समाज में एक अवांछित स्थान बना दिया जाए——ईसाई मिशनरी सेंट ज़ेवियर ने आरंभ की थी यह प्रक्रिया 16वीं शताब्दी में जिसको अन्जाम दिया ईसाई-अँग्रेज़ी सरकार ने एवं उनके आरक्षण में पल रहे ईसाई मिशनरी स्कूलों ने। जब वे गए तो छोड़ गए अपने औलाद नेहरू जैसे अनेक। इस प्रक्रिया को पूरे ज़ोर-शोर से आगे बढ़ाया 20वीं शताब्दी के कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट बुद्धिजीवियों ने। कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट बुद्धिजीवी कहता है अपने आप को धर्मनिरपेक्ष, पर वह है नहीं धर्मनिरपेक्ष। यह उसका मुखौटा है। भगवान को वह मानता नहीं। हिंदू को वह अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता है पर स्पष्ट रूप से कहता कभी नहीं। इस कारण हम नहीं जान पाते कि वह प्रत्येक नई पीढ़ी को कैसे थोड़ा और हिंदू-विरोधी बनाता जाता है। जो बनता है वह स्वयं भी नहीं जानता कि अंदर ही अंदर वह धीरे-धीरे कितना हिंदू-विरोधी बनता जा रहा है। कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट बुद्धिजीवी होने के लिए यह आवश्यक नहीं कि आप कॉम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हों। आपकी सोच कॉम्युनिस्ट हो, इतना ही पर्याप्त है। यही सोच पहले आपको अहिंदू बनाता है और जैसे-जैसे इस सोच का प्रभाव आपके मानसपटल पर गहरा होता जाता है, त्यों-त्यों आप अधिकाधिक हिंदू विरोधी बनते जाते हैं।

आप संभवतः लक्षणों को नहीं पहचान पाते

आप उन्हें कॉम्युनिस्ट की ज़बान में बोलते हुए नहीं पाते। उदाहरण के लिए पूँजीपति, सामंतवादी और ऐसे शब्दों का सतत प्रयोग। इससे यह न मान बैठें कि उनकी सोच पर कॉम्युनिज़्म-मार्क्ससिज़्म का प्रभाव नहीं। अपनी संतानों में हिंदू देवी-देवताओं के प्रति अविश्वास या उलाहना की भावना को देखिए। आप इसे अनदेखा करते जाते हैं। आप यह सोच कर अपने आप को सांत्वना दे लेते हैं कि आज ये बच्चे हैं, कल जब बड़े होंगे तो जीवन के थपेड़े स्वयं इन्हें धर्म एवं ईश्वर को मानना सिखा देंगे। सभी धर्म भगवान को किसी न किसी रूप में मानते हैं। एक कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट है जो भगवान के अस्तित्व को नहीं मानता। हमारे देश में ये अपने आप को कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट न कहकर धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, क्योंकि यह शब्द सुनने में अधिक आदरणीय लगता है। धर्मनिरपेक्ष कह कर ये यह जताना चाहते हैं कि वे धार्मिक सोच जैसी संकुचित मनोवृत्ति से ऊपर हैं! अब उनके आचरणों को गौर से देखिए, जिनके पीछे उनकी असली सोच झलकती दिखेगी। उनकी सोच में आपको सभी धर्मों के प्रति समभाव कभी न मिलेगा। बहुधा बुद्धिजीवी, कलाकार, चलचित्र निर्देशक, लेखक, साहित्यकार, राजनीतिज्ञ, प्राध्यापक, इत्यादि होने के कारण उनकी बोली मँजी हुई होती है, पर बोली पर न जाएँ। उनके आचरण को देखें और उनकी सोच को पहचानें। ये आपकी संतानों को ग़लत रास्ते पर ले जा रहे हैं। जैसे-जैसे आपकी संतानें बड़ी होंगी, उनकी सोच और भी गहरी होती जाएगी। उनकी यह सोच फैलती जाती है, प्रभावित करती है अन्य लोगों को, अनेक माध्यमों से, उदाहरण के लिए — पत्र-पत्रिकाएँ, टीवी सीरियल, सिनेमा, साहित्य, टीवी वार्तालाप एवं टीवी पर बहस, इत्यादि। अतः सोचें आपको क्या करना है।

हिंदू ब्राह्मण की विडंबना

हिंदू ब्राह्मण को अपनी बेड़ियाँ काट कर एक बार फिर उठ खड़ा होना होगा। उसे हिंदू युवा वर्ग का शिक्षक एवं मार्गदर्शक बनना होगा। हिंदू क्षत्रिय को इसमें सहायता करनी होगी, वैसे ही जैसे श्री राम ने की थी विश्वामित्र की! आज हिंदू क्षत्रिय को उठ कर बेड़ियों में जकड़े ब्राह्मण को मुक्त कराना होगा, ताकि वह पुनः बन सके हिंदू समुदाय का शिक्षक एवं मार्गदर्शक। “यदि ब्राह्मण न होता तो मैं सारे हिंदुओं को ईसाई बना चुका होता”, ऐसा लिखा था सेंट ज़ेवियर ने सोसाइटी ऑफ़ जीसस को 16वीं सदी में। समय गुज़रता गया, ज़ेवियर-पुत्रों ने ब्राह्मण को बेड़ियों में जकड़ दिया और आगे चल कर मकॉले-मुलर-नेहरु-पुत्रों ने ब्राह्मण के मुँह पर कालिख मल दी। ब्राह्मण मुँह छुपा बैठा, ज़ेवियर-पुत्रों ने हिंदू को ईसाई बनाया और नेहरू-पुत्रों ने हिंदू को मार्क्ससिस्ट बनाया। आज यदि हिंदू फिर से हिंदू बनना चाहे तो उसे ब्राह्मण को उसका खोया सम्मान दिलाना पड़ेगा। हिंदू इतिहास हमें बताता है कि क्षत्रिय ही ब्राह्मण का रक्षक हुआ करता था - भूल गए श्री राम को? आज उस क्षत्रिय को अपना क्षात्र-धर्म निभाना होगा। यदि क्षत्रिय चूकेगा तो एक ब्राह्मण को परसा हाथ में लेकर एक बार फिर परशुराम बनना पड़ेगा। इस बार वह परशुराम क्षत्रियों का नहीं, बल्कि ज़ेवियर-पुत्रों एवं मकॉले-मुलर-नेहरु-पुत्रों का संहार करेगा। इस लिए हिंदू क्षत्रिय, तुम्हें भी आज जागना होगा, हिंदू मर्यादा की रक्षा के लिए, क्योंकि परसा उठाना ब्राह्मण की मर्यादा को नष्ट करेगा। 

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