यहूदी धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम, कॉम्यूनिज़्म, हिन्दू धर्म (भाग 1)

वह दिन बहुत दूर नहीं जब या तो आपके पास अथवा आपकी संतानों के पास वह जमीन भी न होगी जिस पर आप चल सकें

अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मानक संख्या ISBN 978-81-89746-22-0 प्रकाशित 22 जुलाई 2008

पुस्तक समीक्षा

श्री श्रुतिवन्त दुबे 'विजन' 
राष्ट्रपति पदक प्राप्त, राष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित, विद्यावाचस्पति (मा0) 
जिला अध्यक्ष इण्डियन प्रेस कौंसिल, जिला सीधी, म प्र, पत्रांक 116, दिनांक 29-7-2006
श्री श्रुतिवन्त दुबे 'विजन', ग्राम पो0 डगाबरगवाँ, जि0 सीधी, म प्र 486 886, फोन 07805-280062
(यह समीक्षा पुस्तक के प्रथम खण्ड के प्रथम संस्करण पर आधारित है)
"मानोज रखित लिखित लघु कृति पढ़ा। प्रभाव वृहद पाया। धर्म की सर्वव्यापकता, सर्व ग्राह्यता, सार्वजनीनता पर विचार करती छोटी पुस्तिका अतीत की खोज वर्तमान पर दस्तक देती व भविष्य को आगाह करती है। धर्म पाखण्ड पर चोट करता लेखक पाखण्डियों को फटकार भी लगाता है। धर्म के वास्तविक स्वरूप को बिना जाने खोखले व अधूरे ज्ञान को बांटते उपदेशकों के खोखले व सपाट चेहरों को उजागर करता है। सच्चाई पूर्वक व भयमुक्त कलम धर्म की व्याख्या में निष्ठावान व आस्थावान है। मैं निरन्तर रखित की पुस्तकों का अध्ययन करता आ रहा हूँ। हर पुस्तक में नवीनता मिलती है। अदम्य साहस, लगन और उत्सह की जीवट यात्रा में अग्रसर कलम मानवीय धर्म की प्रस्तोता है। हिन्दू धर्म में स्वरूपगत व नैतिक गिरावट चिन्ता का विषय है। यही कारण है कि लेखक चिन्तित है तथा धर्म उन्नयन हेतु अपने सन्देश-पत्रों के माध्यम से हिन्दू धर्मावलम्बियों और धार्मिक मठों का आह्वान भी करता है। सभी धर्मों की समानता का मिथ्या प्रलाप करने वाले धर्मपूत स्वतः अज्ञानी हैं तथा अपने उसी अज्ञान को आज तक परोसते आ रहे हैं। यह झूठा सच हिन्दू मूल्यों, हिन्दू ज्ञान व हिन्दू वेष, परिवेष व देश के लिए घातक है। "बड़ी संख्या में हिन्दू धर्मोपदेशक कहते हैं कि सभी धर्म उसी एक ईश्वर तक ले जाते हैं हम सबको।" दूसरी ओर "पर सभी एक जैसे नहीं हैं, मुट्ठीभर धर्मोंपदेशक उन सबसे अलग हैं" स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी देवानन्द सरस्वती, स्वामिनी प्रमानन्द सरस्वती, स्वामी सिद्धबोधानन्द सरस्वती, महामण्डलेश्वर डॉ स्वामी शिवस्वरूपानन्द सरस्वती, आचार्य श्री अवस्थी, आदि के नाम पुस्तिका में बड़े सम्मान के साथ अंकित हैं। मैं शुद्ध श्रद्धा व भक्ति के साथ नतमस्तक हूँ। ऐसे धर्मगुरुओं का चरण-रज पाने के लिए व्याकुल हूँ। इसलिए नहीं कि चरण-रज मेरे मोक्ष का साधन बने, बल्कि इसलिए कि वह चरण-रज ज्ञान-रज बनकर उन तक पहुॅँचे जो हिन्दू होकर भी देश के गाँवों मे बहुसंख्या में सुसुप्ति की अवस्था में हैं। 'बड़ी संख्या' वाला धर्मोपदेश ही प्रचारित है अधिक, 'मुट्ठीभर' का उपदेश भले ही सचाई का सौगन्ध खाये, बहुसंख्या तक नहीं पहुँच पा रहा है; मुट्ठीभर तक ही सीमित रह गया है। कितना अच्छा होता- छोटी-छोटी सन्देश पुस्तिकाओं के माध्यम से दूरस्थ हिन्दू समाज मे धर्मसूचना रूप में पहुँचता।
इस नन्ही पुस्तिका के लेखक रखित को मैं उनके दीर्घायु की कामना के साथ धन्यवाद देना चाहूँगा, जिन्होने धर्म व्याख्या प्रस्तुत कर हिन्दू धर्म के उद्धार की दिशा मे अपना कदम उठाया है। बंगाली धरती की कोख के पावन उपज, नारायणी माँ के प्रिय, सम्पूर्ण धर्मों के व्याख्याता रखित से हिन्दू धर्म की अपेक्षायें अभी और हैं। आवश्यकता इस बात की है कि नन्हे धर्म-सन्देश देश के कोने-कोने में, हिन्दू समाज में पहुँचें। मगर अकेले लेखक यह भार नहीं उठा सकता। साधन संसाधन सम्पन्न धर्म संस्थाओं, धार्मिक मठों को चाहिए कि वे आगे आयें व इस पवित्र कार्य में मदद करके हिन्दू धर्म को क्षरण से बचायें। विभिन्न धर्मों के अंधेरे परतों को खोलते हुए सूर्य की प्रतीक्षा करें। सूर्योदय होने पर उजाला तो होगा ही। अंग्रेज गए किन्तु भाषा छोड़कर। 1947 के पहले अंग्रेजों का शासन था। 1947 के बाद अंग्रेजी भाषा का। व्यक्ति का शासन बाहरी धरातल पर होता है, किन्तु भाषा का शासन आन्तरिक धरातल पर। यही कारण है कि हिन्दू संस्कृति को  प्रभावित करती अंग्रेजी भाषा हिन्दू नौनिहालों को वयस्क अंग्रेजी बनाती जा रही है। इसे लेखक ने बड़े ही सरल ढंग से व्यक्त किया है - "अंग्रेजी शिक्षा हमे अपने ही सांचे में ढालती जा रही है और भूलिए मत कि हमारे ये नेता, ये शिक्षक, ये बुद्धिजीवी, ये दिग्दर्शक, ये धर्मोपदेशक सभी ईसाई-अंग्रेजी शिक्षा की पैदावार हैं" इन पंक्तियों के प्रस्तुतिकरण मे लेखक का इशारा शासन की ओर भी है। क्या अंग्रेजी शिक्षा पद्धति का बिरबा हिन्दुस्तान की हिन्दू-भूमि पर उर्वरक पाकर अनन्त काल तक लहलहाता रहेगा? संविधान में निर्दिष्ट पन्द्रह वर्ष क्या कभी बीतेंगे? संविधान मे प्रयुक्त किन्तु परन्तु क्या देश हित, समष्टि हित लीलते रहेंगे? यह सवाल है राजनीति से। हालांकि, इन सवालों से राजनीति को लाल मिर्ची भी लग सकती है। कुल मिलाकर व्याख्या शोध आधारित, हिन्दूधर्मसाधक, मानवीय मूल्य रक्षक व हिन्दुत्व बोधक है। कृति संप्रेषनीय, पठनीय व संग्रहणीय है। मेरी मंगल कामनायें कृति व कृतिकार दोनों के लिए।"   

पुस्तक

वे जो नास्तिक हैं एवं जो धर्म के व्याख्याता हैं

अतीत में जायें तो हम देखेंगे कि मानव जीवन पर सबसे गहरा प्रभाव सदा से धर्म का ही रहा है। आज भी यही स्थिति है और कल भी यही रहेगी।

मानव जीवन पर धर्म के प्रभाव को हटाने अथवा मानव जीवन को धर्म के प्रभाव से दूर रखने के लिए अनेक प्रयोग किए गए नास्तिकों द्वारा। इस प्रकार की सोच का प्रतिपादन करने वाले अपने आपको नास्तिक घोषित करने से बचते रहे क्योंकि उन्हें यह डर लगा रहता था कि समाज उनका तिरस्कार कर सकता है - वह समाज जो धर्म के आधार पर खड़ा हो।

वे अपने नास्तिक होने की सच्चाई को छुपाते रहे, अपने आपको दार्शनिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, विकासवादी  (डार्विन की परिकल्पना), साम्यवादी  (मार्क्स की परिकल्पना), इत्यादि की संज्ञा देकर।

उनमें से अधिकांशतः व्यक्ति आते रहे समाज के उस वर्ग से जो अपने आपको बुद्धिजीवी कहता है - जिन्होंने अपनी "छोटी सी" बुद्धि पर इतना बड़ा बोझ डाल दिया कि अन्त में उनकी बुद्धि जवाब दे गई - इस विषय पर कि ईश्वर का अस्तित्व है कि नही।

साधारण जनमानव को अपनी प्रतिभा से प्रभावित करने की बुद्धिजीवियों में एक जन्मजात प्रवृत्ति हुआ करती है। छपे हुए साहित्य पर उनका वर्चस्व होता है। अब तो उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर भी अपना वर्चस्व कायम कर लिया है।

पर उनकी सोच में एक मूढ़ता है। मानव में, अपनी जड़ों से अपना सम्पर्क स्थापित करने की, जो मूल प्रवृत्ति होती है, उसे वे अनदेखा करना चाहते हैं। इस कारण, यद्यपि उनकी प्रस्तुति प्रभावशाली होती है, इसके बावज़ूद वे अपने इस "छोटे से" शिविर में जन समुदाय के विशाल समूह को नहीं ला पाते। हाँ, यह अवश्य है कि उनका आधा-अधूरा ज्ञान बड़ी मात्रा में भ्रान्तियाँ पैदा कर देता है एवं जन समुदाय को भ्रष्ट कर देता है।

अतः यही बुद्धिमानी होगी कि हम धर्म को समझने की सच्ची चेष्टा करें। आजकल यह देखने में आता है कि बड़ी मात्रा में लोग धर्म की शिक्षा एवं प्रवचन को अपनी जीविका का माध्यम बनाये हुए हैं। इससे निहित स्वार्थों की उत्पत्ति होती है। इसका परिणाम यह होता है कि धर्म की छवि विकृत हो जाती है।

अब समय आ गया है कि हम इन प्रवचकों का, अंध श्रद्धा के साथ, अनुसरण करना बंद करें। हमें अपने धड़ के ऊपर एक सर दिया गया है और यह आशा की जाती है कि हम उसका प्रयोग करें। कोई कारण नहीं कि हम इसे पेशेवरों के पास गिरवी रख दें।

गाँधी के तीन बन्दर एवं हम हिन्दू

वे केवल अपने अंदर की बुराइयों को नष्ट करने की बात कहते रहे। अपने चहुँ ओर व्याप्त बुराइयों पर नजर डालने से सदा इंकार करते रहे। वे अपनी आँखों को बंद कर लेना पसंद करते ताकि देखने की आवश्यकता न रहे।

इस विचारधारा को बल देने के लिए गाँधी ने भी यही किया, अपने तीन बंदरों के प्रतीक को बड़ी महत्ता देकर - एक बुरा न देखेगा, दूसरा बुरा न सुनेगा, तीसरा बुरा न कहेगा। उन तीनों ने एक-एक कर अपनी आँखें, अपने कान, अपनी जुबान बंद कर ली।

इस प्रतीक में तीन बंदर थे। पर जब बात मानव पर आई तो उसने सोचा कि हमें बंदरों से भी आगे बढ़ जाना चाहिए। अतः उन्होंने निर्णय किया कि क्यों न हम ऑल-इन-वन बन जायें।

उन्होंने अपनी आँखे बंद कर लीं, अपने कानों को ढक लिया और अपनी जुबान को सी दिया। इस प्रकार उन्होंने अच्छे और बुरे के बीच के फ़रक को पहचानने की योग्यता खो दी। इसे माना गया एक महत्वपूर्ण उन्नति - वानर के अस्तित्व से ऊपर उठकर - मानव तत्व की ओर विकास के रूप में।

इस प्रकार बना दिया उन्होंने धार्मिक व्यक्ति को पूर्णतः शस्त्र-विहीन एवं अधार्मिक व्यक्ति को अधिपति इस धरती का - जहाँ तक उसकी दृष्टि जाती। कितनी बड़ी उपलब्धि थी यह, और कितनी सुन्दर दार्शनिकता।

एक दिन आयेगा जब हिन्दू को उस अप्रिय सत्य का सामना करना होगा

हिंदू बच्चा अपने विद्यालय के शिक्षक पर विश्वास करता है। शिक्षक कहता है - सभी धर्म समान हैं। हिंदू बच्चा एक दिन बड़ा होता है एवं प्रौढ़ बन जाता है और तब अपने इस विश्वास को अपने बच्चों के लिए विरासत में छोड़ जाता है।

हिंदू इसके आगे नहीं सोचता। उसकी जिज्ञासा यहीं शांत हो जाती है। वह व्यस्त हो जाता है अपने परिवार के लिए रोटी, कपड़ा, मकान जुटाने में एवं उनके लिए एक सुरक्षित भविष्य की व्यवस्था करने में।

उसे इस बात का अहसास नहीं होता कि एक दिन आयेगा जब उसे - या फिर उसकी संतति को - उस अप्रिय सत्य का सामना करना पड़ेगा जिसे वह अनदेखा कर रहा है। पर तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।

और तब, हम अपने आप को इस जगह पर पायेंगे

"यदि तुम नहीं लड़ोगे तब, जब तुम्हें विजय मिल सकती है, बिना किसी रक्तपात के - यदि तुम नहीं लड़ोगे तब, जब तुम्हारी विजय सुनिश्चित है एवं बहुत महंगी नहीं - वह घड़ी आयेगी जब तुम्हें लड़ना होगा और सारी परिस्थितियाँ तुम्हारे विरुद्ध होंगी एवं बहुत कम सम्भावना रह जायेगी तुम्हारे जीवित रहने की। इससे भी बदतर स्थिति आ सकती है - जब तुम्हें लड़ना होगा, विजय की आशा के बिना - क्योंकि मर जाना बेहतर है गुलाम बन कर जीने से।"

उपरोक्त बात कही थी एक ऐसे व्यक्ति ने जिसके लिए मेरे मन में कोई श्रद्धा नहीं है, क्योंकि उसके मन में हिंदुओं के प्रति कोई श्रद्धा नहीं थी, यदि था कुछ तो केवल तिरस्कार। मेरा मापदण्ड बहुत सहज है - मेरी श्रद्धा केवल सत्पात्र के लिए, कुपात्र के लिए नहीं।

इसके बावज़ूद मैंने उसकी कही हुई बात आपके सामने रखी क्योंकि मेरा बैर सत्य से नहीं। उस व्यक्ति ने यह बात कही थी तब जब उसके ''ईसाई राष्ट्र'' का अस्तित्व खतरे में था। यह बात उतनी ही सत्य है आज हिन्दू धर्म के अस्तित्व के संदर्भ में। अभी भी कुछ समय बाकी है - चेतो। 

क्या तुम्हारी नज़र पड़ी उस नन्हें से बीज पर, जो परिवर्तित हो गया एक विशाल वृक्ष के रूप में, और अब उसने जोखिम में डाल दिया है, उस विराट प्रासाद के अस्तित्व को

क्या आपने देखा है एक नन्हें से बीज को, जो उपजाऊ जमीन, खाद, पानी पाकर, समय के साथ, एक प्रकाण्ड वृक्ष बन गया। क्या आपने देखा उस वृक्ष को - जो खड़ा था एक विराट शक्तिशाली प्रासाद के बहुत निकट - जिसने समय के साथ धीरे-धीरे उसी विराट प्रासाद के नीचे - फैला दी अपनी जड़ें, काफ़ी दूर-दूर तक एवं पर्याप्त गहराई में जाकर - जिसे न देख पाये उसी प्रासाद में रहने वाले लोग।

फिर वह दिन आया जब आपको बताया गया कि उसी प्रासाद की मज़बूत फ़र्श पर दरारें दिखने लगी हैं। जब आप पहुँचे पर्यवेक्षण के लिए तो आपकी नज़र पड़ी उन दरारों पर जो तेजी के साथ चौड़ी होती जा रही थीं और अब बहुत स्पष्ट रूप से दिखने लगी थीं। यह वह समय था जब - सम्भवतः - आपके मानस-पटल पर वह भयावह छवि उभरी कि अब बहुत देर हो चुकी है।

आपके पास अब केवल एक ही रास्ता बचा था। वह यह कि सम्पूर्ण प्रासाद को ढहा देना होगा इसके पहले कि आप उस अवांछित विशाल वृक्ष को जड़ से उखाड़ फ़ेंक सकें। अब आप अपने आप को कितना असहाय पा रहे थे। समय रहते आप अपनी नजरें फेरे रहे उस सच्चाई से जिसे आप देखना नहीं चाहते थे। वह वृक्ष अपनी जड़ें फैलाता रहा आपकी नाक के नीचे और आप आसमान की तरफ देखते रहे।

देखिए किसने आपकी आँखों पर पट्टी बाँध रखी है

बड़ी संख्या में हिन्दू धर्मोपदेशक कहते हैं कि सभी धर्म उसी एक ईश्वर तक ले जाते हैं हम सबको। यह कैसे सम्भव है जब ईश्वर की परिकल्पना ही भिन्न-भिन्न है, अलग-अलग धर्मों की नज़रों में?
कुछ धर्म ईश्वर को देखते हैं एक कसाई के रूप में - जो उन सभी व्यक्तियों का - जो मूर्तिपूजक हैं - सरे आम कत्ल करने का आदेश देता है अपने अनुयायियों को। क्या हिन्दू धर्म भी ईश्वर को इसी कसाई के रूप में देखता है?

कदापि नहीं। तो फ़िर एक कैसे हुए - हिन्दू धर्म का ईश्वर और उन धर्मों का ईश्वर जो मूर्तिपूजक हिन्दुओं का सरे आम कत्ल करने आदेश देता हंै अपने धर्मावलम्बियों को। ये दोनों विपरीत चरित्र के ईश्वर एक कैसे हुए?

वे सभी उपदेशक जो करोड़ों हिन्दुओं को बताते हैं कि सभी धर्मों के ईश्वर एक ही हैं - क्या उन्हें इस बात का एहसास है कि वे हिन्दुओं को कितनी हानि पहुँचा रहे हैं - उन हिन्दुओं को जिन्होंने अपना विश्वास उन्हें अर्पित किया है।

पर सभी एक जैसे नहीं हैं - मुट्ठी भर धर्मोपदेशक उन सब से अलग भी हैं

मैं उन्हीं के बारे में कह सकता हूँ जिनके सम्पर्क में मैं आया। उदाहरण के लिए - शबरी धाम (गुजरात) के स्वामी असीमानन्द; सीकर (राजस्थान) के आचार्य श्री अवस्थी; कोलाथूर कोज़िकोडे के स्वामी चिदानन्द पुरी; तिरुवनमलई के स्वामी देवानन्द सरस्वती; गोवा के डॉ जयन्त बाळाजी आठवळे; चेन्नई के स्वामी ज्योतिर्मयानन्द पुरी; हरिद्वार के स्वामी मुक्तानन्द सरस्वती; अनईकट्टी की स्वामिनी प्रमानन्द सरस्वती; नवसारी की सदविद्यानन्द स्वामिनी; आर्य समाज के स्वामी संकल्पानन्द सरस्वती; हरिद्वार के महामण्डलेश्वर डॉ स्वामी शिव स्वरूपानन्द सरस्वती; अनईकट्टी के स्वामी सिद्धबोधानन्द सरस्वती; द्वारका पीठ के स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती; हरमोडा जयपुर के स्वामी वसन्तानन्द सरस्वती। और भी अनेक होंगे जिनसे मेरा सम्पर्क अभी तक नहीं हो पाया है।

इन सबके बावज़ूद

धर्मगुरुओं में से अनेक ऐसे नहीं हैं - जिनमें अन्य धर्मों के संबंध में पर्याप्त ज्ञान हो अथवा जिनमें अन्य धर्मों के संबंध में ज्ञान प्राप्त करने की पर्याप्त इच्छा हो। तब उनके अनुयायिओं में वह ज्ञान कहाँ से आयेगा?

और जिन धर्मगुरुओं के पास पर्याप्त ज्ञान है - उनमें से अनेक ऐसे नहीं हैं - जिनमें दृढ़ विश्वास एवं सत्साहस हो - सत्य को उजागर करने का। तब उनके अनुयायिओं में वह सत्साहस कहाँ से आयेगा? 

पुस्तक संख्या 15 "मज़हब ही सिखाता है आपस में बैर करना" में हमने प्रस्तुत की थीं मात्र कुछ झलकियाँ। आइये अब उसी विषय को थोड़ी सी गहराई में जाकर समझने की चेष्टा करें यहाँ।

यहूदी धर्म

ईसाई बाइबिल का प्रथम खण्ड ओल्ड टेस्टामेन्ट यहूदी मूल का है। थोड़े समय के लिए इसे एक बीज के रूप में कल्पना करें। जैसे-जैसे आप आगे बढ़ेंगे, आप देखेंगे कि इस बीज ने एक अनोखी प्रक्रिया को जन्म दिया जो है - पृथ्वी पर वर्तमान समस्त संस्कृतियों का समूल नाश कर दो।

आगे बढ़ने से पहले, आइये, हम आपको कुछ परिभाषाओं से परिचित करायें

ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश पृष्ठ 1291 "ओल्ड टेस्टामेन्ट - ईसाई बाइबिल का प्रथम खण्ड"

ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश पृष्ठ 988 "यहूदी धर्म - यहूदियों का एकेश्वरवादी धर्म - इसके उद्भव के लिए यहूदी धर्म देखता है इन धर्मग्रंथों की ओर (1) बाइबिल में लिपिबद्ध - ईश्वर की अब्राहम से की गई प्रतिज्ञा एवं (2) तोराह में लिपिबद्ध, ईश्वर द्वारा मोज़ेज़ (मूसा) को व्यक्त किए गए ईश्वरीय कानून"

ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश पृष्ठ 5 "अब्राहम - (बाइबल में) - यहूदियों में मानव जाति का पिता जिसके वंशज हैं सभी यहूदी (अध्याय जेनेसिस 11:27 से 25:10 तक)"

ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश पृष्ठ 1955 "तोराह - ईश्वर का कानून - जैसा कि ईश्वर ने व्यक्त किया मोज़ेज़ को - एवं इसे लिपिबद्ध किया गया हिब्रू धर्मग्रंथों के प्रथम पाँच पुस्तकों में (द पेन्टाट्यू)"

ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोश पृष्ठ 1374 "पेन्टाट्यू - ओल्ड टेस्टामेन्ट की प्रथम पाँच पुस्तकें (जेनेसिस, एक्सोडस, लेविइकस, नम्बर्स एवं डिउटेरॉनॉमी) - यहूदी नाम तोराह"

इन परिभाषाओं से हम क्या जान पाते हैं?

*  "ईसाई बाइबिल" का प्रथम खण्ड  है ओल्ड टेस्टामेन्ट
*  यहूदी निम्नोक्त धर्म ग्रन्थों को मानते हैं (अ) बाइबिल एवं उसमें दी गई "ईश्वर की अब्राहम से की गई" प्रतिज्ञा (ब) तोराह एवं उसमें दर्ज की गई "ईश्वर द्वारा मोज़ेज़ (मूसा) को व्यक्त किए गए" ईश्वरीय कानून
*  अब्राहम का स्थान यहूदियों में वही है जो मनु का स्थान हिंदुओं में है
*  हिब्रू धर्मग्रंथों के प्रथम पाँच पुस्तकों में यहूदियों के ईश्वर के कानून दर्ज हैं जिन्हें तोराह या पेन्टाट्यू कहा जाता है
*  बाइबिल के प्रथम पाँच पुस्तकों (जेनेसिस, एक्सोडस, लेविइकस, नम्बर्स एवं डिउटेरॉनॉमी) को भी पेन्टाट्यू या तोराह कहा जाता है।
*  अर्थात यहूदियों के ईश्वरीय कानून को जानने के लिए ईसाई बाइबिल ही पर्याप्त है।

बाइबिल में प्रयुक्त यहूदी एवं ईसाई शब्दों के उच्चारण

Torah दिखता है जैसे लिखा गया हो "तोराह"। पर इसे बोला जाता है कुछ ऐसे - "टॉर्-अ"। मैं अंग्रेज़ी एवं हिब्रू भाषा की इन फोनेटिक (स्वरविज्ञान संबंधी) मूर्खताओं पर समय नष्ट नहीं करना चाहता। अतः मैं अँग्रेज़ी या हिब्रू शब्दों को हिन्दी में वैसे ही लिखूँगा जैसे वे दिखते हैं। इस बात की पुनरावृत्ति मैं बार-बार - इस शृंखला के सभी खण्डों में - नहीं करूँगा।

मेरा उद्देश्य आपको अँग्रेज़ी या हिब्रू के उच्चारण सिखाना नहीं बल्कि उनके धर्म से परिचित कराना है। यदि आप उनका सही उच्चारण नहीं जानते तो आपको किसी प्रकार की हीन-भावना से ग्रस्त होने की आवश्यकता नहीं। यदि कोई आप पर उँगली उठाये कि तुम्हें सही उच्चारण करना नहीं आता, तो आप उन पर उँगली उठायें और कहें - तुम्हें सही ढंग से लिखना नहीं आता। यदि वे तुम पर हँसें तो तुम उन पर हँसो - पुट (put) और बट (but) एक जैसे लिखते हो तो उन्हें पुट और बुट क्यों नहीं कहते - या फिर उन्हें पट और बट क्यों नहीं कहते? याद रखें कि आप जितनी हीन-भावना से ग्रसित होंगे, वे आपको उससे भी अधिक हीन बनायेंगे।

अतः अपनी संस्कृति पर गर्व करना सीखिए। आप देखेंगे कि किसी में हिम्मत नहीं होगी आपसे आँखें मिलाने की। पर आप यदि स्वयं अपनी आँखें नीची कर लेंगे तो आपकी नज़रें सदा झुकी ही रहेंगी।

यहूदी धर्म के ईश्वर के वे कानून जो अन्य धर्मों के अस्तित्व पर सीधा चोट करते हैं

*  पूरी तरह से नष्ट कर दो उन राष्ट्रों को - जो किसी भी अन्य ईश्वर की पूजा करते हों - जब उन पर तुम अपना अधिकार करो ।
*  पूरी तरह से पराजित कर दो उनके देवताओं को, तोड़ डालो उनकी सभी मूर्तियाँ।
*  नष्ट कर दो हर उस चीज को जो उनके देवताओं के पूजा की विधि से जुड़े हों।
*  उनके देवताओं के मूर्तियों को नष्ट कर दो और उस स्थान से उनके देवताओं के नाम और निशान तक मिटा दो।
*  हिंसक भाव से कत्ल कर डालो उनके बच्चों को - उन्हीं की आँखों के सामने - उजाड़ डालो उनके घरों को - और बलात्कार करो उनकी पत्नियों का।
*  उनके प्रत्येक नन्हें बालक का कत्ल कर डालो - उनकी स्त्रियों को मार डालो - पर उनकी कुमारियों को अपने लिए जीवित रखो।
*  माँ का दूध पीते बच्चों को न छोड़ो और सफ़ेद बाल वाले बूढ़ों को भी न बख्शो।
*  पालन करते रहो इन नियमों का - जब तक तुम जीयो इस धरती पर - कभी भी मत भूलो इन्हें।

यहूदी धर्म किस ईश्वर तक पहुँचाने का रास्ता दिखाता है? क्या उसी रास्ते से हम हिन्दू धर्म के ईश्वर तक भी पहुँच सकते हैं?

पवित्र बाइबिल - ओल्ड टेस्टामेंट - डिउटेरॉनॉमी 12:2 "तुम पूरी तरह विनाश कर दोगे उन सभी स्थानों का जिन पर तुमने अधिकार किया, यदि वहाँ के लोग किसी भी अन्य भगवान की पूजा करते हों, चाहे वे ऊँचे पर्वतों पर बसते हों, या पहाड़ियों पर, या फिर हरी-भरी वादियों में।"

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी पृष्ठ 504 "डिउटेरॉनॉमी, बाइबिल की पाँचवी पुस्तक"

पवित्र बाइबिल - ओल्ड टेस्टामेंट - एक्सोडस 23:24 "तुम दूसरों के गॉड (ईश्वर) के सामने न तो झुकोगे और न उनकी सेवा करोगे, बल्कि उन्हें पूरी तरह से विध्वंश कर दोगे, उनकी मूर्तियों को तोड़-फ़ोड़ कर नष्ट कर दोगे।"

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी पृष्ठ 645 "एक्सोडस - बाइबिल की दूसरी पुस्तक"

यहाँ हमारे सामने है एक ईश्वर, जो कहता है कि - घृणा करो अन्य धर्मों से। तो फिर, किस आधार पर हमारे शिक्षक एवं धर्म प्रचारक कहते हैं कि सभी धर्म एक ही ईश्वर की ओर जाने का रास्ता दिखाते हैं?

पवित्र बाइबिल - ओल्ड टेस्टामेंट - एक्सोडस 34:13 "तुम उनकी पूजा की वेदियों को ध्वंश कर दोगे, उनकी मूर्तियों को तोड़ दोगे, उनके उपवनों को काट डालोगे।" 

यह ईश्वर अपने अनुयायियों से कह रहा है कि उन  संस्कृतियों का विनाश कर दो जो मेरी पूजा नहीं करते।

पवित्र बाइबिल - ओल्ड टेस्टामेंट - डिउटेरॉनॉमी 12:3 "और तुम उनके पूजा की वेदियों  को विध्वंश कर दोगे, उनके पूजा के स्तम्भों को तोड़ दोगे, उनके उपवनों को जला दोगे, उनके देवी-देवताआंे के अंकित चित्रों को चीर डालोगे, गढ़ी हुई मूर्तियों को काट डालोगे, उनका नाम तक वहाँ से मिटा डालोगे।"

"कोई धर्म हमें नहीं सिखाता कि हम दूसरों से बैर करें" - यही न सिखाते रहे हमारे शिक्षक हमें बचपन से? क्या उन्होंने हमें सत्य का पाठ पढ़ाया, या फिर मिथ्या का? कैसे आप सत्यप्रिय  बन सकते हैं, इस समाज के प्रति, जिसने आपको पाल-पोस कर बड़ा किया "मिथ्या" के आधार पर?

पवित्र बाइबिल - ओल्ड टेस्टामेंट - ईसाइयाह 13:16 "उनकी आँखों के सामने उनके बच्चों को पूरी शक्ति के साथ उठा कर पटको ताकि उनके टुकड़े-टुकड़े हो जायें, और उनकी पत्नियांे का बलात्कार करो।"

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी पृ 966 "ईसाइयाह - एक बड़ा महत्वपूर्ण हिब्रू (यहूदी) पैगम्बर था"

नोट - "ईसाइयाह" जैसों की शिक्षाओं के आधार पर उनके अनुयायिओं ने गोवा के ब्राह्मणों के साथ जो आचरण किया दो सौ वर्षों तक - क्या "ईसाई" शब्द उसी पर आधारित तो नहीं?

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी पृष्ठ 966 "ईसाइयाह - बाइबिल की एक पुस्तक जिसमें लिपिबद्ध हैं उसकी भविष्यवाणियाँ"

तैयार रहें अपना बलात्कार कराने यदि उनकी शक्ति इतनी बढ़े कि हम उसका प्रतिरोध करने के काबिल न रहें। क्या हमारा हिन्दू धर्म भी हमें यही सिखाता है? किस आधार पर हमारे शिक्षक, बुद्धिजीवी एवं धर्म प्रचारक इस बात का दावा करते रहे कि सभी धर्म एक समान हैं? क्या वे सत्य से अनभिज्ञ थे? यदि हाँ, तो उनका पहला कर्तव्य क्या था? क्या यह नही कि पहले वे स्वयं शिक्षित हो जाते और फिर दूसरों को शिक्षा देते?

जब हिन्दू को यह बताया जाता है कि सभी धर्म एक समान हैं तो वह सभी धर्मों को एक दृष्टि से देखता है। दूसरे धर्म, जो हिन्दू धर्म को धीरे-धीरे मिटा देने के लिए सदा से कार्यरत रहे हैं, उनकी तरफ से, अपनी ओर बढ़ रहे, खतरे से वह पूरी तरह अनभिज्ञ रहता है।

पवित्र बाइबिल - ओल्ड टेस्टामेंट - नम्बर्स 31:17 एवं 31:18 "बच्चों में प्रत्येक नर का कत्ल कर डालो और प्रत्येक उस स्त्री का भी जिसने किसी पुरुष के साथ सहवास किया हो - पर उन सभी मादा बच्चों को जिन्होंने किसी पुरुष के साथ सहवास न किया हो, उन्हें अपने लिए जीवित रखो।"

ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी पृष्ठ 1272 "नम्बर्स - बाइबिल की चौथी पुस्तक"

कितनी सुन्दर शिक्षायें हैं - और हमारे धर्म प्रचारकों की ओर देखो - वे कितने उत्साह के साथ इस धर्म को हिन्दू धर्म के समान बताते हैं। क्या ये अज्ञानी शिक्षक, बुद्धिजीवी एवं धर्मोपदेशक हिन्दू जन समुदाय को प्रबुद्ध नागरिक बना सकते हैं?

पिछले छः पीढ़ियों से ईसाई-अँग्रेज़ी-मिशनरी शिक्षा-पद्धति एक नई दिशा देती रही है - हमारी सोच, हमारी समझ, हमारी भावनाओं, हमारे जीवन मूल्यों एवं हमारी मर्यादाओं को। जैसे एक कुम्हार कच्ची माटी को मनचाहा स्वरूप देता है, उसी प्रकार यह ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा हमें अपने ही साँचे में ढालती रही है। और भूलिए मत कि हमारे ये नेता, ये शिक्षक, ये बुद्धिजीवी, ये दिग्दर्शक, ये धर्मोपदेशक, ये सभी इसी ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा की पैदावार हैं।

इस ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा ने छः पीढियों तक हम पर कड़ी मेहनत की। हमारी इतिहास की पुस्तकों को बदल डाला। अनेक हजारों वर्षों के दौरान संचित किये हुए हमारे ज्ञान, हमारी शिक्षा-पद्धति**, हमारे ज्ञान के भंडार पुस्तकों को नष्ट कर दिया है, और हमें पढ़ाया है कि उन्हें मुसलमानों ने नष्ट किया, जो अपने-आप में सत्य तो था, पर केवल अर्ध-सत्य। मुसलमान केवल उन्हें भौतिक स्तर पर नष्ट कर पाये, फिर भी हमारा ज्ञान जीवित रहा गुरु-परम्परा के द्वारा। ईसाई-अंग्रेज़ों ने हमारी जड़ों को सड़ा दिया, हमें हमारी जड़ों से काट दिया और हमें यह पाठ पढ़ाया कि उन्होंने हमें शिक्षित बनाया।

इस ईसाई-अंग्रेज़ी शिक्षा-पद्धति ने हमें इस हद तक पथ-भ्रष्ट कर दिया है कि अब हम में सुधार की सम्भावना बहुत कम बची है। हम में से जिन्हें अपना अहं अधिक प्यारा है वे तो कभी न बदलेंगे, इतना निश्चित जान लें।

पर जिन्हें इस बात की अनुभूति हो जाती है कि वे शिकार** बने थे - एक गहरे एवं बड़े सोचे-समझे हुए सुनियोजित षड़यंत्र के - वे अपनी सोच में, अपने जीवन के लक्ष्यों में, अपने कार्यक्रम में, अपनी चेष्टाओं में आवश्यक परिवर्तन ला सकेंगे।

अपने आपको को हिन्दुत्व-वादी मानने वाले अनेक व्यक्तियों को इस बात का एहसास तो है कि इन  विधर्मियों (आसुरिक कहना अधिक उचित जान पड़ता है) का हमारे धर्म पर कितना बुरा असर पड़ता रहा है, एवं वे बड़ी लगन के साथ वह सब कुछ करने की चेष्टा करते रहे हैं जो उनसे मोटे तौर बन पड़ता रहा है। पर उन्हें भी बहुत सारी सच्चाइयाँ जाननी बाकी हैं क्योंकि उनके सामने वे सत्य उपलब्ध नहीं थे। जब उन्हें उन सत्यों का ज्ञान होगा तब उनकी सोच में भी काया पलट की विशेष सम्भावना है। तब उनमें से कुछ जी-तोड़ कोशिश में लग जायेंगे सनातन धर्म की रक्षा हेतु। तब उनके समक्ष और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं रह जायेगा। उनका एक मात्र लक्ष्य हो जायेगा - सनातन धर्म की रक्षा - और, वे लगा देंगे सब कुछ उनका दाँव पर केवल इस उद्देश्य के प्रति।

**      पढ़ें "भारत के इतिहास पर एक नई दृष्टि" (भावी प्रकाशन) अथवा "Do your history textbooks tell you these facts?" (तृतीय संस्करण 248 पृष्ठ) 

पवित्र बाइबिल  - ओल्ड टेस्टामेंट - डिउटेरॉनॉमी 32:24 एवं 32:25 "उन्हें भूख से तड़पाओ और जलती हुई आग की लपटों को निगल जाने दो उनके शरीरों को, उनकी मौत अत्यंत दुःखद हो, मैं भी भेजूँगा जानवरों को जिनके दाँत उनके शरीरों पर गड़ेंगे और साँपों को जिनका विष उन्हें धूल चटाएगा - बिना तलवार के उनके दिलों में आतंक भर दो, नष्ट कर दो जवाँ मर्दों को, कुमारियों को, माँ का दूध पीते नन्हे बच्चों को, और वृद्धों को जिनके बाल पक चुके हों। "

क्या फ़रक पड़ता है यदि वह सिर्फ़ एक दुध-मुहाँ बच्चा हो जो माँ के स्तन से लिपटा अपनी भूख मिटा रहा हो, या फिर वह एक जर्जर बूढ़ा हो जिसका एक पैर कब्र में हो - वह हममें से एक नहीं - अतः उसका कत्ल कर डालो।

मूल तथ्य - "तुम हम में से एक नहीं हो"

हे शिक्षकों, बुद्धिजीवीयों एवं धर्मोपदेशकों! क्या आपको अभी तक उनका संदेश नहीं मिला? संदेश बहुत ही स्पष्ट है - "तुम हम में से एक नहीं हो''।

इसके बावज़ूद आप में से जाने कितने हैं जो यही कहते रहना पसन्द करते हैं कि यह धर्म भी हमें उसी ईश्वर तक पहुँचायेगा, जिस तक पहुँचाता है हमारा हिन्दू धर्म। आप क्यों इस सच्चाई को अनदेखा करते रहना चाहते हो कि ये दोनों धर्म, ईश्वर के संदर्भ में - दो अलग-अलग परिकल्पनाओं पर आधारित हैं।
एक बातें करता है उस ईश्वर की जिसका हृदय घृणा से भरा हुआ है। दूसरा बातें करता है उस ईश्वर की जिसका हृदय प्रेम से भरा हुआ है।  

भोला-भाला हिन्दू जो आप पर विश्वास करता है - उसके साथ आप ऐसा क्यों करते हो? क्या इसलिए कि आपने परख कर देखा है कि यह विधि बड़ी फलदायी है।

हिंदू - जो आप पर संदेह नहीं करता है - सोचता है कि आप बड़े महान धर्मोपदेशक हो। वह सोचता है कि आप हमें जीवन के बारे में अच्छी शिक्षाएँ देते हो - हमें प्रेम का पाठ पढ़ाते हो - हम पूरी श्रद्धा से आपका ही अनुकरण करेंगे - स्वीकार करें हमारी यह भेंट जो हम आपको अर्पण करते हैं आपके जीवन-निर्वाह के लिए एवं आपके प्रचार-प्रसार के लिए।

और उस असंदेही हिंदू का क्या होता है? वह सीखता है आपसे, इस बात पर विश्वास करना, कि सभी धर्म समान हैं, एवं सभी धर्म प्रेम करना सिखाते हैं। इस प्रकार से आप उसे बिल्कुल निहत्था कर देते हैं।

जितनी सावधानी की कम से कम आवश्यकता है, उसे भी वह ताक पर रख देता है। उधर एक चालाक लोमड़ी इस ताक में बैठी है कि कब उन्हें खा सके, और आप उन्हें सिखाते हैं कि उसका स्वागत कर दोनों हाथ फ़ैला कर, और उसे गले लगा।

आपकी सोच कितनी महान है - ईश्वर का निवास सभी जीवों के अन्दर होता है - उस लोमड़ी में भी भगवान हैं, ठीक उसी प्रकार से जैसे तुममें हैं - अतः तू उसे गले लगा।

क्या हम अपने प्रति न्याय करते हैं - जब हम अपने आपको फ़ुसलाते हैं कि हमें उन धर्मों को महिमा प्रदान करनी चाहिए क्योंकि यह हमारी अपनी महानता का द्योतक है। हमें अपने आप से पूछना चाहिए कि क्या यह हमारी महानता की ओर संकेत करता है या फिर हमारी मूर्खता की ओर?

ईश्वर ने हमें हमारे कन्धों पर एक मस्तिष्क दिया है और वह हमसे आशा करता है कि हम उसका सदुपयोग करें - अपने हितों की रक्षा के लिए। हमें इतना भोला-भाला भी न होना चाहिए कि हम देखने से इंकार करें, उस समस्या को जो हमारी नज़रों के सामने है। 

आपको इस बात की अनुभूति होनी चाहिए कि यदि आप अपनी संतानों को एक ऐसी विचार-धारा के साथ पाल कर बड़ा करें - जो एक बड़े भारी असत्य के आधार पर खड़ा हो - तो आप उनसे यह नहीं आशा कर सकते हैं कि वे बड़े होकर - अपने प्रति एवं समाज के प्रति - सत्यनिष्ठ होंगे।

जब आप उन्हें निहत्था कर देते हैं - उनकी सोच और समझ को एक बड़े असत्य से ढाँक कर - तो मूलतः आप अपने उत्तराधिकारियों के रूप में कापुरुषों एवं पाखण्डियों का एक झुंड तैयार करते हैं।

कृपया सच्चाइयों को जानें एवं अपने एवं समाज के प्रति सत्यनिष्ठ बनें। अन्यथा इतिहास आपको कभी क्षमा नहीं करेगा।

हमारे सिवा किसी को इस धरती पर जीने का अधिकार नहीं

पवित्र बाइबिल - ओल्ड टेस्टामेंट - डिउटेरॉनॉमी 20:16 एवं 20:17 "उन शहरों को जिनका तुम्हें - तुम्हारे भगवान ने उत्तराधिकारी बनाया - उन शहरों के लोगों में से किसी को भी साँस लेता न  छोड़ना - उन्हें पूर्णतया नष्ट कर देना।"

धर्म-परिवर्तन? प्रश्न ही नहीं उठता। उन्हें इस योग्य ही न छोड़ो कि वे जीने के काबिल रह जायें। ऐसा कुछ भी न छोड़ो जो साँस लेता हो। एक हमारे सिवा किसी को यह अधिकार नहीं कि वह इस धरती पर जीये। यही है सोच यहूदी धर्म की।

क्या सभी रास्ते एक ही ईश्वर तक ले जाते हैं? क्या वे सभी एक ही ईश्वर की बात कर रहे हैं? बाइबिल के ईश्वर का व्यक्तित्व इतना अलग और भगवद्गीता के ईश्वर का व्यक्तित्व इतना अलग - ऐसा क्यों?

क्या हम हिंदुओं के प्रति न्याय कर रहे हैं - उनसे यह कह कर कि अपनी आँखों पर पट्टी बाँध लो, अपने कान ढ़ाँप लो, अपने होठों को सी लो - इस प्रकार उन्हें पूरी तरह निहत्था कर दो ताकि वे आत्मरक्षा तक न कर सकें - केवल अपने अन्दर झाँकते रहें ताकि वे मोक्ष की तरफ धीरे-धीरे बढ़ते रहें।  

और यहाँ छुपा है स्थायित्व का बीज

पवित्र बाइबिल - ओल्ड टेस्टामेंट - डिउटेरॉनॉमी 12:1 "ये हैं (बाइबिल के) गॉड (ईश्वर) के विधान (कानून) जिनका तुम पालन करोगे तब तक जब तक तुम इस पृथ्वी पर जिओगे।"

यह है वह ईश्वरीय विधान जो देता है एक स्थायी रूप - इस घृणा की प्रवृत्ति को - एवं इस नष्टकारी मनोविकार को - जब तक यहूदी एवं ईसाई बसेंगे इस धरती पर - क्योंकि वे मानते हैं बाइबिल को एक पवित्र बाइबिल - चाहे कितना भी अपवित्र यह सुनने में लगता होगा आपको।

परिस्थितियाँ चाहे बदल जायें, चारों ओर का सम्पूर्ण वातावरण चाहे बदल जाये पर उनकी यह घृणा की प्रवृत्ति एवं विनाश का कार्यक्रम कभी न बदल पायेगा। और इसी बात का साक्षात्कार करेंगे, जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे इन लेखों के साथ।

तब से लेकर आज तक वे बदले नहीं मूलतः - यदि कुछ बदला है समय और वातावरण के साथ - तो वह है उनका दिखाव-बनाव। उनके इस मुखौटे को हटा कर हम दिखायेंगे आपको, क्या छुपा है उसके पीछे**। अपनी यात्रा जारी रखें मेरे साथ, यदि आप चाहें तो। मर्ज़ी है आपकी। (** पढ़ें "Christianity in a different Light")

प्रश्न उठता है - क्या उनके ईश्वर के ये विधान केवल बाइबिल के पन्नों तक ही सीमित रहे - या फिर उन्होंने इनका अक्षरशः पालन भी किया - अपने आचरणों के द्वारा - और यदि किया तो कब तक करते रहे - किनके साथ - और किस ढंग से?

ईसाइयों ने बड़े ही उत्साह के साथ पालन किया अपने ईश्वर के उन विधानों का। सदियाँ बीत गईं पर वे उन्हें भूले नहीं। उनके वीभत्स कार्यकलापों के शिकार हुए गोवा के हिन्दू ब्राह्मण। यह कार्यक्रम चलता रहा दो सौ वर्षों तक - बिना किसी व्यतिक्रम के - 1560 से 1812 ईस्वी तक। जिस मस्तिष्क से इन कार्यकलापों की उत्पत्ति हुई उस व्यक्ति को आज ईसाई एक संत के रूप में जानते हैं और एक आदर्श के रूप में मानते हैं।

"द एम्पायर ऑफ़ द सोल " में पॉल विलियम रॉबर्टस लिखते हैं - (1) माता-पिता के आँखों के सामने बच्चों को कोड़े लगाए जाते और फिर उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े किए जाते - माता-पिता के पलकों को उखाड़ दिया जाता ताकि वे अपनी आँखों को बंद न कर सकें - बच्चे छटपटाते रहते - (ईसाई न बनने के दंड स्वरूप) माता-पिता इस वीभत्स दृश्य को अपनी आँखों के सामने देखते रहने के लिए बाध्य किए जाते - बहुत ही सावधानी के साथ माता-पिता के हाथ-पाँव काटे दिये जाते ताकि वे बेहोश न हों और होश में रहते हुए यह सब कुछ देख सकें - केवल उनके पेट से लेकर सर तक का भाग बचा रहता, दोनों हाथ-पाँव कटे होते और पलकें उखाड़ ली गई होतीं (2) पुरुषों के जननेंद्रिय को निकाल लिया जाता और उनके पत्नियों के समक्ष जलाया जाता (3) स्त्रियों के स्तनों को काट दिया जाता एवं उनकी योनि में तलवार घुसेड़ दी जाती - उनके पति इस घृणित कार्य को देखते रहने के लिए बाध्य किये जाते और यह चलता रहा दो सौ वर्षों तक! लेख संदर्भ - द सेंट बिज़नेस, राजीव श्रीनिवासन, अँग्रेज़ी हिन्दू वॉइस, नवम्बर 2003

वह ईर्श्यालु ईश्वर जो किसी अन्य ईश्वर को सह नहीं पाता

पवित्र बाइबिल - ओल्ड टेस्टामेंट - एक्सोडस 34:14 "तुम किसी भी दूसरे भगवान की सेवा न करोगे क्योंकि लॉर्ड, जिसका नाम ईर्ष्यालु है, वह एक ईर्ष्यालु ग़ॉड हैं।"

पूछिए अपने आप से - कैसे ऐसा ईश्वर किसी भी व्यक्ति को सहन कर सकता है जो किसी अन्य ईश्वर का पूजक हो?

जब आप दूसरों को मूर्ख बनाते हैं तो आप उनकी क्षति करते हैं। पर जब आप अपने-आप को मूर्ख बनाते हैं तो आप अपनी ही क्षति करते हैं। आप में से कुछ यह दलील देना चाहेंगे कि दूसरों को मूर्ख बनाने से अच्छा है स्वयं मूर्ख बने रहना। मैं आपसे यह नहीं कह रहा हूँ कि आप दूसरों को मूर्ख बनायें। मैं आपसे यह कह रहा हूँ कि आप अपने आपको धोखे में न रखें।

कुछ व्यक्ति यह कहना बहुत पसंद करते हैं कि ईश्वर का ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है। इसमें मुझे कोई ऐतराज नहीं, पर पहले जमीन पर तो आइये। पहले यह तो जान लीजिए कि क्या सत्य है और क्या असत्य है। उसके बाद सोचिए उस ''सच्चे'' ज्ञान के बारे में।

साधारण सत्यों का अज्ञान हमारे लिए अभिशाप बना रहा। अतः पहले धरती पर पाँव रखकर चलिए, फिर चाहे अपने धर्मोपदेशकों के साथ सच्चे ज्ञान के आकाश में उड़िए।

आपको चाहिए एक मज़बूत जमीन जिस पर आप चल सकें, और चलते रह सकें। यदि आप ईश्वरीय आनन्द में मत्त होकर - उन सभी के बारे में अपने-आप को भुलाये रखेंगे जो आप के पीठ-पीछे छुरा भोंकने के लिए ताक लगाये बैठे हैं - तो फिर, या तो आपके पास - या फिर आपकी संतानों के पास - वह जमीन भी न होगी जिस पर आप चल सकें।

नोट - सम्भव है कि आपके मन में ये प्रश्न उठे कि "(1) हमारी धारणा तो यह है कि यहूदी तो निरीह हैं, जो नाज़ियों द्वारा सताये गये (2) वे तो शांति प्रिय हैं जब हम उनकी ओर देखते हैं जो यहूदी भारत में बसते हैं - यह सब तो मेल नहीं खाता उससे जो अब तक हमने पढ़ा ऊपर - ऐसा क्यों"? इस पुस्तक के आगामी खण्डों में इन प्रश्नों का उत्तर पायेंगे आप।

संदर्भ सूची - पुस्तकें

ISBN 0-8400-3625-4 (1996) Holy Bible, Authorized Version (UK) a.k.a King James Version (USA) (प्राधिकृत संस्करण) 

ISBN 019-565432-3 (2001) The New Oxford Dictionary of English 

कई वर्ष पहले जब यह पुस्तिका लिखी गई थी, उन दिनों यूनिकोड का प्रचलन नहीं था। इस कारण तब TTF ट्रूटाइप फ़ॉन्ट्स का प्रयोग किया गया था। अब उन अक्षरों का OTF (ओपन टाइप फ़ॉन्ट्स) यूनिकोड में रूपांतर एक सॉफ़्टवेयर द्वारा किया गया है। यह ग्यारह हज़ार की सॉफ़्टवेयर अच्छा काम करती है पर सभी सॉफ़्टवेयरों की अपनी-अपनी सीमायें होती हैं। अतः कतिपय गलतियों की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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