आतंकवाद का एक अन्य पहलू — राष्ट्र का इस्लामीकरण

परिणाम आप नहीं तो आपकी संताने भुगतेंगी

अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मानक संख्या ISBN 978-81-89746-27-8 प्रकाशित 15 नवंबर 2006

लेखक परिचय

लिखित 2005

मैं न तो किसी संगठन का सदस्य हूँ, न किसी राज नैतिक दल का, न किसी धार्मिक पंथ का। मैं किसी संस्था के बंधनों में अपने को जकड़ा हुआ पाना नहीं चाहता हूँ। न ही मुझमें कोई अभिलाषा है राजनीति के दलदल में फँसने की। मेरे लेखन में यदि कोई त्रुटि पाएँ तो समझें कि वह जान बूझकर नहीं हुआ और उसे ठीक करने के लिए आप मुझे सदा तैयार पाएँगे। हिंदी मेरी मातृभाषा नहीं है अतएव आशा है कि आप मेरी भाषा संबंधी भूलों को क्षमा करेंगे।

मैं हिंदू पैदा हुआ, मैं हिंदू हूँ और हिंदू ही रहूँगा। मेरे इष्टदेव श्री सिद्धि विनायक गणपति को मैंने प्रत्येक स्थान पर पाया चाहे वह मंदिर हो, या मस्जिद, या गिरजा। अपने पाकिस्तानी ड्राइवर मलिक के साथ मैं शारजाह के मस्जिद में गया और उसके बगल में बैठ कर अपने इष्टदेव को याद किया, जबकि उसने अपनी नमाज़ पढ़ी। तंज़ानियन-ओमानी हमूद हमदून बिन मुहम्मद के घर पर, उनके परिवार के साथ, एक ही बहुत बड़ी थाली में से, हम सभी ने एक साथ भोजन किया, उनके एक करीबी रिश्तेदार की मौत के बाद, मस्जिद से लौट कर। मुम्बई में एक कैथोलिक चर्च के मास के दौरान मैं गिरजे में मौजूद था। कैनेडा के एक प्रोटेस्टेंट चर्च में सरमन के समय मैं उपस्थित रहा। मुम्बई में यहूदियों के सिनगॉग एवं पारसियों के टेम्पल में मैं गया। कैनेडा के एक बौद्धों के मंदिर में मैंने मेडिटेशन किया।

एक हिंदू, यह नहीं सोचता, कि मेरा ईश्वर ही अकेला सच्चा ईश्वर है, और बाक़ी सभी के ईश्वर, झूठे ईश्वर हैं, जैसा कि यहूदी सोचते हैं, ईसाई सोचते हैं, मुसलमान सोचते हैं जिसका मुझे तब ज्ञान न था। मोहनदास करमचन्द (महात्मा ?) गांधी तथा उनकी देखा देखी अनेक हिन्दू धर्मगुरुओं ने जो कहा उसे मैं सत्य समझता रहा। चाहे कहीं भी मैं रहा, हिंदू भारतवर्ष या मुस्लिम मिड्ल-ईस्ट या मुस्लिम फ़ार-ईस्ट या ईसाई वेस्ट, मैंने सभी धर्मों को एक जैसा जाना, और माना। मैंने जाने कितने लोगों को नौकरी के लिए चुना पर कभी यह न सोचा कि वह हिंदू था, या मुसलमान, या ईसाई। उन दिनों मेरी सोच, धर्मों की भिन्नता की ओर न जाती, क्योंकि मैं इस संदर्भ में अनजान था। मैं जानता नहीं था कि विभिन्न धर्म वास्तव में क्या सिखाते हैं। मैं एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में जीया, जिसमें सभी धर्म समान हुआ करते थे!

अभी भी मैंने उस कड़वी सच्चाई को न जाना था, क्योंकि मैंने इस बात की आवश्यकता कभी न महसूस की थी, कि मुझे स्वयं विभिन्न धर्मों का अध्ययन करना चाहिए। मैं बड़ा सुखी था, उन ज्ञानियों पर पूर्णतया विश्वास कर, जिन्होने मुझे उस महान असत्य का पाठ पढ़ाया, कि सभी धर्म समान हैं, एवं सभी धर्म प्रेम और शांति की शिक्षा देते हैं। उन्होंने ऐसा क्यों किया? क्या वे स्वयं अज्ञानी थे, और उसी अज्ञान को, अपने अनुयायियों में बाँटते रहे थे? या फिर सत्य की प्रतीति थी उन्हें, पर किसी निहित स्वार्थ की पूर्ति हेतु, वे असत्य को सत्य का रूप देते रहे थे?

जीवन के पचास वर्ष बीत चुके थे, और तब जाकर मैं बैठा, विभिन्न धर्मों की शिक्षाओं का अध्ययन करने। मैंने पाया कि, ये शिक्षाएँ बहुत ही स्पष्ट रूप से झलकती हैं उन धर्मों के अनुयायियों की सोच, एवं आचरण में। गहराई में गया, तो मैंने जाना किस प्रकार से, प्रत्येक धर्म ने, मानव इतिहास, एवं वर्तमान की घटनाओं को रूप दिया। मैंने देखा कि धर्म, इतिहास एवं वर्तमान की घटनाओं के बीच एक गहरा, और सीधा संबंध है। संदेश बहुत ही स्पष्ट था, हम इन जानकारियों को नज़र अंदाज तो कर सकते हैं, पर अपनी ही क्षति करके। अब मैं बाँटना चाहता हूँ, अपनी इन नई जानकारियों को, केवल उनके साथ, जिन्हें परवाह हो इनकी।

मैं एक ऐसे परिवार में जन्मा था, जिसमें अध्यात्म, एवं उच्च शिक्षा का प्रचलन, अनेक पीढ़ियों से रहा था। मेरे पिता स्वर्णपदक प्राप्त इंजीनियर थे। पितामह डॉक्टर थे। प्रपितामह शिक्षाविद् एवं लेखक थे। प्रपितामह के पिता, व्यवसाय त्याग कर, अपने अंतिम जीवनकाल में, संसार में रह कर भी, एक योगी बन गए थे। सभी के अंश मुझे मिले। मातृपक्ष के पितामह एक जाने-माने शल्यचिकित्सक थे। परंपरा के अनुसार, मेरा जन्म, मातृपक्ष के पितामह के घर, बाँकुड़ा (पश्चिम बंगाल) में 25 जनवरी 1952 को हुआ था। इस प्रकार मैं एक हिंदू बंगाली परिवार में जन्मा, पला और बड़ा हुआ। एक समय था जब मैं श्री राम कृष्ण परम हंस देव का अनन्य भक्त भी रहा था।

विश्वविद्यालय की पदवी, एवं भारतवर्ष तथा विदेश से, तीन व्यवसायिक योग्यताओं को प्राप्त कर, मुझे कई देशों के निगमित क्षेत्र में, उच्च स्तर पर, व्यापक प्रशासनिक कार्यभार सँभालने का, अवसर भी मिला। इस बीच मुझे, बीस विभिन्न देशों के नागरिकों के साथ, निकट संपर्क में कार्य करने का, एवं उन्हें जानने का भी, समुचित अवसर मिला। पचीस वर्षों तक, अथक परिश्रम करने के पश्चात, अब मैंने कार्य निवृत्त होकर, एकांत वास का आश्रय लिया है।

मेरे आराध्य, श्री नारायण की दया से, मेरे जीवन की महत्वाकांक्षाएँ एवं सांसारिक आकांक्षाएँ पूर्ण हो चुकी हैं। अब मैं, अपने समय, एवं परिश्रम, के बदले में, कुछ भी नहीं चाहता। इस कारण, मैं कार्य में पूर्ण मनोयोग के साथ, एकांत ही चाहता हूँ। मेरा कार्य, केवल उन्हीं लोगों के लिए है, जो इसकी महत्ता को पहचानते हैं। मुझमें अब कोई इच्छा नहीं रही, कि मैं उन व्यक्तियों को समझाने में, अपना समय, एवं अपनी ऊर्जा नष्ट करूँ, जो मेरी बात को समझने की स्थिति तक, अभी नहीं पहुँचे। ऐसे व्यक्ति, इन लेखों की महत्ता को तभी समझेंगे जब पानी सर तक आ पहुँचेगा, एवं डूबने की संभावना उन्हें बहुत ही निकट से दिखने लगेगी। फिर भी मुझे अपना दायित्व, पूर्ण समर्पण की भावना के साथ, निभाते जाना है, एवं उस कर्म के परिणाम को, श्री नारायण को समर्पित करते हुए, आगे बढ़ते जाना है। आज यही मेरी पूजा है।

पुस्तक

तृतीय संस्करण की भूमिका

अब तक आप दिवा-स्वप्नों में खो जाना अधिक पसंद करते रहे हैं। यह एक भगोड़े की निशानी होती है। ऐसा भगोड़ा जो समय की मार को सहते-सहते निस्तेज-सा हो गया है। आज आपको एक सुभाष या विवेकानन्द की आवश्यकता है जिसकी सिंह-गर्जना को सुन कर आप अंगड़ाई लेकर उठें और उसके साथ चल पड़ें। समय आने पर उस पुरुष-सिंह का भी आविर्भाव होगा पर तब तक हम हाथ धरे बैठे तो नहीं रह सकते हैं! हमें माटी को तैयार करना होगा ताकि वह फ़सल पैदा करने के लायक बने। वह माटी जो लंबे समय से अकाल-ग्रस्त हुआ पड़ा है, उसे हल चलाकर जोतना होगा। जब बैल उसे रौंदेंगे, हल की पैनी नोंक उसके तन पर चुभेगी, तब तकलीफ तो होगी उसे। बीज बोने, और उसे सींचने, से पहले यह सब तो करना ही होगा। मैं कुछ ऐसा ही करने जा रहा हूँ। जो कुछ मैं आपसे कहूँगा उसे सुनकर आपको कष्ट तो होगा पर कैसे आप उसे झेलते हैं, स्वीकार करते हैं, इस पर आपका कुछ भविष्य तो निर्भर करेगा ही।

जब तक आप सत्य को जानते नहीं, तब तक आपको कोई दोष नहीं दे सकता। जब आप उसे जान लेते हैं तब आपका भी कुछ कर्तव्य बनता है। उस स्थिति में आप क्या कर सकते हैं यह आपके अपने साधनों पर निर्भर करता है और प्रत्येक व्यक्ति के पास कोई न कोई साधन तो अवश्य ही होता है। तब आप अपने कर्तव्य को पूरा करते हैं या फिर उससे मुँह मोड़ लेते हैं इसका निर्णय भी आपको ही करना होता है।

आपको जानने का अधिकार तो है कि यह कृति किन ग्रंथों तथा शोधों पर आधारित है। उनकी सूची यहाँ संलग्न है ताकि आवश्यकता जानें तो स्वयं उनका परीक्षण कर सकें।

परिवर्तन-परिवर्धन संसार का नियम है। द्वितीय संस्करण में कुछ सुधार किए गए तथा कुछ नई विषय-वस्तु जोड़ी गई। तृतीय संस्करण में भी कुछ सुधार किए गए हैं। इच्छा हुई कि 26-11-2008 की घटनाओं को इस संस्करण मे जोड़ूँ पर समयाभाव के कारण यह न हो सका। मैंने यह निर्णय लिया है कि अब मैं पुस्तकों का स्टॉक अपने पास नहीं रखूँगा। इससे आर्थिक बोझ भी बढ़ता है तथा उन्हें स्वयं पैक कर डाकघर ले जाना, सब लेन-देन का हिसाब रखना, इन सब में बहुत समय चला जाता है। लेखन का कार्य रुक जाता है। अतः केवल अग्रिम भुगतान के आधार पर ऑर्डर की गई मात्रा ही छपवाउँगा। अनेक ऐसे व्यक्ति हैं जो आर्थिक रूप से समृद्ध हैं पर लेखन कार्य में कुशल नहीं, ऐसे व्यक्ति यदि जनता-जनार्दन की सेवा करना चाहते हैं तो इन पुस्तिकाओं को छपवा कर वितरित कर सकते हैं। वर्तमान संस्करण की हजार प्रतियाँ ऐसे ही किसी व्यक्ति के आग्रह पर छपवायी जा रही हैं जो अपना नाम अपने तक ही सीमित रखना चाहती हैं। ईश्वर उनका भला करें।

द्वितीय संस्करण की भूमिका

उनकी कथनी नहीं, बल्कि उनकी करनी को देखो

तुम्हारे नेता, दिग्दर्शक एवं राष्ट्र की सोच को दिशा देने वाली मीडिया, चाहे तुम्हें कितना भी  समझायें कि साधारण मुसलमान की सोच वैसी नहीं जैसी आतंकवादियों की है, पर तुम तो कम से कम अपने दिमाग का प्रयोग कर सकते हो ना? कौन क्या कहता है, इस फेर में क्यों पड़ते हो, जब तुम्हारे पास जीवन्त उदाहरण हैं।

परसों की ही खबर को देख लो। 29-11-06 Times Nation का सबसे महत्वपूर्ण फोटो, पृष्ठ के सबसे ऊपर। पृष्ठ के छपे हुए हिस्से की चौड़ाई 13" है। उसमें से 8" की चौड़ाई इस फोटो को दी गई है, अर्थात लगभग दो-तिहाई हिस्सा। महत्वपूर्ण समाचार पत्रों में छपने योग्य प्रत्येक इंच की कीमत क्या होती है इसका अनुमान लगाने के लिए आपको उनके विज्ञापनों की दरें देखनी होंगी (यदि आप उन दरों को सेंटीमीटर में पढ़ते हैं तो ध्यान रखें कि उन्हें आपको अढ़ाई गुणा बढ़ा देना है इंच के संदर्भ में)।

दृष्य है कश्मीर के एक गाँव की। नाम है जबली पोरा जो स्थित है कोई 45 किलोमीटर दूरी पर श्रीनगर से दक्षिण की ओर।

उस फोटो में क्या है? अनगिनत सर - स्त्रियों के - चेहरों पर नकाब नहीं। ध्यान दीजिए कि जब स्त्रियाँ सड़क पर आती हैं हाय-तोबा मचाते हुए, तो आपको यह मान कर चलना होगा कि पुरुषों की सोच और सहानुभूति उनसे पाँच कदम आगे बढ़ कर ही होगी, उनसे अलग नहीं। इसे कहते हैं जन-मत का प्रदर्शन। तो क्या था वह जनमत जिसके प्रदर्शन हेतु स्त्रियाँ भी सड़क पर आ गईं?

उस फोटो के नीचे छपी हुईं दो लाइनें इस बात का अंदाजा कराती है आपको। लाल अक्षरों में छपा हुआ था WAILS SAY NOT ALL'S WELL अर्थात "रुदन बताता है कि सब कुशल नहीं" ! क्या वजह थी उन स्त्रियों के रुदन की? वे क्यों आ गईं थीं आज सड़क पर रोती-बिलखती? क्या उनका कोई सगा मर गया था? पर इतने अनगिनत स्त्रियों का सगा आखिर कौन हो सकता है? कोई एक आदमी मरा हो तो उसके इतने सारे सगे तो हो नहीं सकते। क्या ढेर सारे आदमी मरे, जिन सबकी बीवियाँ मातम मना रहीं थीं?

तो लाल अक्षरों के आगे छपे काले अक्षरों को पढ़ते हैं। इससे हम जान पाते हैं कि माज़रा क्या था? केवल एक ही आदमी मरा था। उसका नाम था सोहेल फ़ैज़ल। आखिर वह कौन था जिसके इतने चाहने वाले थे?

नेता तो हो नहीं सकता क्योंकि नेताओं के लिए तो आज कोई आँसू नहीं बहाता। तो क्या कोई बड़ा धार्मिक व्यक्ति था? बड़े धार्मिक व्यक्ति के निधन पर लोग शोक तो मनाते हैं पर रोते-बिलखते नहीं बल्कि चुपचाप दुखी होकर सर झुका कर चलते हैं। पर यहाँ तो स्त्रियाँ सर उठा कर रोती-बिलखती दिखीं, और उनमें से एक तो दोनों बाँहें फैलाकर मातम मनाती हुई। तब तो कोई तो बड़ा ही प्यारा, बड़ा ही आदरणीय, बड़ा ही जाना-माना व्यक्ति मरा होगा जिसकी सभी बड़ी इज़्ज़त करते होंगे अपने दिलों में। फिर भी यह रोना-बिलखना और अपने गम का इतना प्रदर्शन तो कुछ समझ में नहीं आता। शायद मरा होगा किसी ऐसी स्थिति में जिसके कारण इतना गम छाया हुआ था चारों तरफ। प्राकृतिक मौत मरा होता तो इतना सब कुछ तो पर्दे पर न आता। तो फिर मरा कैसे?

एक बार फिर उसी पंक्ति में छपे हुए काले अक्षरों पर नजर डालते हैं। तो वह आदमी था एक बड़ा सेनापति। हैरानी की बात है कि लोग आजकल सेनापतियों के लिए भी रोते-बिलखते हैं? सोच में पड़ जाता हूँ कि जब हमारे जवान, उनके अफसर, उनके सेनापति देश के दुश्मनों के साथ लड़ते हुए "कारगिल" में शहीद हुए थे तो क्या यही औरतें सड़क पर आयीं थीं रोती-बिलखती हुईं? यदि नहीं तो फिर उनकी निष्ठा किसके प्रति है? भारतवर्ष के प्रति? या फिर भारत के दुश्मनों के प्रति? हमारे नेता तो बलि दे देते हैं हमारे जवानों की, उनके अफसरों की, उनके सेनानायकों की, मुशरर्फ़ के साथ भोज का मजा लेते हुई, दोस्ती के गाने गाते हुए क्योंकि वे सभी जानते हैं कि बलि चढ़ाये गये लोग अधिकतर हिन्दू ही होते हैं। और हिन्दू के जान की तो कोई कीमत होती ही नहीं। न थी राष्ट्रपिता के नज़रों में, न थी इस नवीन-भारत-के-निर्माता की नज़रो में, और न है आज उनके नक्शे-कदम पर चलते हुए उनके अनुयायियों की नजर में। तो फिर उनके जान की कोई कीमत कैसे हो इन मुसलमानों की नजरों में, जो खाते तो नमक इस वतन का हैंं, मानते इसे अपना ही वतन हैं, पर अपना-ही का मतलब होता है उनकी नजरों में मुसलमानों का वतन, जिसे अपनी भाषा में वे कहते हैं दार-अल इस्लाम!

अब देखो कल की ही एक और खबर 30-11-06 Times Nation में। उसे एक छोटे से कोने में छापा गया है, क्योंकि वह खबर हमारे "राष्ट्र-की-सोच-को-दिशा-देने-वाली-मीडिया" की दृष्टि में एक महत्वहीन-सी खबर थी। इस मामूली-से खबर के लिए समाचार पत्र का कीमती स्थान बरबाद करना उचित न समझा था उन्होंने। तो क्या इतनी महत्वहीन खबर थी वह?

जिन दो जैश-ए-मुहम्मद आतंकवादियों को पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर सोमवार 27-11-06 को पकड़ा गया था, उनके पास से बरामद हुए पाँच लाख रुपये और दो किलो RDX आर-डी-एक्स, जो आये थे देओबन्द से। अब पूछिए देओबन्द क्या है? उनका ऊपरी आवरण है एक शिक्षण संस्था जैसा। हाल ही में किसी समचारपत्र में पढ़ा था कि यह अँग्रेज़ों के जमाने का भारत का सबसे पहला मदरसा है। मैंने पहले भी कहीं विस्तार से आपको बताया है कि मुसलमान ईसाई-अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति को विश्वास की दृष्टि से नहीं देखते थे। हिन्दू वॉइस में काफी पहले छपे तवलीन सिंह की एक रिपोर्ट में पढ़ा था एक विवरण उनकी नजरों से। एक छवि-सी उभरी थी मेरे मन में जैसे कि बड़ी धाक रही हो इनकी, अर्थात इस संस्था की भारत के मुसलमान जगत में। यदा-कदा समाचारपत्रों में छपे छोटे-मोटे खबरों में भी पढ़ लेते हैं जैसे कि इस्लाम से सम्बंधित किसी महत्वपूर्ण या उलझे हुए विषय पर देओबन्द के निर्देशों को बड़ी महत्ता दी जाती है। इन बातों का जिक्र मैं क्यों कर रहा हूँ? आपको इस बात का अंदाजा दिलाने के लिए कि जहाँ से  आतंकवादियों को रसद-पानी मिलता है उस संस्था की क्या इज़्ज़त है भारत के मुसलमानों की दुनिया में। इससे आपको एहसास होना चाहिए, विषय की गम्भीरता के बारे में। हालाँकि यह अलग बात है कि हमारे देश के सबसे बड़े समचारपत्र ने उस खबर को इतने महत्वहीन रूप से प्रस्तुत किया। ऐसा करने से किस-किस को कैसा-कैसा लाभ होता है इसका खुलासा मैं यहाँ नहीं करूँगा क्योंकि अन्य स्थानों पर मैंने आपसे इस विषय पर चर्चा की है। बाकी आप स्वयं समझदार हैं।

सोचने वाली बात यह है कि देश की सुरक्षा से संबंधित खबरों को इतनी कम अहमियत दी जाती है, उन सभी के द्वारा जो "देश को दिशा देते" हैं। इसी हफ्ते की शायद एक और खबर पर, क्या ध्यान दिया था आपने? देश के गद्दारों, राष्ट्र की सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक दुश्मनों, तथाकथित आतंकवादियों से जूझने वाले जिन्हें अपनी जान भी हथेली पर लिए घूमना होता है, उस संस्था के सरगना ने जब कुछ अधिक साधनों की माँग की तो हमारे मन को मोहने वाले मिस्टर क्लीन प्रधान मंत्री ने उन्हें फटकार सुनाई क्योंकि वह मुसलमानों के मन को मोहने के लिए बड़े चिंतित थे। उनकी धारणा थी कि इस राष्ट्र के रक्षकों के कारण इस देश के मुसलमानों को बड़ी तकलीफ़ झेलनी पड़ती है।

तो हम देखते हैं कि निष्ठाओं की भी अपनी पहचान होती है। राष्ट्र के रक्षकों को सरे-आम फटकारना और राष्ट्र के गद्दारों के लिए हमदर्दी जताना भी अपने-आप में कला है। इस खेल में एक "आज के" मनमोहन ही नहीं बल्ल्कि बड़े-2 दिग्गज भी शमिल हैं। सभी यह खेल खेलते जा रहे हैं अपने-अपने अंदाज़ में। याद आती है एक बड़े ही उदार व्यक्ति की। जब शुरू-2 में उनका नाम मीडिया पर छाने लगा था तो हर कोई उनकी स्तुति में बड़े-2 लेख लिखने बैठ जाता, या फिर उनकी कथनियों को ईमेल के द्वारा हजारों-लाखों में बाँटता फिरता। एक ऐसे ही लेख की याद आती है जिसे पढ़कर मैंने जाना था कि यह सज्जन मुसलमान होते हुए भी रोज श्रीमद्भग्वदगीता पढ़ते हैं। चारों तरफ उनके गुण-गान की हवा चल रही थी उन दिनों, जो काफी लम्बे अरसे तक चलती रही। उनकी छोटी-2 कथनियों को बड़ी महत्ता दी जाती थी, हालांकि उनकी करनी पर किसी ने कभी कोई ध्यान नहीं दिया। रोज गीता पढ़कर वह क्या सीखते हैं यह तो मैं नहीं जानाता पर जहाँ तक मुझे याद आता है,उन्होंने कभी अन्याय का विरोध नहीं किया। वह सारा अन्याय जो होता रहा है उनकी नाक के नीचे हिन्दुओं पर, इस दार-अल-हर्ब में (इस काफ़िरों के वतन में)। हाल ही में उन्होंने अपने असाधारण न्याय का एक और परिचय दिया। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने एक मुसलमान गद्दार को फाँसी की सजा दी और तारीख भी मुकर्रर कर दी। इस सजा को कोई टाल नहीं सकता था, सिवा उनके जो हर रोज गीता पढ़ते हैं। महीने भर से अधिक समय गुजर गया पर उसे आज तक फाँसी न दी जा सकी। यही नहीं बल्कि खबरों में यह बात भी कहीं से छुप-छुपा कर बाहर आ गई कि उन्होंने तुरंत बड़े आदर के साथ उस गद्दार की बीवी को चाय पर बुलाया। पर उस गद्दार से लोहा लेते हुए जिन हिन्दू जवानों ने अपने जान की कुर्बानी दी थी, उनके बीवी-बच्चों से मिलने का समय उन्हें आज तक नहीं मिला यद्यपि सालों बीत चुके हैं। आखिर मुसलमान का खून तो खुदा के बन्दे का होता है, जिसे बहने न देना हमारे देश के सभी बड़े लोगों का दायित्व है। हमारे राष्ट्रपिता ने बार-बार अनशन करके यह प्रथा कायम की थी। पर जहाँ तक काफ़िर हिन्दुओं के खून का सवाल है वह तो बहने और बहाने के लिए ही है क्योंकि वह अल्लाह का बन्दा नहीं, सो उस गन्दे खून का बह जाना जायज है।

खैर, अब लौट चलें जरा उस बड़े-से फोटो की ओर जिससे शुरू हुई थी यह कहानी। वह जिसका खून बहा था, नाम उसका एक मुसलमान का था, सोहेल फ़ैज़ल। हमने पढ़ा कि वह एक बड़ा सेनापति था। पर किस देश का सेनापति? उसी पंक्ति में छपे काले अक्षरों की ओर नज़र फेरी तो जाना कि वह सेनापति तो था, पर देश के रक्षकों की सेना का नहीं, बल्कि देश के गद्दारों की सेना का। हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन नाम है गद्दारों की उस सेना का। देश के उस गद्दार ने मरते-मरते, भारत की सेना के एक देश-भक्त अफसर को मौत के घाट उतार दिया। पर ये भारतीय मुस्लिम नारियाँ उस देशभक्त का नहीं, बल्कि उस देशद्रोही का मातम मना रहीं थीं। निष्ठाओं की परख "कथनी" से नहीं, बल्कि "करनी" से होती है। यह एक ऐसी सीख है जिसे आप गाँठ बाँध लें। जिन्दगी में कुछ कर पायें, या न पायें, पर अपनी जन्मभूमि के लिए कुछ कर गुजरें तो आपकी सन्तानें गर्व से अपना सर ऊँचा कर कह सकेंगी कि हाँ, हमारे पूर्वजों ने धरती माता की लाज रखी थी। खबरें - Times of India, Mumbai, 29-11-2006 & 30-11-2006, both p 11

यह माकड़-जाल जो बुना जा रहा है हिन्दुओं के इर्द-गिर्द 

3-12-2006 

मानवता की दुहाई देते हुए, आजकल एक तमाशा खड़ा किया गया है, उन लोगों के द्वारा जिन्हें हमारे देश का कानून राष्ट्र-द्रोह का अपराधी तो नहीं ठहराता, पर वे जो कर रहे हैं वह किसी राष्ट्रद्रोह से कम भी नही। जो लोग, और जो संस्थायें, आज अफ़ज़ल को फ़ाँसी से बचाने के लिए जी तोड़ कोशिश कर रही हैं, उनका कहना है -

•        अफ़ज़ल भारतीय मुसलमानों की नज़र में एक हीरो है। उसे फ़ाँसी दी तो मुसलमानों को संभालना मुश्किल हो जायेगा। दंगे-फ़साद शुरू हो जायेंगे। जानें जायेंगी।

आइये जरा सोचें इस बात पर। भारतीय मुसलमान इस प्रजातंत्र में रहते हैं। उस प्रजातंत्र के संसद भवन पर हमला किया/कराया अफ़ज़ल ने। एक प्रकार से देखा जाये तो उसने चुनौती दी इस राष्ट्र में प्रजातंत्र को। उसने कुठाराघात किया प्रजातंत्र के जड़ पर - वह संसद भवन जो प्रजातंत्र का प्रतीक स्वरूप है। अब यदि इस देश के मुसलमान ऐसे आदमी को अपना हीरो मानते हैं तो वे सब क्या हैं? उन सब का अपना विश्वास इस प्रजातंत्र में कितना है, उतना ही जितना अफ़ज़ल का था? क्या इसका मतलब यह नहीं कि इस्लाम उनके लिए सर्वोपरी है, राष्ट्र नहीं? अर्थात वे इस राष्ट्र को अपना राष्ट्र तभी मानेंगे जब यह एक इस्लामी राष्ट्र बन जायेगा? क्या यही कारण है कि जब भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच होता है तो पाकिस्तानी टीम के जीतने पर वे पटाके फोड़ते हैं और भारतीय टीम के जीतने पर पटाके फोड़ते हुए हिन्दुओं पर तेज़ाब की बोतलें फेंकते हैं?1 क्या उनका यह आचरण भारत के प्रति अपनी निष्ठा का अभाव नहीं दर्शाता है? क्या ऐसा नहीं लगता कि भारत में जन्मे ये मुसलमान पाकिस्तान को अपना असली वतन मानते हैं क्योंकि भारत अभी तक दार-अल-इस्लाम नहीं बना है?

1 सम्पूर्ण विवरण के लिए मेरी अन्य पुस्तकें पढ़ें

•        अफ़ज़ल के माता-पिता बूढ़े हैं, वे उसी पर निर्भरशील हैं।

सोच कर देखिये। क्या हमारे देश में ऐसे और कोई बूढ़े माता-पिता नहीं हैं जो अपने इकलौते पुत्र पर निर्भरशील हों, और वह पुत्र इस स्थिति में न हो कि अपने माता-पिता का भरण-पोषण कर सके? क्या अफ़ज़ल को स्वयं नहीं सोचना चाहिये था कि उसके माता-पिता का क्या होगा जब वह पकड़ा जायेगा या फिर पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा जायेगा? उन जवानों को जिन्हें अफ़ज़ल की वजह से अपनी जान गँवानी पड़ी क्या उनके भी बूढ़े माता-पिता नहीं थे? क्या अफ़ज़ल के हिमायतियों ने उनके बारे में कभी कोई आवाज़ उठायी? क्या वे सभी भारतीय मुसलमान अफ़ज़ल के बूढ़े माता-पिता के लिए कुछ नहीं कर सकते जो अफ़ज़ल को अपना हीरो मानते हैं, अफ़ज़ल की फ़ाँसी पर दंगे-फ़साद कर अनेक हिन्दुओं की जानें ले सकते हैं? क्या वे सभी अफ़ज़ल के बूढ़े माता-पिता के लिए कुछ नहीं कर सकते जिन्होंने अफ़ज़ल को इतना सारा धन दिया जिसकी सहायता से उसने इतना बड़ा प्लान बनाया और एक गद्दार की तरह अपने-ही देश के संसद भवन को उड़ाने की कोशिश की?

•        अफ़ज़ल के बीवी-बच्चे उस पर निर्भरशील हैं।

जिन प्रश्नों को हमने आपके सामने अफ़ज़ल के बूढ़े माता-पिता के संदर्भ में रखा है, उन्हीं प्रश्नों को अफ़ज़ल के बीवी-बच्चे के संदर्भ में रख कर भी जरा सोच कर देखिये।

•        अफ़ज़ल का बेटा डॉक्टर बनना चाहता है। अफ़ज़ल फाँसी पर लटक गया तो उसका बेटा डॉक्टर न बन पायेगा।

क्या खूब दिमाग की दौड़ लगायी है अफ़ज़ल के उन हिमायतियों ने। ये सब मिलकर, मीडिया की सहायता से, हमारे जन-मानस को भावुक बनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं। बड़े-2 नाम हैं इन हिमायतियों के और हमारे मुस्लिम राष्ट्रपति का भी आशीर्वाद है उनके साथ। और हमारे हिन्दू भाई जो अपने-आपको बड़ा दरिया-दिल मानते हैं, इस बात पर गर्व-बोध करते हैं कि हमने एक नहीं, कई-कई मुस्लिम राष्ट्रपति बनाये हैं। इस खोखली महानता का मूल्य भी हम हिन्दुओं को ही चुकाते रहना पड़ेगा।

जाने तुम क्यों यह भूल जाया करते हो कि केवल भला होना ही अपने-आप में पर्याप्त नहीं है - भले होने के पीछे ठोस प्रयोजन होना चाहिये। पर मैं तुम्हें दोष दूँ भी तो कैसे? तुम्हें दोष देना तो सबसे आसान है क्योंकि तुम उलट कर कुछ कहोगे नहीं। यही तो कारण है कि हर कोई केवल तुममें ही दोष देखता है जब वह कहता है कि दोष "हिन्दू" का है। हिन्दू को दोषी बनाने का जिम्मेदार कौन है? उसकी (वास्तव में "उनकी") ओर तो कोई उंगली उठाता नहीं, क्योंकि वे सभी अपने-आपमें "बड़े-बड़े नाम" हैं। उनकी ओर उंगली उठाओ तो उनके लाखों हिन्दू अनुयायी तुम पर टूट पड़ेंगे - "कैसे हिम्मत की तुमने उनके बारे में कहने के लिए? वे महान हैं। तुममे समझ नहीं उनकी महानता को समझने की। इसलिए तुम उन पर उंगली उठाते हो"।

हम हिन्दुओं में ये जो महान लोग हैं न, वे हिन्दुओं की आज की मानसिक नपुंसकता के लिए जिम्मेदार हैं। फिर कभी हम मिलेंगे, किसी दूसरे पुस्तक में, तो आपको बतायेंगे उन महान लोंगो के बारे में। आज नहीं क्योंकि उनकी महानता अपने-आपमें इतनी बड़ी है कि इतने छोटे-से जगह पर उनकी महानता का मूल्यांकन करना संभव न होगा। उन सब पर उंगली उठाते समय मुझे ढेर सारे उदाहरण देने होंगे, उनके अनेक अवसरों पर किये गये विभिन्न आचरणों से, एवं ढेर सारी व्याख्या के साथ। इसमें व्याख्या का स्थान बड़ा महत्वपूर्ण होगा क्योंकि सत्य का एक पहलू हमेशा धुंध के पीछे छुपा होता है। उसे देखने के लिए पैनी नज़र की जरूरत होगी, और उस नजर को शब्दों की परिधि में बाँधकर आपके सामने प्रस्तुत करने के लिए व्याख्या की आवश्यकता होगी। उस व्याख्या के बिना वे बातें आपके दिमाग पर अटक कर रह जायेंगी, आपके दिल तक न उतर पायेंगी।

हाँ तो वापस चलें अफ़ज़ल के बेटे के डॉक्टर न बन पाने वाली बात पर। अफ़ज़ल को छोड़ दिया तो कैसा डॉक्टर बनेगा वह? कहीं वैसा डॉक्टर तो नहीं जैसा बना था मुंबई के सैफ़ी अस्पताल का वह डॉक्टर तनवीर अन्सारी जिसकी कहानी हमने सुनायी है, आपको इसी पुस्तक में?

"आतंकवाद" शब्द के पीछे छुपी असलियत

क्या छुपा है इस शब्द के पीछे?

आतंकवाद वह शब्द है जो आपको याद दिलाता रहता है कि आतंकवादियों का उद्देश्य है आतंक फैलाना। क्या यह पूर्ण सत्य है? नहीं। तो फिर इस शब्द का प्रयोग क्यों किया जाता रहा है इतने व्यापक रूप से? कोई तो कारण होगा? क्या है वह कारण?

और यदि यह पूर्ण सत्य नहीं, तो पूर्ण सत्य क्या है? क्यों, अब तक उस पूर्ण सत्य को छुपाया जाता रहा है? किसके, या किन-किन के स्वार्थों की पूर्ति होती इससे? किस प्रकार के स्वार्थ थे वे? धन एवं सत्ता के लोभ तक सीमित, या फिर कहीं छुपा था राष्ट्र-द्रोह की दबी भावना इन सब के पीछे?
क्या समाधान है इसका?

इन सबका समाधान कहाँ है? जो समाधान आपकी नज़रों के सामने हैं, क्या वे स्थायी होंगे, या फिर सतही तौर पर समाधान प्रस्तुत करते हुए नज़र आयेंगे? और, जब काफी समय बीत चुका होगा ~ यहाँ तक कि पीढ़ियाँ भी बदल चुकी होंगी, आप पायेंगे कि जहाँ से चले थे ~ उसके आस-पास ही मंडरा रहे हैं हम।

समय के साथ आपकी ऊर्जा शिथिल पड़ चुकी होगी, नई पीढ़ी जिनके हाथों में तब बागडोर होगी उनकी सोच बदल चुकी होगी, पर कोई स्थायी समाधान दूर-दूर तक नज़र न आयेगा। तब यदि आप एक कोने में जाकर बैठेंगे, एवं अपने-आपसे एक प्रश्न पूछेंगे, और पूरी ईमानदारी के साथ आप, अपने-आपको उसका उत्तर देंगे, तो बस एक ही जवाब सामने आयेगा।

वह यह कि - हमने प्रयोग किये इस राष्ट्र को एक प्रयोगशाला समझ कर, हम उनमें से एक थे जिनके हाथ में बागडोर थी ~ चाहे वह रही हो सत्ता की बागडोर, या फिर राष्ट्र के दिग्दर्शकों के रूप में बुद्धिजीवियों की जमात, या फिर राष्ट्र की सोच को तोड़ने-मड़ोरने वाले मीडिया की बागडोर ~ हम सभी ने अपने-अपने भिन्न-भिन्न स्वार्थों की पूर्ति हेतु राष्ट्र के हितों की बलि दी, एवं जनसाधारण की तुष्टि हेतु प्रयोग पर प्रयोग करते रहे ~ कुछ उसी प्रकार से जैसे आज के    वैज्ञानिक अपने प्रयोगशाला में जीवित चूहों को प्रयोग का माध्यम बना कर उन पर प्रयोग करते हैं, वैसे ही जीवित जनसाधारण एवं उनकी समष्टि के रूप में राष्ट्र को माध्यम बना कर हम सभी अपने-अपने प्रयोग करते रहे। अब चूँकि हमारे दिन लद चुके हैं, अब बारी है अगली पीढ़ी की जो अपनी शिक्षा एवं उससे मिली हुई जीवन मूल्यों के आधार पर नये प्रयोग करेंगे एवं करते रहेंगे, हमारी तरह इस राष्ट्र को एवं उसमें बसने वाले लोगों को अपने प्रयोगों का माध्यम बना कर। इस प्रकार यह खेल-तमाशा चलता रहेगा, तब तक, जब तक इन तत्वों का समूल निर्मूलन न हो जाता।  

यह विषय आज इतनी जटिल बन चुकी है कि समाधान की ओर संकेत तो किया जा सकता है ~ इस और इसी प्रकार की छोटी-छोटी पुस्तिकाओं के माध्यम से ~ पर उस समाधान के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा नहीं समायी जा सकती इन थोड़े से पन्नों मे। समाधान के विभिन्न पहलुओं पर दृष्टिपात करने से पहले, समस्या के विभिन्न पहलुओं पर गम्भीरता से नजर डालनी होगी, एवं उनकी जटिलता की समझ पैदा करनी होगी। केवल उसके पश्चात समाधान पर चर्चा उचित होगी।

यह स्पष्टीकरण आवश्यक था, उन ज्ञानी-गुणी जनों के लिए जो यह मान बैठे हैं कि जो कुछ उन्हें दृष्टिगोचर होता है ~ जो कुछ वे पढ़ते, सुनते, देखते, सोचते, समझते हैं ~ वह सभी समस्या पर पर्याप्त आलोकपात करते हैं, एवं उन्हें समस्या की पर्याप्त समझ है, अतः अब यदि किसी बात की आवश्यकता है तो समाधान खोजने की, एवं उस पर अमल करने की। उनमें से कुछ के पास तो समाधान का नुस्खा तैयार भी है। खैर इनसे उलझने की कोई इच्छा नहीं है मुझमें क्योंकि यह मेरे सीमित समय का दुरुपयोग होगा।

आतंकवाद को शह दी किसने?

जिन्होंने इतिहास से कुछ न सीखा

राजनीति एवं मीडिया के, वे धुरंधर कौन थे, जिन्होंने इतिहास से कुछ न सीखा?
वे कौन थे, इतने मूर्ख, जिन्होंने एक नये इतिहास की रचना का ख्वाब देखा?

वे सभी प्रयोग

वे कौन थे, जिन्होंने "समझौता एक्सप्रेस" चलाने के नाम पर, आईएसआई एजेन्टों के लिए, हमारे देश में बेधड़क घुसने का, रास्ता खोल दिया?

वे कौन थे, जिन्होंने इसे समचार पत्रों के माध्यम से एक बहुत बड़ी उपलब्धि बता कर छापा?

बलि का बकरा

वे कौन थे, जिन्होंने इन चीजों की ओर उंगली उठाने के बजाय, केवल हमारी पुलिस को दोष देना उचित समझा - कि पुलिस सुरक्षा की व्यवस्था न कर पायी?

वे कौन थे, जिन्होंने समाचार पत्रों में पुलिस को बार-बार निकम्मा बता कर, पुलिस के मनोबल को क्षीण बनाने में, बड़ा योगदान दिया?

राष्ट्र द्रोह अपने अनोखे अंदाज में

वे कौन थे जिन्होंने यह सब करते समय यह नहीं समझा कि उनके ये कार्य किसी राष्ट्र द्रोह से कम न थे? 

वे कौन थे जिन्होंने बार-बार मुशर्रफ़ के इरादों को पहचानने से इंकार किया?

राष्ट्र की बलि क्रिकेट के नाम पर

वे कौन थे2 जिन्होंने मुशर्रफ़ को किक्रेट के बहाने दो दर्जन आईएसआई एजेन्टों को साथ लाने का अवसर दिया एवं वीज़ा समाप्त हो जाने के बाद भी उन्हें यहीं रह3 जाने दिया?

वे कौन थे4 जिन्होंने उन एजेन्टों को पनाह दी, खाना दिया, देश के महत्वपूर्ण स्थानों पर ले जा कर यह दिखाया कि कहाँ-कहाँ कब-कब वार करना उचित होगा?

2 क्या वह अटल बिहारी बाजपाई नहीं थे? माना कि कॉन्ग्रेस बीजेपी की तुलना में बहुत अधिक हिन्दू-द्रोही है पर वे लोग जो आम हिन्दू को दोष देते हैं कि हिन्दू वोट बँटा हुआ है क्या उनकी समझ में यह बात नहीं आती कि हिन्दू कैसे बीजेपी पर पूरा विश्वास कर ले जिसने हिन्दू को बार-बार धोखा दिया है चाहे वह राम मन्दिर के संदर्भ में हो या फिर हज-सबसिडी बढ़ाने के विषय में या फिर राहुल गान्धी को बचाने में जब अमरीकी सरकार ने उसे रंगे हाथों भारी रकम कैश डॉलर के साथ पकड़ा। इसी बाजपेयी ने न केवल उसे बचाया बल्कि हिन्दू से यह बात छुपाई भी और इस प्रकर कॉन्ग्रेस के हाथ मजबूत कर आज हिन्दू के लिए इतनी बड़ी समस्या खड़ी की। बाजपेयी के कारनामों की चर्चा जितनी कम ही की जाये तो अच्छा है क्योंकि आज के हिन्दू बुद्धिजीवी को सत्य से लगाव कम और सत्ता से अधिक है। उन्हें यह समझ में नहीं आता कि असत्य के आधार पर एक "स्थायी" हिन्दू राष्ट्र की स्थापना नहीं हो सकती। ऐसा राष्ट्र कभी-भी हिन्दू-द्रोहियों के हाथ में फिसल कर जा पहुँचेगा और आप देखते ही रह जायेंगे। यह याद रखें कि आधी-अधूरी ईमानदारी कभी किसी काम की नहीं होती। 3-3-2009  
3 मुशर्रफ़ के साथ वे वापस नहीं गये क्योंकि वे क्रिकेट के बजाय भारत-दर्शन के बहाने जाने कहाँ खो गए
4 क्या वे इसी भारत के नागरिक मुसलमान नहीं थे जिन्हें हम बड़े गर्व से "अपना" कहते हैं? 3-3-2009

कलम की शक्ति बिक गई पेट्रो-डॉलर के भाव में

वे कौन थे, जिन्होंने बार-बार समाचार पत्रों के माध्यम से, इस बात का खूब प्रचार किया - कि आम मुसलमान कितना सीधा-सादा है, और पुलिस (11-7-2006 के बम विस्फोट के बाद) उन्हें नाहक ही परेशान कर रही है?

वे कौन थे, जो कोई भी सुराग हाथ लगते ही, तुरंत उसे एक आम खबर बना देने की कोशिश करते, इस बात की परवाह किए बिना - कि शैतान चौकन्ने हो जायेंगे, और पुलिस का काम, और भी मुश्किल हो जायेगा?

इतिहास एक दिन गवाह बनेगा

वे सब, क्या यह नहीं समझ रहे थे, कि उनके ये करतब, किसी राष्ट्र द्रोह से कम नहीं?

जिस इतिहास से इन लोगों ने कोई सीख न ली, वही इतिहास एक दिन तय करेगा, कि असली गद्दार कौन था?

गद्दार कौन?

ये स्वार्थी राजनेता?

या, यह बिकी हुई मीडिया?

या वे, जो सरहद पार से आये, और यहाँ पनाह ली, ताकि स्थिति का अध्ययन कर एक सोची  समझी योजना के अनुसार, हिन्दुओं का कत्ले-आम कर सकें?

या फिर वे, जो रहते तो इस धरती पर हैं, नमक तो इसका खाते हैं, पर इसे इस्लामी राष्ट्र बनाने के सपने देखते हैं, और उन्हें पनाह देते हैं जो सरहद पार से आते हैं?

या वे, जो अपने बच्चों को मदरसों में भेजते हैं, ताकि उनके बच्चे बड़े होकर इस्लाम के बताये हुए राह पर चल कर, हिन्दुओं का कत्ले-आम कर सकें?

या फिर वे राजनेता, जो हिंदू मंदिरों को सरकारी कब्जे में लेकर, हिंदुओं द्वारा मंदिरों में चढ़ावे को, सरकारी खजाना बना कर, उस धन को मदरसों और गिर्जा घरों को, सरकारी दान स्वरूप दे देते हैं? (विवरण अन्य पुस्तकों में)

या फिर वे राजनेता, एवं वे मीडिया दिग्गज, जो बार-बार हिंदू पाठकों का ब्रेन-वॉश करते नहीं थकते कि आतंकवादी का कोई मज़हब नहीं होता।

क्या वास्तव में आतंकवादी का कोई मज़हब नहीं होता?

कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 123 - मुसलमानों, तुम्हारे आस-पास जो भी गैर-मुसलमान बसते हैं, हमला बोल दो उन पर, उन्हें जताओ कि तुम कितने कठोर हो।
कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 7 - अल्लाह और उनके पैगंबर मूर्ति पूजकोंं को विश्वास की दृष्टि से नहीं देखते।
कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 2-3 - अल्लाह एवं उनके पैगंबर मुक्त हैं, किसी भी दायित्व से, मूर्ति पूजकों के प्रति... उन्हें ऐसी सजा दो कि वे शोक ग्रस्त हो जायें।
कुरआन सूरा 60 अल-मुम्तहना आयत 4 - शत्रुता एवं घृणा ही रहेगी हमारे बीच तब तक जब तक तुम केवल अल्लाह के बंदे न बन जाओ।
कुरआन सूरा  8 अल-अनफ़ाल आयत 39 - तब तक उन पर हमला करते रहो जब तक मूर्ति पूजा का नामों-निशाँ न मिट जाये और सब अल्लाह के मज़हब के अधीन न हो जायें।
कुरआन सूरा  22 अल-हज़्ज़ आयत 19-22 - आग के परिधान (वस्त्र) बनाये गए हैं उनके लिए जो इस्लाम को नहीं अपनाते। उबलता हुआ पानी उनके सर पर डाला जायेगा ताकि उनकी चमड़ी भी पिघल जाए और वह सब भी पिघल जाए जो उनके पेट में है (अँतड़ियाँ भी)। उन पर कोड़े - आग में तपते हुए लाल लोहे के कोड़े - बरसाये जाएँ।
कुरआन सूरा 69 अल-हाक्का आयत 30-33 - उसे पकड़ो और उसे बाँधो। जलाओ उसको नर्ककी आग में और उसके बाद बाँधो उसे एक जंजीर से, जो हो सत्तर क्युबिट लंबा, क्योंकि उसने अल्लाह को नहीं स्वीकारा, जो हैं सबसे ऊपर।
कुरआन सूरा  2 अल-बकरा आयत 193 - तब तक उनसे लड़ते रहो, जब तक मूर्ति पूजा बिल्कुल खत्म न हो जाये और अल्लाह का मज़हब सबपर राज न करे।
कुरआन सूरा 4 अन-निसा आयत 56 - वे जो अल्लाह के आदेश को नहीं मानते हैं, हम उन्हें आग में झोंक देंगे और जब उनकी चमड़ी पिघल जाए तो हम उनकी जगह नई चमड़ियाँ डाल देंगे ताकि उन्हें स्वाद मिले यंत्रणा का। अल्लाह सबसे अधिक शक्तिमान हैं एवं विवेक पूर्ण हैं।
कुरआन सूरा  33 अल-अहज़ाब आयत 36  - जब अल्लाह एवं उसके पैगंबर ने निर्णय कर लिया है, किसी भी बात पर, तो किसी मुसलमान मर्द या औरत को यह हक नहीं, कि वह उस बारे में, कुछ भी कह सके।
कुरआन सूरा 9 अत-तौबा आयत 39 - ऐ मुसलमानों, अगर तुम युद्ध न करो तो अल्लाह तुम्हें कड़ी सजा देगा और तुम्हारी जगह पर दूसरे आदमी को लायेगा।
कुरआन सूरा  2 अल-बकरा आयत 216 - लड़ना तुम्हारी मजबूरी है, चाहे तुम कितना भी नापसंद करो इसे।
कुरआन सूरा  9 अत-तौबा आयत 73 ओ पैगंबर जो मुझमें विश्वास नहीं करते, उनसे युद्ध छेड़ो। उन पर कठोर बनो। उनका अंतिम ठिकाना नरक है, एक दुर्भाग्य पूर्ण यात्रा का अंतिम चरण।
कुरआन सूरा  66 अत-तहरीम आयत 9 - ओ पैगंबर! जो मुझमें विश्वास नहीं करते, उन पर हमला करो और उनके साथ कठोरता से पेश आओ। नर्कउनका निवास होगा, दुर्भाग्य पूर्ण उनका भाग्य होगा।
कुरआन सूरा  8 अल-अनफ़ाल आयत 12 - जो मेरे अनुयायी नहीं हैं, मैं उनके दिलों में दहशत भर दूँगा। उनके सर धड़ से अलग कर दो, उनके हाथ और पाँंव को इस कदर जखमी कर दो कि वे किसी भी काम के लायक न रह जायें।
कुरआन सूरा  48 अल-फ़त्ह आयत 29 मुहम्मद अल्लाह के पैगंबर हैं जो उनका अनुसरण करते हैं वे गैर-मुसलमानों के प्रति बेरहम होते हैं पर एक दूसरे (मुसलमानों) के प्रति दयालु होते हैं।

स्रोत - (1) कुरआन मजीद (अरबी-अंग्रेज़ी-हिंदी) मु. मा. पिक्थाल एवं मुहम्मद फ़ारुक खाँ, मक्तबा अल-हसनात (2) The Calcutta Qur'an Petition edited by Sita Ram Goel (3) कुरआन मुसलमानों को क्या सिखाता है और इसे जानना हम हिन्दुओं के लिए कितना आवश्यक है (व्याख्या तथा विश्लेषण सहित) मानोज रखित

ध्यान दें सूरा क्रमांकों पर। सूरा को अध्याय के रूप में समझें। आप यह पायेंगे कि जो संदेश आरम्भिक अध्यायों में दिये गये हैं, वही संदेश मध्य के, एवं अंत के अध्यायों में भी हैं, थोड़े से शब्दों के फेर-बदल के साथ। यहाँ तो मैंने बस थोड़े से नमूने पेश किये हैं, कुरआन उलट-पुलट कर देखेंगे तो आपको इनकी भरमार मिलेगी।
•        ऐसा क्यों? इतनी पुनरावृत्ति क्यों? ताकि कहीं से भी आप कुरआन को पढ़ने लगें - चाहे शुरू से, या मध्य से, या फिर अन्त की तरफ - आपको वही संदेश मिले। और जब एक ही बात बार-बार दोहरायी जाती है तो क्या होता है? वह बात दिमाग में बैठ जाती है - सिमेंट की तरह पक्की हो जाती है - आपकी सोच, आपकी समझ, आपके विवेक, आपकी भावनाओं, आपकी संवेदना - आपके पूरे अस्तित्व का अभिन्न अंग बन जाती है।

बचपन से सिखाया जाता है उन्हें

"जब मैं अपने मुसलमान मित्रों के घर जाता तो उनके छोटे बच्चे मुझसे पूछते - अंकल, क्या आप काफ़िर हैं?" प्रोफेसर रमेश दुदानी 19-9-2006

प्रोफेसर रमेश दुदानी ने अपना यह व्यक्तिगत अनुभव मुझे सुनाया। उन्होंने स्वयं अध्यापन के क्षेत्र में सारा जीवन बिताया, एवं अब सेवा-निवृत्त हो चुके हैं। अब आप सोचिए - इन छोटे बच्चों को भी समझ है कि काफ़िर क्या होता है। ये बच्चे जब बड़े होंगे, एवं रोज कुरआन स्वयं पढ़ेंगे, तो वे यह भी जानेंगे कि हम काफ़िरों के साथ क्या सलूक किया जाना चाहिए।

काफ़िरों के साथ क्या सलूक किया जाना चाहिए?

कुरआन 9.123, 29, 5 निश्चित रूप से सबसे खराब पशु हैं वे जो खुदा को नहीं पूजते। अरे तुम सब जो खुदा के बन्दे हो! लड़ों उन काफिरों से और उन पर अपनी कठोरता जताओ। अपमानित करो उन्हें इतना कि वे कर दें और तुम्हारी प्रशंसा करें। और जब तुम्हारे पवित्र महीना (रमज़ान का महीना) खत्म हो जाये, तो मूर्तिपूजकों का हिंसा पूर्वक कत्ल कर डालो, जहाँ भी उन्हें पाओ, और उन्हें बंदी बना लो, और चुपचाप प्रतीक्षा करो उनके लिए और हर स्थान पर घात लगाये बैठे रहो। स्रोत - A Hindu View of the World - Essays in the intellectual Kshatriya Tradition, N S Rajaram  

क्या आपने समझा कि कुरआन के अनुसार आपकी औकात क्या है? एक इंसान की नहीं बल्कि एक पशु की। वह भी महज एक पशु की नहीं बल्कि सबसे बदतर पशु की।

मुसलमानों को कुरआन केवल यही नहीं बताता है कि उन्हें मूर्तिपूजक हिंदुओं के साथ "क्या" करना है। कुरआन में इस बात का भी विधान है कि "कैसे" करना है। उदाहरण के लिए मुसलमानों को छुप कर घात लगाये बैठे रहना है, और तब हमला करना है जब हिंदू अप्रस्तुत हों, वहाँ जहाँ वह आशा न करे हमले की। आपकी याददाश्त तो शायद ताजी होगी, ज्यादा समय नहीं बीता है, 11 जुलाई 2006, ट्रेनों में बम रखे गए पहले दर्जे के डब्बों में, उस समय जिसे "पीक आवर्स" कहते हैं, जब लोग दिन भर के काम के बाद थके-हारे घर लौटने लगते हैं और ट्रेन खचा-खच भरी रहती है, तिल धरने को जगह नहीं होती।

यह भी हिदायत दी गई है कि कत्ल भी करो तो हिंसा पूर्वक। निर्जन स्थानों पर हिंदू की लाश पायी जाती है और उसका गला कटा हुआ होता है, जैसे जानवर को हलाल किया जाता है। शायद आप जानते हों कि हलाल करते वक्त एक बार में गर्दन काट कर अलग नहीं कर दी जाती है। एक ही वार में, सर धड़ से अलग कर दिया गया, तो आदमी तुरंत मर जायेगा। उसे ज्यादा तकलीफ नहीं होगी। जानवरों को जब काटते हैं तो यह विधि हराम मानी जाती है, अर्थात वह माँस अपवित्र हो जाता है। इसलिए जब मुर्गी को काटते हैं, या फिर बकरे को, तो यह जरूरी है कि उसके गर्दन को धीरे-धीरे काटा जाये, या थोड़ा सा काट कर छोड़ दिया जाये, तभी वह गोश्त हलाल होता है, पवित्र माना जाता है, और उसे खाया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिए इंटरनेट पर सर्च करें। आपको कुरआन की आयतें भी मिल जायेंगी और उन पर टिप्पणियाँ भी, जो प्रस्तुत की गई हैं इस्लाम के जाने-माने विद्वानों के द्वारा।

आपकी गौ माता का भी यही हाल होता है, बेचारी तड़प-तड़प कर मरती होगी। कुरआन के अनुसार खून का एक कतरा भी शरीर के अंदर नहीं रह जाना चाहिए। तभी यह गोश्त पाक है, अन्यथा नापाक है। इस कारण गले को धीरे-धीरे काटना होता है ताकि खून रिसता रहे और सारा खून धीरे-धीरे शरीर से निकल जाये। सारा खून धीरे-धीरे रिसते हुए निकल जाना आवश्यक है, अन्यथा वह खून भी माँस के साथ पकने के बाद हमारे पेट में जायेगा। खून का सेवन अपवित्र माना गया है अतः यह इस्लाम को यह स्वीकार्य नहीं। पशु का धीरे-धीरे मरना आवश्यक है क्योंकि यदि तुरंत मर जाये तो काफी खून शरीर के अंदर ही रह जाता है। उसे अच्छी तरह धोकर भी आप पूरी तरह गोश्त से अलग नहीं कर सकते क्योंकि एक समय के पश्चात शरीर के अंदर का बचा हुआ खून, एक जीवित शरीर के लाल ताजे खून की तरह नहीं रह जाता।

खैर, इन सब बारीकियों में जाये बिना एक बार सोच कर देखिए, एक सीधा सा प्रश्न - कितनी तकलीफ होती होगी उस मुर्गी, बकरे या गाय को जिसके गले को थोड़ा सा काट दिया जाये ताकि खून धीरे-धीरे रिसता रहे और उसे तुरंत मरने न दिया जाये। आप चाहे इसे होते हुए न देखें पर खाते तो उसी बकरे या फिर मुर्गी का गोश्त न? और जब हिन्दू के गले पर छुरी चलती है तो वह भी इसी प्रकार से। पर इन सबसे आपको क्या फ़रक पड़ता है? आप तब तक प्रतीक्षा करें जब तक आपका अपना कोई हलाल नहीं होता।

आधुनिक हिंदू

आज तो हिन्दुओं में भी लोग गाय का माँस खाने लगे हैं। संजीव कुमार शास्त्री ने मुझे बताया कि पिछले चुनावों के दौरान मध्य प्रदेश के एक शहर में (मैं नाम भूल गया हूँ) चारों तरफ चुनावी प्रचार के बैनर चिपके हुए थे "गाय हमारी माता है, अटल बिहारी खाता है"। युवावस्था में, सुनते हैं, कि वह बड़ा ही भला आदमी हुआ करता था जो अपने कपड़े खुद धोता था। पर बड़ा नेता बनने के बाद सम्भवतः उसने बड़े नेताओं के रहन-सहन भी अपना लिए। वैसे यह तो जानी-मानी बात है कि अटल बिहारी नेहरु-वादी नेता था और नेहरु के चरित्र के बारे में आशा है कि आप बड़ी खुशफ़हमियाँ अपने दिल में नहीं पालते होंगे। भाई, संगत का असर तो होता ही है, चाहे वह संगत साथ-साथ उठने-बैठने का हो, या फिर वैचारिक एवं सैद्धांतिक स्तर पर हो। अब अटल बिहारी चाहे तथाकथित हिंदू पार्टी भाजपा का नेता रहा हो, पर इतना तो अवश्य है कि वह हृदय से सच्चा हिंदू नहीं रह गया था।

वर्ण-संकर संस्कृति की उपज

यही हालत है आज के अनेक हिंदुओं की। हिंदू घरों में जन्में, ईसाई-अंग्रेज़ी शिक्षा-पद्धति में पले-बड़े, और मर्क्ससिस्ट सोच में अभ्यस्त हुए, हमारे नेता, जर्नलिस्ट एवं बुद्धिजीवी, मदिरा के साथ गौ-माँस के सेवन मे बड़ी रुचि लेने लगे हैं, क्योंकि धर्म का स्थान उनकी आधुनिक जीवन-प्रणाली में सबसे नीचे होता है, एवं गौ-माँस को वे नरम, एवं बड़ा स्वादिष्ट, पाते हैं। वैसे कहीं आप यह न पूछने लगें कि अटल बिहारी को तो ज्यादा अंग्रेज़ी बोलनी नहीं आती थी और न तो बहुत सारे नेताओं, जर्नलिस्टों, बुद्धिजीवियों को आती है, तो फिर अंग्रेज़ी शिक्षा-पद्धति को क्यों खामख्वाह यहाँ घसीट रहे हैं? देखिए, ईसाई-अंग्रेज़ी संस्कृति से प्रभावित होने के लिए अंग्रेज़ी बोलने की योग्यता का होना आवश्यक नहीं है, न ही ईसाई धर्म के बारे में कुछ जानने का। पिछले छः पीढ़ियों के दौरान हमारे आस-पास एवं चारों तरफ का वातावरण ही कुछ ऐसा बन चुका है कि यह आपकी सोच को प्रभावित करता रहता है और आपको इसका अहसास तक नहीं होता है।

बचपन से तैयार किया जाता है उनकी मानसिकता को

अब वापस चलें। हलाल के अन्य पहलुओं पर भी जरा नजर डाल लें। कुछ समय पहले मैंने अंग्रेज़ी अखबार में एक बड़ी सी फोटो देखी थी। शायद बकरीद का समय था और स्थान हैदराबाद था। राजस्थान से ऊँट मँगाया गया था हलाल के लिए। ऊँट से ज्यादा गोश्त मिलता है और ऊँट के गोश्त की डिमांड कम होने के कारण सस्ता गिरता होगा। सार्वजनिक बँटवारे के लिए यह उपयुक्त होता होगा। शायद ये कारण रहे होंगे इतनी दूर से ऊँट मँगाने का।

उस फोटो में ऊँट पड़ा हुआ था और शायद अपनी मौत की प्रतीक्षा कर रहा था। मौत जल्द आ जाये, इसकी मिन्नत भी कर रहा होगा मन ही मन खुदा से। इतना सोचने की योग्यता तो ऊँट में होती ही होगी। ऊँट के चारों ओर काफी भीड़ जमी हुई थी। लोग देख रहे थे, हलाल किए हुए उस ऊँट को, उसका खून रिसते हुए, उसे धीरे-धीरे मरते हुए। शायद वे भी सोच रहे थे कि ऊँट जल्दी मरे। पर उनका उद्देश्य अलग रहा होगा। उन्हें इस बात की प्रतीक्षा रही होगी कि कब इतना बड़ा ऊँट मरेगा और उसका गोश्त हम सबमें बँटेगा।

खैर जो भी हो, पर मेरी नजर जिस बात पर अटकी वह कुछ और ही थी। उस भीड़ में बहुत सारे बच्चे भी थे। उम्र कुछ आठ, दस, बारह वर्ष की रही होगी। बच्चे बड़ों से लम्बे कम होते हैं इसलिए वे पहली पंक्ति में थे और उन्हें सारा नज़ारा काफी अच्छी तरह से दिख रहा था। मुझे लगा कि उन्हें अच्छी ट्रेनिंग मिल रही है। बचपन से ही उन्हें आदत पड़ती जा रही है। प्रत्येक वर्ष जानवरों को इस प्रकार तड़पते हुए देखने को मिलता है उन्हें। उनका "जिगर" मजबूत होता जा रहा है। खून का खौफ़ उन्हें नहीं रहेगा। मदरसों से कुरआन की अच्छी तालीम पाकर, किशोरावस्था तक पहुँचते, वे अपने आपको पूरी तरह से तैयार पायेंगे। तब अगर काफिरों का हलाल करना हो तो वे न हिचकिचायेंगे।

किसी निर्जन स्थान पर एक हिन्दू का मृत अवस्था में पाया जाना, उसका गला इसी ढंग से कटा हुआ होना, यदि आम बात नहीं तो दुर्लभ बात भी नहीं। उस हलाल की प्रक्रिया का वीडियो टेप का सऊदी अरब भेजा जाना और नियत रकम पारितोषिक के रूप में मिलना, मेरी कल्पना की उपज नहीं है। जो इसे करते हैं, वे केवल इसलिए नहीं करते हैं कि उन्हें इससे धन मिलता है। धन तो बाद में आता है और मेहनताना नहीं बल्कि पारितोषिक के रूप में। यदि पकड़े गये तो वह धन काम आयेगा, अपनी पैरवी के लिए और अपने परिवार के लिए भी। अव्वल तो वे इसलिए करते हैं कि वे इस प्रकार से अपने अल्लाह की मदद कर रहे हैं, और साथ ही साथ अपने लिए जन्नत की सीट बुक करवा रहे हैं, और जन्नत की हूरों के झुण्ड पर अपना दावा कायम कर रहे हैं।

अब सवाल आपके मन में उठेगा कि ऐसी खबरें आप तक पहुँचती क्यों नहीं, कहीं ये मनगढंत बातें तो नहीं हैं? हमारी मीडिया की एक बड़ी विशेषता है। गुजरात की बात को लेकर बरसों बीत गये पर आज भी हर महीने कम से कम तीन-चार बार गुजरात के दंगों की बात को उछाला जाता है, जबकि गोधरा (जहाँ हिन्दू जिन्दा जलाये गए) का कहीं कोई जिक्र तक नहीं होता। बाबरी ढाँचे को बाबरी मस्जिद का नाम देकर 1992 की घटना को आज भी समय-समय पर उछाला जाता है पर पाकिस्तान, बांग्लादेश में कितने वास्तविक मंदिर तोड़े गये, 1992 के पहले एवं बाद में, उनका कोई जिक्र तक नहीं होता। हमारी मीडिया के चरित्र को कुछ अच्छी तरह समझना चाहें तो मेरी अन्य पुस्तकें पढ़ें। 

एक और सुझाव। हिंदू वॉइस मासिक पत्रिका कभी-कभी समय निकाल कर पढ़ लिया कीजिए। कम से कम ये खबरें आपसे पूरी तरह छुपी तो न रहेंगी। अंग्रेज़ी अखबार और उनके प्रांतीय भाषाओं के संस्करण और मार्क्ससिस्ट-कॉम्यूनिस्ट बुद्धिजीवियों के चंगुल में फँसी मीडिया तो आप तक ये खबरें पहुँचाने से रही। वे तो भगवान को मानते नहीं, अतएव उनका भगवान तो पैसा और यौन-लिप्सा होती है। पेट्रो-डॉलर और राजनीतिक अनुग्रह उन्हें हिंदुओं का नहीं बल्कि मुसलमानों का प्रवक्ता बनाती है। अतः उनसे अधिक आशा मत रखिए।

माना कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता

16 अप्रैल 2006 की बात है। चर्चगेट जाते समय मुम्बई के चर्नी रोड स्टेशन पर मैं एक दिन उतरा तो मुझे एक भव्य इमारत दिखी। वह कुछ सफेद रंग की सी थी और इतनी लम्बी थी कि प्लैटफॉर्म के एक सिरे से दूसरे सिरे तक चलता गया पर जैसे वह इमारत खत्म ही न हो। मैं अचम्भे में था क्योंकि 1979 में उसी स्टेशन पर मैं रोज उतरता था, पर उन दिनों ऐसी किसी इमारत का वहाँ नामों-निशा तक न हुआ करता था।

तीन-चार महीने और बीते। हिन्दूजा अस्पताल में मेरी भेंट एक 35-40 वर्षीय व्यक्ति से हुई जिनकी दाढ़ी बता रही थी कि वह मुसलमान हैं, अन्यथा उनकी सफारी देखकर मुझे इस बात का अंदाजा ही न होता। उस समय हम दोनों के पास एक ही काम था, इंतजार करना अनिश्चित समय तक। सो थोड़े वक्त की दोस्ती सी हो गई। बातों ही बातों में बहुत कुछ जानने को भी मिला। वह उर्दू का प्रयोग कम एवं परिष्कृत हिंदी का अधिक कर रहे थे।

उनसे मैने जाना कि चर्नी रोड की वह भव्य इमारत "सैफी अस्पताल" है। उनके गुरु का अस्पताल। यद्यपि वहाँ सारी सुविधायें मौजूद हैं पर उनके गुरु ने यह निर्देश दिया था कि ऑपरेशन हिंदूजा में ही कराई जाये। इस प्रकार मुझे उनसे मिलने का अवसर मिला।

उनसे मैने यह जाना कि उनके सैफ़ी पंथ का मकसद इंसानियत है और इस बात पर उनके गुरु बहुत जोर देते हैं। बहुत सारी बातें हुईं जिससे  मुझे ऐसा लगा जैसे कि यह पंथ, और इसके गुरु की शिक्षा, आम इस्लाम से कुछ हट कर है। कुछ ऐसा लगा कि इसमें मानवता और प्रेम को बड़ा ही महत्व दिया जाता है।

इससे मुझे उत्सुकता हुई जानने की कि उनका धर्म ग्रन्थ क्या है। पूछने पर जाना कि उनका धर्मग्रंथ कुरआन ही है। तब मुझे यह जानने की भी उत्सुकता हुई कि क्या वह कुरआन रोज पढ़ते होंगे? यह प्रश्न मेरे मन में उठा क्योंकि मैं सोच रहा था कि ऐसा व्यक्ति जिसके मन में मानवता के प्रति इतना प्रेम है, वह शायद कुरआन पढ़ता नहीं होगा, जैसे अधिकांशतः हिन्दुओं ने गीता पढ़ी ही नहीं है। पर यहाँ भी मेरे लिए एक आश्चर्य प्रतीक्षा कर रहा था। उन्होंने मुझे बताया कि वह कुरआन रोज पढ़ते हैं। तो मेरे मन में एक प्रश्न और उठा - यदि उनके गुरु सदा मानवता और प्रेम की शिक्षा देते हैं तो उनकी शिक्षाओं का आधार कुरआन तो नहीं हो सकता। इसलिए पूछ बैठा कि क्या आपके गुरु अपनी शिक्षा कुरआन के आधार पर ही देते हैं? यहाँ भी एक आश्चर्य - उन्होंने बताया कि उनके गुरु शिक्षायें कुरआन से ही देते हैं।

तब मैंने उनकी एक छोटी सी परीक्षा लेनी चाही। मैने उनसे काफ़िर शब्द का अर्थ पूछा। उन्होंने मुझे बताया कि काफ़िर वह होता है जो ईश्वर में विश्वास नहीं करता। यह सुना तो मुझे कुछ ऐसा लगा जैसे काफ़िर नास्तिक को कहते हैं। तो अगला प्रश्न मेरे मन था कि यदि "मैं" नास्तिक नहीं हूँ तो मैं काफ़िर नहीं। मैंने उन्हें बताया कि मैं तो ईश्वर में विश्वास करता हूँ, तो मैं काफ़िर नहीं हो सकता। फिर धीरे से मैने उन्हें बताया कि मैं तो मूर्ति-पूजक हूँ, तो फिर मेरे लिए क्या विधान है कुरआन में? अब उनके ललाट पर हल्का सा पसीना नजर आया मुझे।

हमारी बातें बड़ी ही शांति से, सौहार्द पूर्ण वातावरण में, भाई-चारा एवं अदब के साथ, दोस्ताना ढंग से चल रही थी। मुझमें इस्लाम के बारे में जानने की उत्कंठा देख वह अब तक मुझे बड़े प्रेम से सभी कुछ बता रहे थे। तो मैने भी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि मुझ मूर्ति-पूजक के लिए तो मृत्युदंड का विधान है कुरआन में।

यह बड़ी संकटमय घड़ी थी और इसके पहले कि वह जवाब दे पाते, अचानक किसी ने मुझे बुलाया जिसके लिए मुझे पीछे मुड़ना पड़ा। मुश्किल से दो मिनट बात करने के बाद मैं अपने नये मित्र की ओर मुड़ा जो मेरे प्रश्न का समाधान करने वाले थे। पर वह कहीं दिखाई नहीं दिए। मैंने हर तरफ नजर डाली पर वे न दिखे।

लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान क्यों होता है?

14 जुलाई 2006 समय 18:10:43 मेरे मोबाइल पर एक एसेमेस आया "हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होता है?" सुरेन्द्र विष्ट

एक माह के पश्चात मैंने खबर पढ़ी एक आदरणीय डाक्टर साहब के बारे में

"मोमिनपुरा के लोग उन्हें "आदर से डाक्टर साहब" कहते हैं। "सैफी अस्पताल" में उनके साथी एवं उनके मरीज़ उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखते हैं जो मरीज़ों को चंगा कर देने की योग्यता रखते हैं, और जिन पर विश्वास किया जा सकता है। उनका नाम है डॉ तनवीर अन्सारी और उनकी उम्र है 32 वर्ष। यह व्यक्ति हैं एक ऐसे जेहादी जो शान्त दिमाग से कत्लेआम करने की योग्यता रखते हैं। वे "आतंकवादी रासायनिक हमलों" में बड़ी द्क्षता रखते हैं। लश्कर-ए-तय्येबा ने उनकी इस योग्यता का पूरा उपयोग नहीं किया, इस बात पर वह काफी नाराज़ हैं। वे नाराज़ हैं, पाकिस्तान में लश्कर के नेताओं से, जिन्होंने मुम्बई में आतंकवादी हमलों का संचालन किया - कारण उन्हें 11 जुलाई के बम विस्फोटों की योजना में अपने "रासायनिक हमलों" के द्वारा "आतंक फैलाने" एवं "मुम्बई के विनाश" में भूमिका निभाने का मौका नहीं दिया गया। उन्हें इस बात का भी दुःख है कि जब वे सन 2004 में पाकिस्तान के बहवलपुर में "रासायनिक युद्ध के प्रशिक्षण" के लिए गए तो उन्हें उच्चस्तरीय प्रशिक्षण नहीं दिया गया, जिसके लिए लश्कर के कुछ सक्रिय कर्मीयों को ही चुना गया।" विवरण - Hindustan Times 16-8-2006 p5

एक महीना और बीता कि मनमोहन ने सब का मन मोह लिया

इन सब के बावज़ूद अभी मनमोहन सिंह ने क्यूबा में जाकर मुशर्रफ से पुनः बड़ा प्रेमालाप किया और दोनों ने मिलकर कहा कि अब भारत और पाकिस्तान दोनों मिलकर आतंकवाद के विरुद्ध लड़ेंगे। इसे "हवाना स्टेटमेंट" कहा गया और मीडिया दिग्गजों ने बढ़ चढ़ कर इसका स्वागत किया। वह कहावत "सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली चली हज को" शायद मनमोहन ने कभी सुनी नहीं, अन्यथा वे जानते कि मुशर्रफ के लिए यह कहावत कितनी सठीक बैठती है। मनमोहन के पूर्वज अटल बिहारी हाजपाई ने कारगिल के बाद बस चलाई, मुशर्रफ को आगरा घुमाया और दोस्ती के अफसाने गाये, इस आस में कि नोबेल प्राइज़ (शांति दूत) मिल जाये, पर अंगूर खट्‌टे निकले। अब सभी के मन को मोहने वाले सिंह की नज़र कहाँ अटकी है, यह आप सोचें।

"हम लोग इस कोशिश में हैं कि पाकिस्तान के साथ दोस्ताना संपर्क बनाये रखें, इसके वावज़ूद कि वे भारत के विरुद्ध आतंकवादी हमलों में सहायता दे रहे हैं" सिंह (*प्रधान मंत्री ने कहा कॉन्ग्रेस के एक अधिवेशन (तिरुवन्नथापुरम) में, केरल के प्रादेशिक कॉन्ग्रेस कमिटी के मुख्यालय में, बुधवार को।" विवरण - Indiatimes, Times Of India, 1 Nov 2006, 1617 hrs IST, PTI

तब एक और खबर आयी

"लश्कर-ए-तय्येबा का शाब्दिक अर्थ है "निष्पाप पवित्र" लोगों की सेना। इसके पश्चिमी-भारत ईकाई के प्रमुख हैं फ़ैज़ल शेख। वे काम कर रहे थे, आज़म चीमा के निर्देशों के अनुसार। आज़म है लश्कर-ए-तय्येबा (भारत) के कमांडर। वह रहते हैं बहवलपुर "पाकिस्तान" में। विस्फोटों में प्रयोग किया गया आरडीएक्स भारत में लाया गया था एक "पाकिस्तानी टीम" के द्वारा मई 2006 में एवं बमों को तैयार किया गया था फ़ैज़ल की निगरानी में। पुलिस कमिश्नर ए एन रॉय ने कहा कि लश्कर-ए-तय्येबा एवं सिमी द्वारा इन विस्फोटों को मूर्त रूप दिया गया था।" विवरण - Hindustan Times 23-9-06 p3

क्या मनमोहन सिंह को ये बातें मालूम नहीं कि पाकिस्तान की क्या भूमिका रही है बम विस्फोटों के द्वारा हिंदुओं काकत्ले आम करवाने में? या फिर वह भी, हाजपाई की तरह, एक नये इतिहास की रचना करना चाहते हैं, इतिहास पढ़े बिना, और यदि पढ़ा है तो उसे समझे बिना। 

साथ ही खुलासा आया "डाक्टर साहब" के झूठ की 

"बैंगलोर के फोरेन्सिक साइन्सेस लैबोरटोरी में परीक्षण (नारकोऐनालिसिस भी) के पश्चात यूनानी "डॉक्टर तनवीर अन्सारी" ने अपना सारा जुर्म कबूल कर लिया।" विवरण - Hindustan Times 23-9-06 p 3

हाँ तो यही डॉ तनवीर अंसारी हैं जो "सैफी अस्पताल" में काम करते थे; (मोमिनपुरा के मुसलमान) मरीज़ों और सहकर्मियों में उनकी बड़ी साख थी, उन्हें बड़े इज़्ज़त की नज़रों से देखा जाता था। उन्हें पनाह भी मिली तो कहाँ, उसी "सैफी अस्पताल" में जिसके बारे में आपने थोड़ी ही देर पहले पढ़ा, मेरे कुछ समय के मित्र से, जिनसे मैं मिला था हिन्दुजा अस्पताल में।5

5  यह वही "सैफी अस्पताल" है जिसके गुरु कुरआन से मानवता और प्रेम की शिक्षा देते नहीं थकते। यह वही डॉ तनवीर अंसारी हैं जिन्हें बड़ा ही दुःख था कि उन्हें 11 जुलाई के बम विस्फोटों की योजना में अपने "रासायनिक हमलों" के द्वारा "आतंक फैलाने" एवं "मुम्बई के विनाश" में भूमिका निभाने का मौका नहीं दिया गया। और यह वही हिन्दुस्तान टाइम्स है जिसके किसी जर्नलिस्ट ने पँाच सप्ताह पहले डॉ तनवीर अंसारी के बारे में अपने सुन्दर रिपोर्ट के द्वारा पाठकों की सहानुभूति अर्जित करने की चेष्टा की थी इस आस से कि सच्चाई कभी सामने ही न आये। पर अंत में उसी तनवीर अन्सारी ने अपना सारा जुर्म कबूल कर ही लिया।

ये सारी छोटी-छोटी अलग-अलग बातें जिन्हें आप भी पढते हैं और मैं भी। फ़रक केवल इतना है कि आप उन अलग-अलग कड़ियों को जोड़ कर पूरी माला नहीं बना पाते और ये सारी कड़ियाँ अपने-आपमें कोई खास महत्व

की नहीं दिखती। बचपन में वह खेल तो आप सबने खेला ही होगा जिसे कहते हैं jigsaw puzzle (चित्र आदि के बेतरतीब कटे हुए टुकड़े जिन्हें जोड़कर पूरी तस्वीर बनानी होती है)। जब तक वे टुकड़े अलग-अलग रहते हैं तो अपने-आपमें कोई मायने नहीं रखते। जब उन्हें अपनी-अपनी सही जगहों पर बिठा दिया जाता है तो पूरी तस्वीर नजरों के सामने उभर आती है।

बचपन में आपने वह खेल बड़े चाव से खेला होगा पर अब नहीं खेलेंगे। अब तो वह आपको समय का दुरुपयोग लगेगा या फिर बचकाना बात लगेगी। कारण जानते हैं? बच्चे थे तो आपमें कौतुहल था, अब वह मिट चुका है। बचपना था तो चुनौती का अहसास भी था - तस्वीर को पूरा करने की चुनौती पर अब वह भी मिट चुका है। बच्चे थे तो आपमें अपनी जानकारी का दंभ भी नहीं था जो अब है। तब आप सबकुछ नहीं जानते थे और अब आप सबकुछ जानते हैं। आपने ढेरों किताबें पढ़ रखीं हैं। रोज अखबार पढ़ते हैं। न्यूज़ सुनते हैं या फिर देखते हैं। दोस्तों के साथ विचार-विमर्श करते हैं। महान-आत्मा से आप कितना-कुछ सीख भी चुके हैं - जैसे कि "बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो" या फिर "ईश्वर-अल्लाह तेरे नाम, सबको सन्मति दे भगवान"। खैर, वापस चलें। 1-1-2008

 इन्सानियत के मायने कुछ और ही हैं उनकी नज़रों में

वहाँ इन्सानियत की बडी-बडी बातें हुआ करती हैं। उनकी नजरों में उस इन्सानियत की परिभाषा कुछ और ही है। इन्सानियत के मायने उनके लिए वही नहीं है जो हम हिंदुओं के लिए है। उनके लिए इन्सानियत केवल खुदा के बन्दों मुसलमानों के लिए है, मूर्ति पूजक हिन्दू पशुओं के लिए नहीं (कुरआन 9.123,29,5)।

उनकी नज़रों में इन्सानियत है "वह कर्म" जो इस धरती से गैर-मुसलमानों का सफाया करता है। अतः जब ऐसे फ़रिश्तों को कानून सजा देने की कोशिश करता है तो उसके भाई-बन्द, उसके रिश्तेदार, उसे मुजरिम नहीं मानते।

इसीलिए तो अफ़ज़ल की बात राष्ट्रपति तक पहुँची

इन दिनों कितनी हाय-तोबा मची हुई है। अफजल के भाई-बन्दों में बड़ों-बड़ों का नाम है। उदाहरण के लिए द टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स, ईसाई माँ की संतान अरुन्धती रॉय, कॉम्युनिस्ट-मार्क्ससिस्ट मेधा पाटकर और जाने ऐसे कितने "मेधावी" लोग जो सम्भवतः यह चाहते हैं कि ये सभी आतंकवादी फले-फूलें ताकि वे हिंदुओं का सफाया करते रहें। उन सब की नज़रों में हिंदू होना ज्यादा बड़ा पाप है, हिंदू का कत्ल किया जाना छोटा पाप है। इन सभी ने अपने-अपने ढंग से अफजल के लिए दया की याचना की है। और राष्ट्रपति, जो स्वयं एक मुसलमान हैं, उन्होंने तुरंत रोक लगा दी, फाँसी अभी नहीं होगी, 20 अक्टूबर को। सर्वोच्च न्यायालय ने कम से कम एक ढंग का निर्णय तो दिया पर उसमें भी टाँग अड़ाने वाले पैदा हो ही गये। जब तक बात अधर में लटकी रहेगी तब तक उसके हमदर्द कोई हवाई जहाज हाइजैक कर लेंगे और तब अफ़जल को छोड़ देना कितना आसान हो जायेगा।

यह बिकी हुई "सिक्युलर" मीडिया और ये बिके हुए "सिक्युलर" बुद्धिजीवी

मीडिया की बडी पहुँच होती है जन-मानस को दिशा देने में। ये बड़े प्रभावी होते हैं जनता की सोच को तोड़ने-मड़ोरने में। आज ही के अखबार को लीजिए। एक दर्द भरी दास्तान सुनाई कि अफ़ज़ल के बेटे ने खुद को फ़ाँसी लगाने की कोशिश की। फोटो वगैरह भी छपे और पृष्ठ का काफी सारा स्थान इस कहानी को दिया गया ताकि पाठकों की नजर न चूके, वे पढ़ें और उनके मन में करुणा का संचार हो। पर जो हिंदू जवान शहीद हो गए इन आतंकवादियों के साथ लड़ते हुए, उनके बच्चों की कोई फोटो नहीं, उनके दुःख की कोई कहानी नहीं। हो भी तो कैसे? समाचार पत्र के उस बहुमूल्य स्थान की कीमत अदा करना तो शहीद हुए हिंदू जवानों के बच्चों के लिए तो सम्भव नहीं। हाँ, आतंकवादियों के प्रति हमदर्दी पैदा करने की कीमत तो अरब देशों से हवाला के जरिए हरदम आता ही रहता है। इसके लिए कीमत माँगने की आवश्यकता उन्हें नहीं होती, बल्कि कीमत देने वाला स्वयं चलकर उनके पास आ जाता है।

मुम्बई से अंग्रेज़ी में प्रकाशित हिंदुस्तान टाइम्स आज "कॉन्ग्रेस, कॉम्युनिस्ट्स एवं मुस्लिमों का मुखपत्र" बना हुआ है और यह आठ आने में मिलती है। घर आकर वे कूपन दे जाते हैं 350 रुपये दो वर्षों के लिए। 730 दिनों के 350 रूपये आठ आने से भी कम। पन्नों की संख्या देखिए तो जानेंगे, जो आप उन्हें समाचार पत्र की कीमत के रूप में देते हैं, महीने के बाद रद्दी के भाव बेच उससे अधिक वापस पा जाते हैं। उनके हमदर्द कहेंगे पैसा विज्ञापनों से आता है। यदि यही पूरा सत्य है तो उन्हे किसी की जी-हूजूरी करने की क्या जरुरत है? वे निष्पक्ष होकर केवल सत्य का साथ क्यों नहीं देते?

इन बड़े-बड़े अंग्रेज़ी अखबारों को वे सभी पढ़ते हैं जिनके हाथों में कोई न कोई बागडोर होती है। चाहे वह बागडोर सत्ता की हो (जैसे जनता के तथाकथित चुने हुए राजनेता), या फिर सरकारी प्रशासन की हो (जैसे आइ-ए-एस इत्यादि), अथवा न्यायाधिकरण की हो (जैसे न्यायाधीश इत्यादि), या फिर शिक्षा की हो, या फिर किसी भी महत्वपूर्ण क्षेत्र में नियंत्रण की क्षमता रखते हों ~ इन सभी की सोच एवं सहानुभूति को प्रभावित करने की क्षमता रखती है हमारी मीडिया।

इनकी चालें अनोखी हुआ करती हैं

एक दिन मैं एयरपोर्ट पर किसी की प्रतीक्षा कर रहा था तो बड़े से टीवी स्क्रीन पर मेरी नज़र पड़ी। बड़ा हो हल्ला हो रहा था। समाचार देने वाला बड़े आवेश में गर्मा-गर्म खबर दे रहा था। लोग बड़ा विरोध कर रहे थे। कुछ देर सुनने पर मुझे अहसास हुआ कि यह सब किसी सिनेमा के बारे में था। टीवी के पर्दे पर काले कोट वाले वकील आ जा रहे थे। बड़ी गहमा-गहमी थी। जो लोग बोल रहे थे वे सब किसी विशेष तबके के लग रहे थे, जैसे कि तथाकथित बुद्धिजीवी हों या फिर कुछ पहुँचे हुए लोग हों। आम जनता किसी बात का विरोध करती हुई नहीं दिखाई दे रही थी। मैं अधिक देर तक टीवी के पर्दे पर ध्यान नहीं टिका सकता था क्योंकि मुझे उनका भी ध्यान रखना था जिनके लिए मैं एयरपोर्ट आया था। हाँ, इतना जरूर है कि एक नाम बार-बार टीवी स्क्रीन पर सुनाई दे रहा था "ब्लैक फ़्राइडे"।

जो कुछ भी गड़बड़ी वहाँ चल रही थी उन सब ने मेरे दिमाग पर बस एक ही छाप छोड़ी - इस सिनेमा पर रोक लगा दी जाये क्योंकि यह न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। अर्थात यह सिनेमा न्यायाधीशों की सोच को बदल सकती है। परिणाम यह हुआ कि उस सिनेमा पर रोक लगा दी गई। हाल ही में मैंने एक खबर और पढ़ी। वह थी "ब्लैक फ्राइडे" बनाने वाले की दुविधा। आज भी वह नहीं जानता है कि उसकी पिक्चर दिखाई जा सकेगी या उसे डब्बे में ही बंद रखना पड़ेगा। उसकी दुविधा का कारण यह था कि अब तो उन कातिलों का जुर्म साबित हो चुका है और उनमें से अनेकों को सजा सुनाई जा चुकी है। इसके बावज़ूद आज स्थिति यह है कि उन्हें ऐसा लगता है कि उन कातिलों के कारनामें अदालत की चारदीवारी में ही छुप कर रह जायेगी और उन्हें जनता के सामने कभी न लाया जा सकेगा।

"ब्लैक फ्राइडे" में क्या था यह तो मैं नहीं जानता। उसमें ऐसा कुछ रहा होगा जिस पर परदा डाले रखना आवश्यक जान पड़ा होगा उन्हें जो उस षड़यंत्र में शामिल थे। उनके पास पर्याप्त साधन रहे होंगे, न केवल उस षड़यंत्र को कार्यान्वित करने के लिए, बल्कि मीडिया एवं वकीलों की जमात को अपने खेमे में शामिल कर लेने के लिए भी। उनके द्वारा रचे गये इस हंगामे के नाटक के प्रभाव में आकर न्यायपालिका ने "ब्लैक फ्राइडे" को डब्बों में बंद करवा दिया। उन्हें यह न सूझा कि एक सहज सा प्रश्न करते इन तमाशबीनों से - ऐ हंगामा करने वालों! तब कहाँ थी तुम्हारी यह बुलन्द आवाज जब तुम्हारे इन्हीं भाई-बंदों ने गुजरात पर सिनेमा बनाई थी और तब भी तुम यही बहाना देकर उन्हें रुकवा सकते थे कि यह न्याय की प्रक्रिया को प्रभावित करेगी? तब ऐसा करने के बजाय तुमने उन सिनेमाओं को खूब प्रसिद्धि दी, उन्हें पारितोषिक दिए, उनका बड़ा गुन-गान किया। पर आज तुम न्याय माँगने आये हो, वह भी ऐसा जो केवल तुम्हारे उद्देश्यों में सहायक हो। क्यों अपनाते हो ऐसी दोगली नीति, बेईमानों वाली?  

क्या आपने इस विरोधाभास पर ध्यान दिया है?

क्या आपने इस बात पर गौर किया है? जब घाटकोपर बम विस्फोट के अपराधियों को सजा न दी गई तब हमारी विश्वस्त मीडिया ने उन अपराधियों को सजा दिलवाने लिए जनमत तैयार करने की कोई चेष्टा नहीं की और सारे मामले को दबा दिया यह आरोप लगाकर कि पुलिस निकम्मी है जो पर्याप्त सबूत न जुटा पायी। और जब संसद भवन पर आक्रमण के अपराधी को सजा दी गई तो हमारी वही विश्वस्त मीडिया इस बात की जी तोड़ कोशिश में लगी है कि उसकी सजा कम कर दी जाये। फाँसी लगने के पहले ही हमारी विश्वस्त मीडिया उस अफ़ज़ल को मुसलमानों की नज़रों में एक शहीद बनाये दे रही है।

क्या यह एक अपने ढंग का राष्ट्र द्रोह नहीं?

यह अफजल कौन है? यह वह व्यक्ति है जिसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मृत्युदण्ड की सजा सुनाई है। उसे 20 अक्टूबर को फाँसी की सजा दी जाने वाली है। उसका दोष क्या था? भारतवर्ष के संसद भवन पर आक्रमण। क्या वह व्यक्ति राष्ट्रद्रोही नहीं है? क्या वे सभी, जो उसे किसी न किसी प्रकार से बचाना चाहते हैं सजा दिलाने से, क्या वे सभी अलग-अलग रूपों में राष्ट्र द्रोह के अपराधी नहीं हैं?

उनकी नज़रों में यह राष्ट्र द्रोह नहीं है - पर क्यों?

एक मुसलमान के लिए भारतवर्ष मुसलमानों की जागीर है और जब तक इसे मुस्लिम राष्ट्र घोषित नहीं कर दिया जाता तब तक उनकी लड़ाई चलती रहेगी क्योंकि वे लड़ रहे हैं अल्लाह के लिए। उनकी नजरों में यह एक पुण्य का काम है।

वे न केवल अल्लाह की सहायता कर रहे हैं, बल्कि अपनी भी सहायता कर रहे हैं, जन्नत (स्वर्ग) में अपनी सीट बुक करवाने में। लश्कर-ए-तयेबा का शाब्दिक अर्थ भी तो है निष्पाप पवित्र लोगों की सेना!

11 जुलाई 2006 - सीरीयल बम विस्फोट - मुम्बई - निष्पाप पवित्र लोगों की सेना के द्वारा

"संगठन लश्कर-ए-तयेबा - शब्दिक अर्थ, निष्पाप पवित्र लोगों की सेना। मुख्यालय पाकिस्तान।" स्रोत - Hindustan Times 24-9-2006 p1

आइये इन निष्पाप पवित्र लोगों की सेना के कुछ कारनामें देखें और उन्हें समझे। इस "निष्पाप पवित्र" शब्द को व्यंग के रूप में न देखें। वे जो अपने आपको "निष्पाप पवित्र" समझते हैं, वे इस शब्द को बड़ी गम्भीरता से लेते हैं। इसमें उनका कोई दोष नहीं क्योंकि कुरआन उन्हें यही सिखाता है। उनके लिए कुरआन खुदा की आवाज़ है। आप चाहे वेदों को ईश्वर की वाणी समझें या न समझें, मुसलमान कुरआन को अल्लाह का पैगाम मानते हैं। ईसाई-अंग्रेज़ी शिक्षा-पद्धति ने चाहे आपके दिमाग को चाट कर, आपको हिंदू कम, और तथाकथित आधुनिक ज्यादा बना दिया हो, पर आम मुसलमान ने कभी ईसाई-दीमकों को विश्वास के योग्य नहीं माना, और उन्हें अपना दिमाग चाटने का मौका नहीं दिया। चाहे आप नाम के लिए हिंदू रह गये हों, और अपने-आपको जन-समुदाय के समक्ष हिंदू कहने में गौरव-बोध न करते हों, पर वे अब भी मुसलमान हैं, और उन्हें इस बात का फ़क्र भी है। 

"प्रोफ़ेसर आज़म चीमा उर्फ़ बाबा - प्रोफेसर एवं लश्कर-ए-तय्येबा के सेनापति। निवास पाकिस्तान। कार्य भार (1) फैज़लाबाद में इस्लाम के प्रोफ़ेसर (2) बहवलपुर में निष्पाप पवित्र लोगों की सेना के प्रशिक्षक।" विवरण Times Of India 9-10-2006 p3 

इस भुलावे में न रहिए कि ये आतंकवादी केवल भाड़े के टट्टू होते हैं - मिलिए प्रोफ़ेसर साहब से जो उन निष्पाप पवित्र लोंगों के सरगना हैं

तो मिलिए प्रोफ़ेसर साहब से जो उन निष्पाप पवित्र लोंगों के सरगना हैं। इस भुलावे में न रहिए कि ये आतंकवादी केवल भाड़े के टट्टू होते हैं, जो पैसों के लिए कत्ल भी कर सकते हैं।

एक समय था जब सिक्यूलर बुद्धिजीवी एवं सिक्यूलर मीडिया ने इस बात को काफी उछाला था, ताकि आप धोखे में रहें। पर जब से अमरीका को लात पड़ी है, बिन लादेन की, तब से अमरीकी मीडिया ने इन आतंकवादियों को बड़ा बदनाम कर रखा है। इसलिए आज आपके सिक्यूलर बुद्धिजीवी, एवं सिक्यूलर मीडिया आपसे यह नहीं कह पाती है कि आतंकवादी केवल भाड़े के टट्टू हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि आज यदि वे वही बात कहना चाहेंगे, तो आप यह ताड़ जायेंगे कि वे आतंकवादी नहीं, बल्कि वे सिक्यूलर बुद्धिजीवी एवं सिक्यूलर मीडिया वाले स्वयं भाड़े के टट्टू थे जो पेट्रो-डॉलर के बदले में, झूठ का प्रचार कर आपको धोखे में रखा करते थे।  

आज की लड़ाई कई मोर्चों पर लड़ी जाती है जिसे समझना आपके लिए बहुत जरूरी है

वे आपको यों धोखे में क्यों रखा करते थे? इससे उन्हें क्या हासिल होता जिन्होंने आपके इन विश्वस्त सिक्यूलर बुद्धिजीवी एवं सिक्यूलर मीडिया को खरीद कर इस झूठ का प्रचार करवाया? आज की लड़ाई कई मोर्चों पर लड़ी जाती है। कुछ मोर्चे ऐसे होते हैं जो दिखते हैं। कुछ मोर्चे ऐसे होते हैं जो नजर में नहीं आते पर उनका प्रभाव बड़ा दूरगामी होता है। उनमें से एक मोर्चा वह है जो मानसिक स्तर पर लड़ा जाता है। इसके द्वारा जन-मानस को प्रभावित किया जाता है।

इसके भी दो पहलू होते हैं। एक वह जिसका उद्देश्य होता है नेतृत्व की सोच को प्रभावित करना। दूसरा वह जिसका उद्देश्य होता है आम जनता की सोच को प्रभावित करना।

नेतृत्व से तात्पर्य यहाँ केवल राजनीतिक नेताओं तक ही सीमित नहीं है। इनमें वे सभी शामिल हैं जो राष्ट्र को, एवं जन साधारण को, किसी न किसी क्षेत्र में, दिशा दे सकते हैं, अथवा प्रभावित कर सकते हैं।

नेतृत्व में भी दो वर्ग होते हैं। एक - जो आसानी से बिकाऊ नहीं होता है। दूसरा वर्ग वह है जो बिकाऊ होता है, और यह हर जगह होता है, आज अमरीका में भी और इंग्लैण्ड, जापान में भी। अतः केवल अपने नेतृत्व को दोष देकर अपने मन की भड़ास न निकालें। समस्या को  समझने की चेष्टा करें, तभी उसका हल नजर आयेगा। 

जो बिकाऊ होता है, उसके सामने हड्डियाँ फेंक कर, उसे खरीद लिया जाता है, और उससे प्रचार करवाया जाता है। इन्हें चुना जाता है सावधानी से, यह ध्यान में रख कर कि उनकी समाज में कैसी साख है, लोग उन पर विश्वास करेंगे या नहीं। ऐसे लोग महंगे तो आते हैं, पर उनसे कराया गया प्रचार प्रभावी भी होता है।

इस प्रचार के लक्ष्य को समझें

इस प्रचार का लक्ष्य, नेतृत्व का वह वर्ग होता है, जिसे आसानी से खरीदा तो नहीं जा सकता, पर जिसकी नजर इतनी पैनी नहीं होती कि गहराई में जाकर दूध का दूध और पानी का पानी अलग करने की क्षमता रखता हो।

जब नेतृत्व के इस वर्ग, एवं जन-साधारण को, यह एहसास दिलाया जाता है, कि ये आतंकवादी केवल भाड़े के कातिल हैं, और उनका कोई मज़हब नहीं होता है, तो लोग उन्हें उतनी गम्भीरता से नहीं लेते हैं, जितनी गम्भीरता से उन्हें लेना चाहिए।

इसे एक दूसरे ढंग से सोच कर देखिए। रोज आप अखबारों में चोरी, डाके, कत्ल, इत्यादि की खबरें पढ़ते हैं। जब आप पढ़ते हैं कि उन चीजों का मकसद धन या आपसी वैमनस्य या पारिवारिक झगड़े हैं, तो उन्हें आप खबरों के रूप में या फिर मनोरंजन की दृष्टि से पढ़ लेते हैं, दोस्तों के साथ गप-शप में उनका जिक्र कर देते हैं, और बात यों ही आयी-गयी हो जाती है।

यही मानसिकता कि लोग ऐसी बातों को बहुत ज्यादा गम्भीरता से नहीं लेते हैं - इसी मानसिकता का लाभ उठाकर, ऐसे ही बिके हुए मार्क्ससिस्ट इतिहासज्ञों की एक जमात ने, यह परिकल्पना लोगों के मन में भर दी थी, कि मुसलमान आये भारत में, यहाँ के अपार धन को लूटने के लिए। अब चूँकि वह धन हमारा-आपका नहीं था, हम-आप उनके इन हमलों को उतनी गम्भीरता से नहीं लेते।

और यही सोच हमारे मनो-मस्तिष्क पर छा जाये - इस दृष्टि से उन इतिहासज्ञों ने इस बात को बार बार दोहराया, ताकि बच्चे जब तक पढ़-लिख कर बड़े हों, तब तक इस बात पर पूरी तरह से विश्वास करने लगें।

अब जरा गौर से सोचकर देखिए कि कितनी दूर की कौड़ी उठा लाये थे वे

अब सोचिए, अगर इन्हीं बच्चों ने बचपन से "सच्चाई" को जाना होता कि मुसलमान आये थे, धन लूटा था, पर उनका पहला मकसद हिंदुओं का कत्ले-आम करना था, काफिरों को मुसलमान बनाना था, हिंदू लड़कियों और औरतों को अपने हरम में भरना था, और उन हिंदू कन्याओं से जो बच्चे पैदा होते वे मुसलमान ही कहलाते, और इस प्रकार भारत की इस धरती को मुसलमानों का वतन बना डालते - तो क्या हमारे हिंदू बच्चे बड़े होकर इतने लापरवाह बनते, अपने धर्म की रक्षा करने के मामले में, जैसा कि आज हम उन्हें पाते हैं?

इसी प्रकार से यदि आपको "सच्चाई" का भान होता कि इस्लाम ने उन्हें किस ढाँचे में ढाला है, और उनकी प्रेरणा का स्रोत वास्तव में क्या है, और उससे भी "कड़वी सच्चाई" कि उनका एक-मात्र मकसद आप सभी को अल्लाह का बंदा बनाना है, तो आप इस मामले को इतनी कम गम्भीरता से नहीं लेते, जिसके आप आदी बन चुके थे, या फिर यों कहिये कि "आदी बना दिये गये थे, झूठे प्रचार का सहारा लेकर"।

अब इसके एक दूसरे अहं पहलू पर ध्यान दीजिए

इसे एक दूसरे ढंग से सोचें। अमरीका में बसे हुए हिंदुओं को देखिए। वे अपने आपको ईसाइयों से घिरा हुआ पाते हैं तो उन्हें बुरा नहीं लगता। वे अपने आपको मुट्ठी भर पाते हैं तो भी उन्हें बुरा नहीं लगता। पर जब वे अपने बच्चों को ईसाई बन जाते हुए देखते हैं तो उन्हें बड़ा झटका लगता है। पर क्यों?

धर्म मनुष्य का अपना सबसे गहरा (अंतरंग) एवं सबसे व्यक्तिगत मामला होता है। धर्म उसे मिलता है तभी जब वह पैदा होता है। बाकी चीजें तो यहाँ की होती हैं जिन्हें वह एक-एक करके बटोरता है। जब दूसरे व्यक्ति का धर्म बदलता है, तो उसे तकलीफ़ नहीं होती, पर जब उसकी अपनी संतान, अपना धर्म बदलता है तो उसे चोट अवश्य ही लगती है। उससे भी अधिक तिलमिलाहट उसे तब होती है जब उसे मजबूरी में अपना धर्म त्यागना पड़ता है। वह अपना ऐसा कुछ खो देता है जो उसका अंतरंग, बहुत ही अपना, पूर्णतया व्यक्तिगत हो, वह सम्पत्ति जो ईश्वर-प्रदत्त है (ईश्वर की दी हुई)।

अब यदि यह सच्चाई आपसे छुपाई न गई होती, तो भी क्या आप इन सारी बातों को इतनी कम गंभीरता से लेते?

इसी प्रकार यदि हिंदू यह सच्चाई जानता कि हर मुसलमान का एक सपना यह होता है कि जिस धरती पर वह जीता है, कम से कम वह धरती तो दार-अल-इस्लाम (मुसलमानों का वतन) हो। यह एक सपना उसे अपने धर्म से मिलता है। यह सपना उसे कुरआन देता है। यह सपना उसका अपना नहीं, बल्कि उसके अल्लाह की माँग है।

वह आपके आस-पास रहेगा। वह आपका दोस्त होगा। वह आपकी हर जरूरत पर मदद भी करेगा। कारण - आज वह दार-अल-हर्ब (काफिरों का वतन) में जो रहता। वह अपना सपना कभी आपको नहीं बतायेगा। आप उसके उस सपने को तभी जान पायेंगे जब वह इस स्थिति में पहुँच जायेगा कि वह अपने उस सपने को अंजाम दे सके6

6 जब-जब वह ऐसी नाकाम कोशिश करेगा तो आपके नेता, मीडिया एवं शिक्षक उसे हिंदू-मुस्लिम दंगे का नाम दे देंगे। आप इस नाम के कुछ इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि इसमें आपको कुछ सर-फिरे लोगों की हिंसा और राजनीतिक नेताओं की चाल के सिवा कुछ भी और नजर नहीं आयेगा। यह प्रवृत्ति आपको समस्या की जड़ तक कभी पहुँचने नहीं देगी। फिर एक दिन ऐसा भी आयेगा जब उनकी वह कोशिश नाकाम न होगी, बल्कि सफल होकर रहेगी। तब आपके सोचने समझने के लिए कुछ और न बचेगा। कारण तब यह धरती भी दार-अल-इस्लाम (मुसलमानों का वतन) बन चुकी होगी। 1-1-2008

यह जो आतंकवादी कहलाता है, वह देखने में....

"रहील अब्दुल शेख रहील - लश्कर-ए-तय्येबा के सेनापति।" ~ "फ़ैज़ल शेख उर्फ़ आबू अमीन - लश्कर-ए-तय्येबा के पश्चिम भारत प्रभाग के सेनापति। 11 जुलाई 2006 मुम्बई बम विस्फोट की योजना का सूत्रधार एवं संचालक। निवास मुम्बई। वेश-भूषा - एक आधुनिक "आम" शहरी नौजवान की, हजामत किया हुआ दाढ़ी सफाचट, जीन और टीशर्ट पहनने वाला, रे-बैन के चश्में पहनने वाला, काँधों तक लम्बे बाल रखनेवाला, पल्सर मोटर्बाइक चलाने वाला और महंगी ब्रांड के सिगरेट पीने वाला।"  विवरण - Times Of India 9-10-2006 p3

यह जो आतंकवादी कहलाता है, वह देखने में, हमारे-आपके जैसा भी होता है। उसकी पहचान इतनी आसान नहीं, क्योंकि वह आप-हम में से कोई एक भी हो सकता है। भेड़ के वेश में भेड़िया वाली कहावत का अर्थ समझने के लिए आपको बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं होगी।

"फ़ैजल शेख (बांद्रा का निवासी उम्र 31), उसका भाई मुजम्मिल शेख (कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर इंजिनियर उम्र 22) गिरफ़्तार, फ़ैजल के पास पाये गए 15,000 सऊदी रियाल जो उसे भेजे गए थे आजम चीमा के द्वारा पाकिस्तान से।" Hindustan Times 21-9-06 p5
"एहतेशाम सिद्दिकी - पहली बार गिरफतार किया गया जब वह रायगढ़ में मेकैनिकल इंजिनियरिंग का छात्र हुआ करता था। उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ का निवासी। सिमी (स्टुडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया) का सदस्य। उर्दू दैनिक का उप-संपादक एवं सिमी सदस्य दानिश रियाज के साथ सैफ मंजिल मुम्बई में रहने लगा। रियाज़ गिरफ्तार किया गया, फिर एहतेशाम भी। एहतेशाम फैज़ल से मिला था जब पहले फ़ैज़ल मीरा रोड में रहता था। मीरा रोड स्टेशन पर ट्रेन बम विस्फोट का संदिग्ध अपराधी एहतेशाम।" विवरण Times Of India 8-10-06 Times City

यह आवश्यक नहीं कि आतंकवादी कोई अलग प्रकार का जीव होता है। वह आपके बेटे या फिर बेटी के दोस्तों में से भी एक हो सकता है। आपके बच्चों की तरह इंजिनियर या डाक्टर बनता हुआ दिख सकता है। हमारे सिक्यूलर बुद्धिजीवी और हमारी सिक्यूलर मीडिया, जिनके हृदय में आजकल "अफ़ज़ल" के प्रति इतना प्रेम-भाव उमड़ रहा है, वे भी तो इसी बात की दुहाई दे रहे हैं न, कि अफ़जल भी एक अच्छा डॉक्टर बन सकता था, या बन सकता है, यदि उसके साथ नरमी बरती जाये।

माना कि यह मुश्किल अवश्य है एक हिंदू के लिए इसे समझना, पर आज नहीं समझेंगे तो कल इसकी कीमत चुकायेंगे

एक बात स्पष्ट रूप से समझने की कोशिश कीजिए, यद्यपि मानता हूँ कि एक हिंदू के लिए इस बात को समझना बहुत ही मुश्किल है। पर यदि आज आप समझने की चेष्टा नहीं करेंगे तो उसकी कीमत भी कल आपको ही चुकानी पड़ेगी।

वह बात यह है कि एक मुसलमान के लिए दोनों चीजें एक साथ संभव है जो एक हिंदू के लिए असंभव है। एक मुसलमान एक अच्छा डॉक्टर हो सकता है, एक अच्छा इंजिनियर हो सकता है, एक अच्छा वैज्ञानिक हो सकता है, एक अच्छा फ़िल्मी कलाकार हो सकता है, एक अच्छा इंसान हो सकता है। और, साथ ही, इस्लाम की हर माँग को पूरा करने वाला भी हो सकता है।

इस्लाम की माँग है यह ~ कुरआन के अल्लाह का आदेश है यह ~ कि इस धरती को काफ़िर-विहीन बना दो, काफ़िरों का नामों-निशाँ मिटा दो, हर काफ़िऱ को अल्लाह का बंदा (मुसलमान) बना दो। इसके लिए तुम्हें छुप कर इंतजार करना पड़े, उस घड़ी का जब तुम उन पर अचानक हमला बोल सको, तो यह भी जायज है। हर जरिया जायज है, छुप कर इंतजार करना, पीछे से वार करना, धोखे से मार डालना, कुछ भी नाजायज नहीं है, कुछ भी गलत नहीं है, क्योंकि यह सब तुम कर रहे हो, अल्ल्लाह की खातिर 7

7 पढ़ें कुरआन अपने अनुयायियों को क्या सिखाता है

हिंदू इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता कि दूसरों को हिंदू बनाने के लिए सब कुछ मान्य है, कत्ल भी करना, धोखा भी देना, पर-स्त्री को लूट का माल समझना, इत्यादि। जबकि मुसलमान के लिए यह सब मान्य है क्योंकि यह सब अल्लाह का आदेश है और कुरआन में दर्ज है। उससे भी बड़ी बात, मुसलमान के लिए यह सब मान्य है क्योंकि पैगम्बर मुहम्मद ने यह सब किया और उसका व्योरा हदीस में दर्ज है। मुसलमान के लिए कुरआन अल्लाह की आवाज़ है तो पैगम्बर अल्लाह का जीता-जागता नमूना, और इस लिए जो कुछ पैगम्बर ने किया वह अल्लाह का किया हुआ माना जाता है।

आप मे से कुछ बहस करने में बड़े माहिर होते हैं

आप मे से कुछ ऐसे भी होते हैं जो बहस करने में बड़े माहिर होते हैं। सो आप कहेंगे कि यह जरूरी नहीं कि हर मुसलमान कुरआन में दर्ज अल्लाह के आदेशों में विश्वास करे, और हदीस में दर्ज पैगम्बर मुहम्मद के द्वारा किए गये कामों का आदर करे। ठीक है, परख कर देख लीजिए। जिन-जिन मुसलमानों पर आपका इतना भरोसा है, उनसे कहें कि वे खुले-आम यह बयान दे कि वे मुसलमान हैं और कुरआन में दर्ज अल्लाह के आदेश में विश्वास नहीं करते हैं, और हदीस में दर्ज पैगम्बर मुहम्मद के किए गये कामों को गलत मानते हैं। आपको स्वयं जवाब मिल जायेगा। प्रश्न यह है कि क्या आपमें हिम्मत है यह पूछने की? या फिर आप हमसे ही बहस करने में अपनी बहादुरी मानते हैं?

"अज़रुल इस्लाम उर्फ़ मुन्ना - रहील अब्दुल शेख रहील का गहरा विश्वस्त व्यक्ति 26 वर्षीय अज़रुल इस्लाम। भारत-बाग्लादेश के सीमारेखा के दोनों तरफ जिसकी सहज गति है। फोन एवं इमेल के संदेश पहुँचाता संदिग्ध व्यक्तियों को। आवश्ययकता पड़ने पर देश के बहुत गभीर स्थलों में भी जाता अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए। मुम्बई सिरीयल बम विस्फोट, मालेगाँव बम विस्फोट एवं औरंगाबाद में पकड़े गये अस्त्रों के मामले संदिग्ध अपराधी। रहील के साये की तरह रहने वाला, बहुत ही साधन-सम्पन्न, एवं अत्यन्त पैने दिमाग वाला (सम्भवतः रहील से भी एक कदम आगे)। लश्कर का सदस्य, ड्राइवर पेशे से, अपने माता-पिता के साथ रहता था नारयलवाड़ी मज़गाँव में, रहील के साथ बांग्लादेश को भागा मई 2006, उसके पहले इस्लाम गया था शेख के साथ मालेगाँव में, जहाँ रहील शेख मिला था "सिमी" के लोगों से उन्हें जरूरी हिदायतें देने के लिए। औरंगाबाद में 9 मई को जो अस्त्र-शस्त्र एवं विस्फोटक पदार्थ पकड़े गए बहुत बड़ी मात्रा में, उस मामले में भी इस्लाम उलझा हुआ था। जब पुलिस ने रहील शेख के ग्रांट रोड वाले घर पर छापा मारा तो वह दो मंजिल से कूद कर भागा था और इस चक्कर में उसने अपनी टाँग तोड़ डाली थी, जिसके लिए इस्लाम ने उसकी चिकित्सा की व्यवस्था करवायी, उसे छुपा कर बांग्लादेश पहुँचाया और वहाँ उसके रहने का बंदोवस्त कराया। इस्लाम ने उसके भांडुप में छुपने का इंतजाम किया, बांद्रा के निवासी फ़ैजल शेख से पंद्रह हजार रुपयों का इंतजाम किया, रहील के टूटे टाँग की प्लास्टरिंग के लिए। वहाँ से वे दोनों मालेगाँव गए, फिर उत्तर प्रदेश, और उसके बाद बांग्लादेश जहाँ उसने अपने ससुराल में रहील के पनाह की व्यवस्था की।" विवरण - Hindustan Times 20-9-06 p2

तो यहाँ आप देखते हैं कि ये गद्दार शादी मनाते हैं दूसरे इस्लामी राष्ट्रों में जाकर, फिर हमारे देश में आकर गद्दारों की फ़ौज बढ़ाते हैं, ढेरों बच्चे पैदा कर।

"बम विस्फोटों में सक्रिय रूप से भाग लेने वालों की शिनाख्त की गई है इन नामों से - फ़यक, ज़क्ज़ी, ज़ंब्रुद्दीन, बशीर, फ़ज़ल, अकलक, बसुभाई। ये असीरगढ़ (म प्र) होते हुए बाँग्लादेश अथवा पाकिस्तान में भाग गए हैं। असीरगढ़ का सिद्दिकी दक्षिण मुम्बई के तेमकर मुहल्ले में रहा करता था। उसने इन सातों के रहने, खाने, भागने एवं बम विस्फोटों के लिए योजना बनाने में मदद की थी। तेमकर मुहल्ला दाऊद इब्राहिम का गढ़ है जिसने 1993 में सीरीयल बम विस्फोटों की योजना बनाई थी।" विवरण - Hindustan Times 24-9-2006 p 1

मेरा मानना है कि सभी मुसलमान भारत को अपना ही वतन मानते हैं और कोई भी मुसलमान अपने इस वतन के साथ गद्दारी नहीं करता — पूछिए कैसे?

आप में से अधिकांश मानते होंगे कि सभी मुसलमान इस देश को अपना मानते हैं, केवल थोड़े से गद्दार हैं। मैं मानता हूँ कि सभी मुसलमान इस देश को अपना मानते हैं और कोई भी इस देश के साथ गद्दारी नहीं करता। बड़ा अजीब लगता है न? ठीक है, मैं आपको समझाता हूँ, पर अपने ढंग से। इसमें एक ऐसी चीज छुपी हुई है जिसे समझना आपके लिए बहुत जरूरी है।

आप सिद्दिकी का मामला ही लीजिये। आप कहेंगे वह उन गिने-चुने गद्दारों में से एक था जिसने आतंकवादियों को आश्रय दिया, खिलाया-पिलाया, उन्हें सारे ठिकाने बताये ताकि वे बम विस्फोट की योजना को अंजाम दे सकें।

अब इसी बात को सिद्दिकी नजर से देखें। उसकी नजर में यह देश भारतवर्ष उसका अपना देश है और उसे इसमें कोई संदेह नहीं है। केवल एक परेशानी है। उसके चारों ओर काफ़िर ही काफ़िर बसते हैं, और यह उसके अल्लाह को मंजूर नहीं। जो उसके अल्लाह को मंजूर नहीं, वह सिद्दिकी को कैसे मंजूर हो सकता है? उसे अल्लाह का सपना जो पूरा करना है। इसे दार-अल-इस्लाम (मुसलमानों का वतन) जो बनाना है।

यह उसका जन्मसिद्ध अधिकार है। जिस धरती पर वह पैदा हुआ, वह धरती उसकी अपनी है। वह न तो उस धरती के साथ गद्दारी कर सकता है, न अल्लाह के साथ। उसे आज अल्लाह ने वह काम सौंपा है जो उसे अल्लाह की खातिर करना है।

वह खुद तो इन काफ़िरों का नामो-निशाँ मिटा सकता नहीं, तो वह क्या करे। आज अल्लाह ने उसे एक मौका दिया है, और उसके पास ऐसे लोगों को भेजा है जो ढेर सारे काफ़िरों का कत्ले-आम कर सकते हैं।

उसे केवल इतना करना है कि वह उन्हें पनाह दे, पुलिस एवं दूसरों की नजर से छुपा कर रखे, उनके खाने-पीने का बन्दोबस्त करे ताकि वे सातों अल्लाह के काम में तन-मन से लगे रहें, और उन्हें वह सारी खबरें देता रहे जिनकी उनको आवश्यकता हो इस कत्ले-आम को अंजाम देने के लिए, और जब कत्ले-आम हो चुके तो उनके भागने का बन्दोबस्त करे ताकि वे फिर आकर नया कत्ले-आम कर सकें, अल्लाह ने चाहा तो उसी सिद्दिकी की एक बार फिर से मदद लेकर, या फिर किसी नये सिद्दिकी के यहाँ पनाह लेकर। जो भी होगा अल्लाह ही उसका बन्दोबस्त कर देगा, उसे तो बस अल्लाह की मर्जी पूरी करनी है, जो वह रोज कुरआन पढ़ कर सीखता है।

मेरे भाइयों, इस बात को अच्छी तरह समझ लो। मुसलमान जो यहाँ पैदा हुए हैं, जो इस धरती का नमक खाकर पले-बढ़े हैं, उन्हें इस धरती को अपना ही बनाये रखना है। वे तुम हो, ऐ काफ़िरों, जो उनके इस वतन को उनका नहीं रहने दे रहे हो। वे जब भी अपनी नज़रें उठा कर देखते हैं, तो इस सर-जमीं पर, बस तुम ही तुम, काफ़िरों को चहुँ-ओर फैला पाते हैं। इस धरती से तुम्हारा सफ़ाया कर, वे केवल अपनी वतन-परस्ती का सबूत दे रहे हैं। जो वतन उनका अपना है, वहाँ, तुम काफ़िरों का क्या काम? तुम काफ़िर सब इतने बद-जात हो, कि बस उनके इस वतन में, चारों ओर फैले हुए हो। तुम्हें उनके इस वतन में, जहाँ वे पैदा हुए हैं, वहाँ काफ़िर बन कर रहने, और जीने, का कोई हक नहीं।

"कश्मीर से अब्दुल अहद और घानी मुहम्मद ~ जो कुछ ही समय पहले तक मुम्बई में सिक्योरिटि गार्ड के रूप में काम करते थे ~ 11 जुलाई के बम विस्फोटों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गये हैं। अब्दुल हमीद भी कुछ ही समय पहले तक मुम्बई में सिक्योरिटि गार्ड के रूप में काम करते थे ~ तीन हफ्ते पहले कश्मीर से गिरफ्तार किए गये ~ जहाँ उसका सम्पर्क रहा था लश्कर-ए-तय्येबा के कमांडर रहील अब्दुल शेख रहील के साथ।" विवरण Hindustan Times 27-8-06 p5
"शब्बीर अहमद मुशिउल्लाह और नफ़ीज़ अहमद जमीर अहमद अन्सारी ~ ये दो लश्कर-ए-तय्येबा लड़ाकू ~ 11 जुलाई बम विस्फोट के सिलसिले में गिरफ्तार किये गए।" विवरण - Hindustan Times 14-8-2006 p1

यह खेल खत्म नहीं हुआ अभी

"तौफ़ीक अकमल हाशमी, माहिम विस्फोट का संदिग्ध अपराधी, अल-बदर का डिविज़िनल कमांडर" Times Of India 16-10-2006 p3
"संगठन-शक्ति के अनुसार, लश्कर-ए-तयेबा, जैस-ए-मोहम्मद, हिज़बुल मुजाहिदीन के बाद, अल-बदर का नाम चौथे स्थान पर आता है। अल-बदर 1971 से कश्मीर में कार्यरत रही है। अल-बदर के फ़हाद उर्फ़ नेदुथान्नि उर्फ़ मोहम्मद कोया (उम्र 24) और मोहम्मद अली हुसैन उर्फ़ जहांगीर उर्फ़ अफ़गान उर्फ़ आसिफ़ खान उर्फ़ ज़ेहारी उर्फ़ कासिम (उम्र 24) पकड़े गये, जो बैंगलोर के विधान-सोउधा एवं विकास-सोउधा जैसे महत्वपूर्ण केन्द्रों को बम से उड़ा देने की तैयारी में थे। वे दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण स्थानों का भी सर्वेक्षण कर रहे थे इस उद्देश्य से कि उन्हें भी एक-एक करके बमों से उड़ा दिया जाये। फहाद के पास से एक सी-डी भी बरामद हुआ जिससे कर्नाटक के महत्वपूर्ण स्थानों (उच्च न्यायालय सहित) को बम से उड़ा देने की साजिश का व्योरा मिला। फ़हाद कराची विश्वविद्यालय से विश्लेषणात्मक रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर पदवी प्राप्त है।
अली हुसैन गुसपैठिया था। वह कश्मीर की लीपा घाटी से अपने 10 अल-बदर साथियों समेत 2002 में घुसा। फ़हाद अपने बाप के साथ केरल आया था दिसम्बर 2005 में। वीज़ा समाप्त होने के पश्चात फ़हाद यहीं रह गया था। फ़हाद के पास सऊदी अरब, पाकिस्तान एवं भारत के विभिन्न स्थानों एवं व्यक्तियों से, जो उनके हमदर्द रहे हैं, हवाला एवं वेस्टर्न यूनियन मनी ट्रांसफर के द्वारा धन पहुँचता रहा, जिसका व्योरा पुलिस के पास है।" विवरण - Times Of India 28-10-2006 pp 1, 9

फ़हाद 10 महीने पहले यहाँ आया। उसने अपने पनाह की जगहें खोज लीं, यहीं भारत में उन मुसलमानों के पास, जो कहलाते तो थे भारत के नागरिक, पर जिनकी निष्ठा थी मुस्लिम-राष्ट्र के प्रति।

हम क्यों दिल खोल कर ऐसे लोगों को वीज़ा देते हैं? और अगर देते भी हैं तो क्यों नहीं, इतना पैसा हरेक से जमा करवा लेते हैं, वीज़ा देते समय, कि उनके ही खर्चे पर, हर समय, उनके पीछे सी-आई-डी लगी रहे, उनकी हर गतिविधि पर नजर रखने के लिए।

आप कहेंगे कि हर मुसलमान को शक की नज़रों से देखना अनुचित है

आप कहेंगे कि हर मुसलमान को शक की नज़रों से देखना अनुचित है। ठीक है, जो मुसलमान यह दावा करते हैं कि उनकी निष्ठा इस राष्ट्र के प्रति है, उन्हें ही इस बात की जिम्मेदारी लेने दीजिए, कि वे एक-एक करके उन गद्दार मुसलमानों को घर से बाहर निकालेंगे, जो पनाह देते हैं उन कातिलों को। जो कौम हमारे लिए बार-बार, लगातार, हमारे जान-माल के लिए खतरा पैदा कर रहा है, उन्हीं को जिम्मेदारी सौंपिए, कि वे उन कातिलों का सफाया कर, अपनी निष्ठा का सबूत दें।

पर उनसे यह माँग करेगा कौन? क्या वे राजनीतिज्ञ जो वोट के लालची हैं? या, फिर वे सिक्यूलर बुद्धिजीवी जिनकी निष्ठा केवल धन, यौन-लिप्सा और अपने-अपने क्षेत्र-विशेष में सत्ता की पकड़ पर है? या फिर वे सिक्यूलर मीडिया दिग्गज जिनकी ऊँची, आधुनिक जीवन-शैली की आधार-शिला टिकी है, उन आस्थाओं पर, जिनका उद्गम-स्थल कम-से-कम राष्ट्र-प्रेम तो नहीं है। 

यह जो राजनीतिक व्यवस्था है, जिसे हम बड़े गौरव से जनतंत्र कहते हैं, इसे हम पर थोपा गया था, उन लोगों के द्वारा, जिनके ज्ञान व समझ की परिधि थी, उनकी ईसाई-अंग्रेज़ी शिक्षा-पद्धति का छोटा सा दायरा। उन्होंने यह न समझा, कि एक पिद्दी सा देश इंग्लैण्ड, जिस राजनैतिक व्यवस्था से बँधा है ~ वह व्यवस्था हमारे इस विशाल देश में, जिसमें इतनी विविधता है जिसकी तुलना सम्भवतः विश्व के किसी भी देश से नहीं की जा सकती है ~ उस पर, उस पिद्दी से देश की व्यवस्था को लादना, कहाँ तक की बुद्धिमानी होगी?

बीते हुए कल को भुला कर एक नये इतिहास की रचना का सपना देखेंगे?

बड़े भोले हैं वो (या फिर धूर्त?), जो कहते हैं आपसे, कि भुला दो बीते हुए कल को, और चलो एक नये इतिहास की रचना करें। वे नहीं चाहते कि आप सीखें अपने बीते हुए कल से। वे चाहते हैं कि आप अपने आपको खुला छोड़ दें ताकि आप पर होने वाले आघातों का सिलसिला जारी रहे। ये सभी, अपने आपको सिक्यूलर कहने वाले, आपके दिग्दर्शक, नेता, बुद्धिजीवी, मीडिया दिग्गज - क्या आपको सही राह दिखला रहे हैं? वे आपके सच्चे हितैशी हैं, या कुछ और? उनकी निष्ठा इस राष्ट्र के प्रति है, या फिर किसी और के प्रति? पूछें ये सभी प्रश्न अपने आपसे। उत्तर के लिए आपको कहीं और नहीं जाना पड़ेगा, उत्तर स्वयं उभरेगा आपके मनो-मस्तिष्क के क्षितिज पर, यदि है आपमें अखण्ड प्रेम इस हिंदू राष्ट्र के प्रति, इस हिंदू संस्कृति के प्रति, अपनी जड़ों के प्रति, अपने ऐतिह्य के प्रति। पर ये प्रश्न उनके लिए बेमानी हैं जो अपनी जड़ों से कट चुके हैं।

दीपावली 2005 - सीरीयल बम विस्फोट - दिल्ली

"मोहम्मद चीपा और फ़िरोज़ घासवाला - दीपावली 2005 नई दिल्ली के सरोजिनी नगर में हुए बम विस्फोट के संदिग्ध अपराधी। ये दोनों आज़म चीमा से भी मिले थे बहवलपुर में प्रशिक्षण के लिए।" विवरण Times Of India 9-10-2006 p 3

आप टैक्स भरते हैं इन देशद्रोहियों के लिए (मुम्बई सीरीयल बम विस्फोट काण्ड मंगलवार 2 मार्च 1993)

•           257 मरे, 713 घायल
•           30 करोड़ की सम्पत्ति नष्ट
•           37 मुकदमे दायर मुम्बई, ठाणे एवं रायगढ़ जिले के विभिन्न पुलिस स्टेशनों में
•           123 व्यक्तियों पर मुकदमा चला
•           13,000 पन्नों में दर्ज सबूत पेश किये गये 684 प्रत्यक्षदर्शी गवाह पेश किए गए
•           38,070 प्रश्न पूछे गए उन अभियुक्तों के बयान दर्ज करते समय 
•           13 लाख प्रति महीने का औसत खर्च
•           18 करोड़ खर्च हो चुके हैं अब तक केवल इन पर चल रहे मुकदमों पर

विवरण - Times Of India Mumbai Mirror 16-10-2006 p 4

एयर इंडिया बिल्डिंग एयर इंडिया बिल्डिंग

झवेरी बाज़ार झवेरी बाज़ार

1993-03-02-Mumbai-Bomb-Blast-Stock Exchange स्टॉक एक्सचेंज

Petrol Pump near Shiv Sena Bhavanशिवसेना भवन के पास पेट्रोल पंप

जरा सोचिए, इन देशद्रोहियों को केवल सजा देने की प्रक्रिया में 18 करोड़ खर्च हो चुके हैं अब तक, जो आपकी (जनता की) जेब से गये कर के रूप में। यदि आपको स्वयं कर नहीं भी देना पड़ा हो, तो किसी और को तो देना ही पड़ा होगा, और उसका कर का एक हिस्सा आप पर भी खर्च हो सकता था, यदि सरकार को इन कातिलों को सजा दिलवाने में इसे खर्च न करना पड़ता। जहाँ तक इन कातिलों का सवाल है, वे तो कभी कर देते ही नहीं, बल्कि कर चोरी करते हैं तस्करी (स्मगलिंग) जैसे काम करके।

सभी अभियुक्तों को सजा सुनाते-सुनाते और भी जाने कितने करोड़ों खर्च होंगे, और उनमे से कुछ तो छूट भी जायेंगे क्योंकि वकीलों की पैंतरे बाजी से कइयों के जुर्म साबित न किए जा सकेंगे। सजा सुनाने के बाद हमारे सिक्यूलरिस्ट बुद्धिजीवियों एवं सिक्यूलरिस्ट मीडिया वालों के मन में अचानक प्रेम उमड़ने लगेगा, जैसा कि अभी-अभी हुआ है अफ़जल के मामले में।

फिर मीडिया जोर-शोर से प्रचार करना शुरु करेगी कि जनता की माँग है कि नरमी बरती जाये। वे जो स्वयं चाहते हैं उसे जनमत के रूप में प्रस्तुत करेंगे। वे जनमत शब्द का प्रयोग बार-बार, लगातार, कुछ यों करते रहेंगे कि सबको लगेगा जैसे देश के अधिकांश लोग नरमी बरतने के पक्ष में है। साथ में वे इस बात का भी प्रचार करना नहीं भूलेंगे कि इस जनमत के विरुद्ध यदि कोई है तो वह है साम्प्रदायिक मनोवृत्ति वाले कुछ हिंदू संगठन। जबकि सच्चाई यह होगी कि जनमत शब्द का वास्तविक अर्थ उनके अपने शब्दकोश में होगा - उन मुट्ठी भर लोगों का मत जो अपने आप को सिक्यूलर कहने में अपना बड़प्पन मानते हैं, और जिनकी नजर में केवल हिंदू ही एक सांप्रदायिक जीव है, जबकि मुसलमान एवं ईसाई सिक्यूलर हैं।

इस प्रकार ये सिकयूलर कहलाने वाले लोग, अपने कब्जे में की हुई मीडिया की शक्ति का दुरुपयोग कर, न्याय की प्रक्रिया में टांग अड़ाने में सफल हो जायेंगे, और फिर राष्ट्रपति महोदय, "इस भारी जनमत" के दबाव में आकर, इस मामले की सुनवाई करने की इच्छा जाहिर करते हुए, सजा को मुल्तवी कर देंगे, और यों बात एक बार फिर लटकती रह जायेगी।

उन कातिलों ने जान-माल की जो हानि करनी थी वह तो कर ही दी, फिर उन्हें सजा देना भी, अपने आप में, एक प्रकार की ऐयाशी बन कर रह गयी। 1993 में उन्होंने कत्लेआम किया, दाऊद और मेमन तो पाकिस्तान और दुबई में मौज मना रहे हैं, 13 वर्ष बीत चुके हैं, और जनता की कमाई टैक्स के रूप में खर्च होती जा रही है।

टी बी मॅकाले तो मर कर भूत बन गया, पर हमारे देश में टी बी की तरह घुन लगा गया। 1835 में उसने दो बड़े काम किए। एक - ईसाई मिशनरियों की बटालियन लेकर आया और हमारी प्राचीन उन्नत हिंदू शिक्षा-पद्धति को घुन की तरह चाट गया, और उसकी जगह ईसाई-अंग्रेज़ी शिक्षा-पद्धति हम पर लाद गया, जिसने हमें दिमागी तौर पर उनका गुलाम बना दिया।

मुसलमानों को ईसाइयों का अच्छा तजुर्बा था, क्योंकि वे दोनों एक-दूसरे के साथ जिहाद-क्रूसेड का खेल खेलते, सदियों से "खून की होली" मनाते रहे थे। उन्होंने ईसाइयों को विश्वास की नजरों से नहीं देखा, अपने बच्चों को मदरसों में पढ़ाया, और अपनी संतानों को दिमागी तौर पर गुलाम होने से बचा लिया। हिंदू सभी पर विश्वास करता, सभी को अपने जैसा मानता, सभी से प्रेम करता रहा, और यहीं मार खा गया। अंग्रेज़ तो चले गये पर अपनी औलाद छोड़ गये जो ईसाई तो न बन सके, न ही उन्हें हिंदू रहने दिया उनके ईसाई "फ़ादरों" ने, बस त्रिशंकू की भाँति अधर में लटकते हुए, सिक्यूलरिस्ट बन गये।

दूसरा बड़ा काम जो टी बी मॅकाले ने किया वह था - हमारी प्राचीन एवं उन्नत न्याय-पद्धति को जड़ से उखाड़ फेंका, और उसकी जगह अपनी (ईसाई-अंग्रेज़ों की) बनाई हुई न्यायपालिका हम पर थोप गया, जिसका उद्देश्य न्याय करना कम था, अपना फैसला सुनाना ज्यादा था, चाहे उसमें न्याय हो या न हो।

उस न्यायपालिका का एक और बड़ा मकसद था - न्यायाधीशों एवं वकीलों को धनी बनाना, गाँव के भोले-भाले लोगों की जेब खाली करा कर। अंग्रेज़ों के जमाने में न्यायाधीशों के ठाठ थे, और वकील बड़े पैसेवाले धनवान हुआ करते थे। आज भी अमरीका में वह वकील ही होता है जो सबसे ज्यादा धन कमाता है।

भारत में भी आज, उसी ईसाई-अंग्रेज़ी न्याय-पद्धति की पैदावार, वे वकील जो इन और इन जैसे कातिलों को छुड़ाने में माहिर होते हैं, वे सभी बड़े धनी होते हैं, और अपने आप कोे "प्रोफेशनल" कहते हैं। इस ईसाई-अंग्रेज़ी शिक्षा-पद्धति की एक बड़ी विशेषता यह है कि कानून के दायरे में रह कर, आप जितनी बड़ी बेईमनी कर सको, और इसके जरिये जितना ज्यादा धन कमा सको, उतने ही बड़े प्रोफेशनल कहलाओगे, और उतने ही इज्जतदार माने जाओगेे। इसी को उनके शब्दकोश में सफलता कहते हैं, और यह केवल वकालत के प्रोफेशन तक ही सीमित नहीं है।

यह एक विशेष अंतर है, जिस प्रकार से हिंदू शिक्षापद्धति धन कमाना सिखाती है, और जिस प्रकार से ईसाई शिक्षा-पद्धति धन कमाना सिखाती है। एक मे हृदय की ईमानदारी को महत्व दिया जाता है, और दूसरे में कानून के दायरे में रहकर जो "ईंमानदारी जैसी दिखे" उसे महत्व दिया जाता है।    

सैंकड़ों ऐसे उदाहरण पड़े हैं मेरे पास

"अब्दुल गनी इस्माइल तुर्क ने अपना जुर्म कबूल किया। 12 मार्च 1993 को 2 बज कर 45 मिनट पर मुम्बई के वर्ली स्थित सेंचुरी बाज़ार के बाहर उसने बम विस्फोट किया जिसके परिणाम स्वरूप 88 व्यक्तियों की जानें गईं, 159 घायल हुए एवं 2.5 करोड़ की सम्पत्ति का नुकसान हुआ। उसका आरम्भिक लक्ष्य था निकट-स्थित पासपोर्ट कार्यालय को उड़ाना और यदि वह यह कर पाता तो इससे भी कहीं अधिक जान और माल की हानि होती। इसके सिवा उसने सेकड़ी (रत्नागिरि) में अस्त्रों के उतरवाने में भी मदद की थी। अब्दुल गनी इस्माइल तुर्क टाइगर मेमन का ड्राइवर हुआ करता था। जिस दिन सारे बम फूटे, उस दिन माहिम स्थित अल-हुसैनी बिल्डिंग जहाँ मेमन अपने परिवार सहित रहा करता था, वहाँ उसने गाड़ियों में आर-डी-एक्स लादने में मदद की। उसके इकबाले-जुर्म के अनुसार, अमरोलिया रज़ाक नाम के एक व्यक्ति ने, उसका प्रथम परिचय करवाया था मेमन के साथ। तुर्क जब सऊदी अरब में ड्राइवर के रूप में काम करता था, तब 1985 में वह अमरोलिया से मिला।" विवरण - Hindustan Times 20-9-2006 p1
"टाडा कोर्ट ने सजा दी दाऊद फन्से उर्फ टक्ल्या (83) एवं शरीफ़ पारकर उर्फ़ दादा (73)। इन्होंने विस्फोट के पहले टाइगर मेमन को रायगढ़ जिले में अस्त्र-शस्त्र एवं आरडीएक्स पहुँचाने में मदद की।" विवरण Hindustan Times 23-9-2006 p 5
"मछुआरे - अब्बास दाऊद शेखदरे और शाहजहाँ इब्राहिम शेखदरे - इन्होंने अपने जालपोतों (trawlers) के द्वारा टाइगर एवं उसके आदमियों को अस्त्र-शस्त्र एवं विस्फोटक पदार्थ पहुँचाये। इनका तीसरा साथी यशवंत नागु भोइण्कर सम्भवतः पहले हिंदू रहा हो और मुसलमान बनने के बाद अपना नाम न बदला हो या फिर किसी भयंकर मजबूरी का शिकार बनाया गया हो। सबसे आश्चर्य की बात है हमारे अँग्रेज़ी समाचार पत्रों ने जोर-शोर से यह ऐलान नहीं किया कि एक हिंदू आतंकवादी भी पकड़ा गया। उनकी यह चुप्पी इस बात का परिचायक है यह व्यक्ति हिंदू के लिबास में, हिंदू नाम की खाल ओढ़े मुस्लिम रहा होगा। वे तीनों रायगढ़ से थे।" विवरण - Times Of India Mumbai Mirror 11-10-06 p13
"लंदन - मुम्बई के एक मुसलमान प्रवासी, एवं अल-कायेदा के एक नेता, के सत्रह वर्षीय पुत्र अब्दुल पटेल को, इंग्लैण्ड से अमेरीका जाने वाले हवाई जहाजों को उड़ा देने की योजना, के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है।" विवरण - Hindustan Times 14-8-2006 p1

क्या आतंकवाद का साया कभी दूर होगा?

10-10-2006 समय 13:04:53 एक SMS आया मेरे मोबाइल पर "हमें अपना स्वतंत्रता दिवस निर्भयतापूर्वक मनाने का स्वातंत्र्य कब मिलेगा? क्या आतंकवाद का साया कभी दूर होगा?" प्रसाद करकरे

यह होगा तभी ....

हमें अपना स्वतंत्रता दिवस निर्भयतापूर्वक मनाने का स्वातंत्र्य तब मिलेगा जब यह दार-अल-हर्ब (काफ़िरों का वतन) दार-अल-इस्लाम (मुसलमानों का वतन) बन जायेगा। तो प्रतीक्षा करें, उस दिन की।

वैसे आपको बहुत लम्बी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। हमारे देश के अधिकांशतः कर्णधार इसी चेष्टा में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुटे हुए हैं। धीरे-धीरे वे उन सभी रास्तों को खोले दे रहे हैं जिनसे राष्ट्रद्रोहियों का प्रवेश सहज से सहजतर होता जा रहा है। बड़े-बड़े राजनेता इसमें शामिल हैं जिनके हाथ में आज सत्ता है। इस भुलावे में न रहिए कि वे काँग्रेसी हैं, या कॉम्युनिस्ट हैं या फिर तथाकथित हिंदू भाजपा है। इतना स्पष्ट जानिये कि इन सभी की जात एक ही है। ये सभी बे-पेंदे के लोटे होते हैं। कुर्सी और ऐश इन्हें सब से अधिक प्रिय होता है। इनके मौसेरे भाई-बहन हैं मार्क्ससिस्ट बुद्धिजीवी। उनकी भी अपनी ही एक जात है। उन्हें भी सत्ता बड़ी प्रिय है। वे राजनीतिक सत्ताधारियों से होड़ नहीं करते। उन्होंने अपनी अलग जगह खोज ली है। उनका वर्चस्व है शिक्षा के क्षेत्र में, अर्थात नई पीढ़ियों के दिमाग पर कब्जा करना। उन्होंने अपनी पकड़ कस रखी है मीडिया पर, अर्थात जन-जन की सोच पर कब्जा करना उनके अधिकार क्षेत्र में आता है।8

8 पढ़ें हमारे बुद्धिजीवी, हमारी मीडिया, हमारे न्यायाधीश - कहानी एक षड़यंत्र की

इतिहास साक्षी है

"हिंदू सिद्धराजा जयसिंह के उत्तराधिकारियों ने उनके (जयसिंह के) द्वारा गुजरात में मुसलमानों एवं उनके इबादत (पूजा) की जगहों को दिये गये संरक्षण को बनाये रखा। इस दौरान गुजरात के अनेक शहरों में मुसलमानों की आबादी एवं उनके मस्जिदों की संख्या बढ़ती गई, अनेक गुणा। इस बात के अनेक साक्ष्य हैं - विशेष कर खम्बाट, जुनागढ़ एवं प्रभास पट्टन से पाये गये अनेक शिला लेखों में। ये सभी शिलालेख 1299 के पहले के हैं। गुजरात मुसलमानों के शासन में आया उलुघ खान के 1299 में आक्रमण के पश्चात। ... ऐसा लगता है कि ये व्यापारी, सौदागर, नाविक एवं मुल्ला, हिंदू शासन के अंतर्गत पाये गए संरक्षण से संतुष्ट नहीं रहे। वे राह देखते रहे उस दिन की जिस दिन यह दार-अल-हर्ब काफ़िरों का वतन (जो था गुजरात) बन जायेगा दार-अल-इस्लाम (मुसलमानों का वतन)।"
Hindu Temples: What happened to them Vol. II The Islamic Evidence, Sita Ram Goel  

इतिहास दोहरा रहा है अपने आप को

जो कुछ भी आपके चारों तरफ हो रहा है, उन्हें अलग-अलग घटनाओं के रूप में न देख कर, एक बड़ी योजना के रूप में देखें, तो आपके सामने एक और छवि उभरेगी, जो आपको आने वाले कल के प्रति सचेत करेगी। कश्मीर में पंडितों के साथ जो कुछ होता रहा उस पर आपने अधिक ध्यान नहीं दिया जिसके दो कारण हैं। एक यह कि वह सब आपके अपने परिवार के साथ नहीं घटा। दूसरा यह कि आपकी मीडिया ने उसे आपके सामने महत्वहीन बनाकर प्रस्तुत किया। यही कारण है कि आपको वह कत्लेआम न दिखा जो पाकिस्तान, बांग्लादेश9 और चिटागॉन्ग में हुआ। यहाँ मैं भारत-विभाजन के समय की बात नहीं कर रहा हूँ। उस उथल-पुथल के बाद जब चारों तरफ सन्नाटा छा गया, उसके बाद की कहानी तो आप तक पहुँची ही नहीं। पहुँचती भी तो कैसे? एक मीडिया ही माध्यम बन सकता था आपको सचेत रखने के लिए। पर जब कुत्तों के सामने हड्डियाँ डाल दी जायें तो वे भौंकना भूल जाते हैं।

9 पढ़ें मुस्लिम इण्डिया विल बी लाइक दिस

आतंकवाद शब्द के प्रयोग से, कौन सी छवि उभरती है, आपके मन में?

समचार पत्रों में आप आतंकवादियों के बारे में बहुत कुछ पढ़ते हैं। टीवी पर आप आतंकवादियों के कारनामों की झलकियाँ देखते हैं। राष्ट्र के सत्ताधारी आपसे आतंकवाद के बारे में कुछ न कुछ कहते रहते हैं, आपको बहकावे में रखने के लिए। राष्ट्र के दिग्गज दिग्दर्शक (तथाकथित बुद्धिजीवी) आपको आतंकवाद के बारे में अपनी-अपनी राय बताते हैं, एवं जो कुछ आपसे छुपाना उचित मानते हैं उसे अपने-आप तक ही सीमित रखते हैं ~ इस प्रकार वे आपको उजाले ~ या फिर अंधकार ~ की ओर ले चलते हैं।

राष्ट्र की सोच को दिशा ~ सही या गलत दिशा ~ देने वाले मीडिया ~ प्रेस, टीवी, इत्यादि के धुरंधर आपको केवल उतना ही बताते हैं जितना बताना उनके उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सहायक होता है, और वह सब कुछ बड़ी चतुराई से छुपा जाते हैं जिन्हें सामने लाना उनके छुपे हुए उद्देश्यों के लिए  घातक हो सकता है। जनसाधारण के विश्वास को जीतने के लिए, एवं उस विश्वास को बनाये रखने के लिए, वे उंगली उठाते हैं बार-बार राजनीतिज्ञों की ओर, उन्हें समस्त बुराइयों की जड़ बताते हुए।  

राजनीतिज्ञ पहले से ही बड़े बदनाम हैं अतः जनता को इसे पूर्ण सत्य मान लेने में कोई कठिनाई नहीं होती। इस प्रकार से ये मीडिया-दिग्गज जनता की दृष्टि अपनी ओर से हटा कर बे-ईमान राजनीतिज्ञों की ओर केन्द्रित किये रहते हैं। राजनीतिज्ञों की ओर उंगली उठाते समय वे इस बात का भी बड़ा ध्यान रखते हैं कि किस वर्ग के राजनीतिज्ञों को जनता की दृष्टि से हटा कर रखना उनके लिए हितकारी होगा एवं किस वर्ग के राजनीतिज्ञों पर अपनी सर्चलाइट डालना उनके दूरगामी उद्देश्यों में सहायक होगा। वह यह भी बखूबी जानते हैं कि किन खबरों को उछालना ~ औचित्य की सीमा से बाहर जाकर भी ~ उनके स्वार्थों की पूर्ति में सहायक होगा, एवं किन खबरों को दबाना ~ ताकि जनता उनसे बेखबर रहे ~ उनके कार्यक्रम के उद्देश्यों का पूरक होगा।

इस प्रकार राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों एवं मीडिया वालों ने मिल कर एक धारणा फैलायी है ~ (1) आतंकवाद का उद्देश्य है आतंक फैलाना (2) आतंकवादी वह होता है जो आतंक फैलाता है (3) आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता (4) आतंकवादियों की प्रेरणा का श्रोत किसी धर्म की शिक्षा में नहीं होता  (5) किसी धर्म में छुपा नहीं होता आतंकवाद का बीज।

यद्यपि तीनों ~ राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, मीडिया ~ का समुचित सहयोग रहा है इस घोर असत्य को फैलाने में पर इन तीनों में सबसे गम्भीर अपराध मीडिया का है। राजनीतिज्ञों एवं बुद्धिजीवियों की यह बात थोड़े से जनसमुदाय तक सीमित रह जाती यदि मीडिया ने इस असत्य को घर-घर तक न पहुँचाया होता। मीडिया ने ऐसा क्यों किया यह भी अपने-आपमें एक बड़ा जटिल विषय है और जो कुछ थोड़ा-बहुत ऊपर कहा गया है वह अपने-आप में कतई पर्याप्त नहीं है। इसके तह तक पहुँचने के लिए हमें अनेक पहलुओं पर गौर करना होगा एवं काफी गहराई में जाकर। 

आतंकवाद का बीज कहाँ छुपा हुआ है, उसे किसने उपजाऊ भूमि दी, किस-किस ने खाद डाली, किन्होंने उसे पर्याप्त जल देकर सींचा, इसे समुचित रूप से समझने के लिए आपको आवश्यकता होगी, मेरी अन्य पुस्तकों को पढ़ने की क्योंकि वे सभी किसी न किसी नये पहलू पर अवश्य आलोकपात करते हैं (पर वे सभी हिंदी में अभी उपलब्ध नहीं हैं, काफी कुछ समय लगेगा उनका हिंदी रूपान्तर करने के लिए)। 

एक लड़का खड्डे में गिरा तो......पर यहाँ सारा देश खड्डे में जा रहा है लेकिन

26-7-2006 समय 16:18:08 एक और एसेमेस आया मेरे मोबाइल पर "सोचिए ध्यान से - एक लड़का10 खड्डे में गिरा तो सारा देश संवेदनशील हो गया...!! सारा देश खड्डे में जा रहा है लेकिन कोई क्यों नहीं सोचता?" प्रसाद करकरे

10 सम्भवतः आपको याद हो उस लड़के का नाम प्रिंस था जिसे बड़ा मीडिया कवरेज मिला

मुट्ठी भर भी आज भारी पड़ रहे हैं

अभी तो वे मुट्ठी भर (15 प्रतिशत) हैं और हम पाँच गुना, फिर भी उन्होंने हमारे नाक में दम कर रखा है। वे कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं आपको इसकी चिंता नहीं है। वे सीमा पार से आ रहे हैं और हमारे साथ घुलमिल जा रहे हैं। उनके चेहरे, उनके डील-डौल हमारे जैसे, उनका रंग हमारे जैसा। उन्हें अपने से अलग कर पाना मुश्किल हो रहा है। उनकी पहचान कैसे करें यह समझना आसान नहीं। उनके हमदर्द भी हैं यहाँ इतने सारे, उनके अपने भाई-बंद, उनके नेता जिनकी पहुँच काफी है और जो यह भी जानते हैं कि इस्लाम के नाम पर आवाज दी तो ये सारे सड़क पर आ जायेंगे, अपनी एकता और अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने। वे यह धमकी देने से भी नहीं चूकते कि यदि बीस करोड़ मुसलमान सड़क पर आ जायें तो....(आपने पढ़ा ही होगा हाल ही में भिवंडी के आबू आज़मी ने क्या कहा)। कुछ की हिम्मत तो इतनी बढ़ गई है कि वे उत्तर प्रदेश की तरह "मुस्लिम प्रदेश" की माँग करने लगे हैं (अब यह मत कहिये कि आपने यह खबर पढ़ी ही नहीं)।

आने वाले कल की छवि

29-10-2006 समय 00:52 प्रसाद करकरे का एसेमेस जो आया अभी-अभी मेरे मोबाइल पर

"बढ़ते हुए मुस्लिम जनसंख्या का प्रभाव -
1947 शुभ दीपावली
2000 हैपी दीवाली
2010 दीवाली मुबारक
2020 शब-ए-दीप-मुबारक
2030 दीपवाले अली का सालाना उर्स मुबारक"

आपकी समस्या

यह सत्य है कि आप अकेले कुछ भी नहीं कर सकते इन सब के बारे में, फिर आपको चिंता है अपने परिवारों की भी, क्योंकि आपने अंग्रेज़ी पढ़कर ईसाई पद्धति से सिंगल-फैमिली बना कर रहने की कला सीख ली है और जॉयंट-फैमिली सिस्टम को बुराई मानकर तिलांजली दे दी है, जिसके परिणाम स्वरूप आप आज अपने-आपको "अकेला" पाते हैं, पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, बच्चे अकेले स्कूल जाते हैं और आपको चिंता लगी रहती है। ऐसी हालत में आप यह सोचना भी नहीं चाहते कि कल क्या होगा, आपका सारा ध्यान आज को सुरक्षित बना रखने में लगा होता है। आने वाली पीढ़ियों का क्या हश्र होगा, वहाँ तक आपकी सोच जा ही नहीं पाती।

इसके सिवा भी बहुत सी बाते हैं, जैसे कि आपके जेहन में कुछ कचरा भरा हुआ है जो आपको इस तरह की सोच देता है जैसे कि ये सभी आज के मुसलमान तो कल हिंदू ही थे न? यहाँ कल की सोचते हुए आप अनेक पीढ़ियों पीछे चले जाते हैं और वहीं से अपना भाई-चारा जोड़ने लगते हैं। आपकी इतनी बड़ी सी बुद्धि में इतनी छोटी सी बात समाती ही नहीं कि उस सुदूर अतीत से आज तक की यात्रा तय करते हुए उनमें कितना बदलाव आ चुका है जो उनके आचरण से ही झलकता है, यदि आपमें उसे देख पाने की योग्यता होती।

आप, कम से कम, इतना तो कर सकते हैं

तो लौटते हैं उसी बात पर कि आप अकेले कुछ नहीं कर सकते आज की स्थिति को नई दिशा देने में, पर इतना तो कर सकते हैं कि सोये न रहें, जागें, और सोचें, आपस में इस विषय पर बात-चीत करें, जब दोस्तों, सगे-संबंधियों से मिलें तो इन बातों कि चर्चा करें ताकि जागरूकता बढ़े। सप्ताह के अंत में छुट्टी के दिन दोस्तों, सगे-सम्बंधियों को खाने पर बुलायें और इस विषय को छेड़ें।

जो बच्चे किशोरावस्था में प्रवेश कर चुके हों उन्हें भी साथ लें इस विषय पर बात करते समय, अन्यथा ये बच्चे बड़े होकर कल के जिम्मेदार हिंदू बनने के बजाय, आजकल की हवा में पल-बढ़ कर अपने-आप को धर्मनिरपेक्षतावादी कहने में अधिक गर्व महसूस करेंगे, जबकि उन्हें सब धर्मों के बारे में सही ज्ञान कुछ न होगा, और जो झूठा ज्ञान उन्हें दिया गया है एवं हिंदू धर्म के बारे में जो विकृत छवि उनके सामने रखी गई है, उन्हीं बैसाखियों के सहारे वे अपनी जिंदगी गुजार देंगे, और अपनी अगली पीढ़ी को वही दिशा अपने विरासत के रूप में दे जायेंगे।

आप सभी इन विषयों पर जितनी बात करेंगे, जितना सोचेंगे उतनी ही आपकी जागरूकता बढ़ेगी। अधिकांशतः व्यक्ति हिचकिचायेंगे, इन बातों पर चर्चा से दूर रहना चाहेंगे, पर आपको उन्हें घसीटना होगा, उनमें रुचि पैदा करनी होगी। आप अगर लगे रहेंगे तो आपकी चेष्टा रंग लायेगी। आप यदि आसानी से हार मान लेंगे तो कुछ न होगा।

बंकिम चन्द्र चैटर्जी के "आनन्द मठ" (1906) की शताब्दी की सुबह

"गर सच में ज़िंदा ज़ज़्बा-ए-वतन हो। हो हर जुबाँ पे "वन्दे मातरम", हाथों में कफ़न हो।।" 
शायर असर वर्मा (प्रेषक - प्रसाद करकरे 7-9-2006 समय 7:23:29 (एक और एसेमेस मेरे मोबाइल पर)

क्या खूब - इसे न्याय कहते हैं हम!

"मुम्बई उच्च न्यायालय ने बृहस्पति वार को कहा कि सिद्धिविनायक मंदिर के चारों तरफ जो सुरक्षा दीवार बनाई गई है उसे तुड़वा देना होगा चाहे इससे मंदिर को खतरा क्यों न हो। जन सुरक्षा की आड़ में कानून को तोड़ा नहीं जा सकता। पुलिस की जिम्मेदारी है कि वह जनता की सुरक्षा करे कानून के अंदर रहकर।" विवरण - Hindustan Times 5-10-2006 p1, p3

यह है न्याय एवं विधान की परिभाषा हमारे तथाकथित आदरणीय न्यायाधीशों की नज़र में। कतिपय हिंदू-विरोधी लोगों को मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था फूटी आँखों नहीं भायी और उन्होंने पी-आई-एल (जन-हित में मुकदमा) दायर कर दिया। उनका कहना है कि इस दीवार के कारण उन्हें यातायात में परेशानी होती है।

उनकी एक परेशानी की झलक मुझे भी मिली थी कुछ समय पहले। 26 जुलाई 2006 की बात है। किसी व्यक्तिगत कार्य से प्रभादेवी गया हुआ था। वहाँ से मुझे फिर ऑपेरा हाउस की तरफ जाना था। अचानक मेरे ध्यान में आया कि मैं मंदिर के इतने पास हूँ तो मुझे एक बार दर्शन अवश्य करने चाहिए। मैंने टैक्सी वाले से कहा कि टैक्सी घुमाओ और मुझे मंदिर पर छोड़ दो। वह मुझे एक स्थान पर ले गया और उसने कहा कि इसके अंदर टैक्सी मना है, आप पैदल चले जाइये। मैं बहुत दिनों के बाद आया था और मुझे बड़ा अजीब लगा कि टैक्सी वाले ने  मुझे मंदिऱ के पिछवाड़े उतारा जबकि सदा से मैं मंदिर में प्रवेश सामने से किया करता था। चलते-चलते दो-चार पुलिस वालों से भी पूछा की यह सब बदलाव क्यों, तो उन्होंने बताया कि सुरक्षा हेतु यह व्यवस्था है। चलना मुझे थोड़ा सा ही पड़ा। इससे कहीं ज्यादा लम्बी लाईन लगती देखी है मैंने प्रत्येक मंगलवर को, सालों तक, सारे मुम्बई से औरतें-मर्द आकर भोर के तीन-चार बजे से (बहुधा सारी-सारी रात) लाईन में खड़े रहते थे और उनका नम्बर आता था अनेक घंटों के बाद।

जब मैं मंदिर से लौट रहा था तो अचानक एक बिल्डिंग से एक टैक्सी निकली और मुझसे आगे निकल गई। टैक्सी खाली थी और मेरी नजर उसके ड्राइवर पर पड़ी जिसकी दाढ़ी, टोपी और पहनावा मुझे साफ बता रहा था कि वह मुसलमान था। मैं दो कदम आगे बढ़ा तो सामने से तीन पुलिस वाले आते दिखाई दिए। उनमें एक अफसर-सा दिखा तो उसे रोक कर मैंने पूछा कि इस टैक्सी को कैसे अंदर आने दिया जब कि मेरे टैक्सी वाले ने मुझे बताया था कि टैक्सी ऐलाउड नहीं है। उन्होंने मुझे बड़े प्रेम से समझाया कि वह व्यक्ति टैक्सी का मालिक है और इसी बिल्डिंग में रहता है। मैने नजर उठाकर उस टैक्सी की तरफ देखा जो सिक्योरिटी-गेट पर रुकी थी और मुझे एहसास हुआ कि उसे चेकिंग के बाद छोड़ा जा रहा था। स्वाभाविक है कि उसे दर रोज टैक्सी निकालते और लाते वक्त चेकिंस से गुजरना पड़ता होता। यह बात उसे पसन्द नहीं होगी क्योंकि वह बेधड़क, चाहे जो मर्जी, टैक्सी के अंदर लेकर नहीं आ सकता है। उसके ऊपर बन्दिश है, लगाम है। अब मेरी समझ में आया कि क्यों, कुछ लोगों को, सिक्योरिटि चेकिंग पसंद नहीं है।  

उन्हें बताया जाये कि सुरक्षा आवश्यक है तो वे मन ही मन कहेंगे कि कैसी सुरक्षा, किससे सुरक्षा? यदि कातिलों (तथाकथित आतंकवादियों) की ओर उंगली उठायी जाये तो वे सोचेंगे कि ये सब गलत थोड़े ही कर रहे हैं। वे तो बस इस्लाम के बताये राह पर चल रहे हैं। वे सच्चे मुसलमान हैं, कोई कातिल नहीं, कोई गुनाहगार नहीं।    

"मुम्बई पुलिस ने एक दर्जन से अधिक पत्र लिखे मंदिर के अधिकारियों को, उन्हें सावधान करते हुए कि एक "अघोषित युद्ध" छेड़ा गया है आतंकवादियों के द्वारा। इस वर्ष अप्रैल में यह दीवार चुनी गई छह करोड़ की लागत से।" विवरण - Hindustan Times 5-10-2006 p3

मुकदमा दायर करने वालों का कहना है कि जो सड़क जनता के लिए बनी है उसके एक छोटे से हिस्से पर मंदिर की सुरक्षा के लिए दीवार बनवाना गैर-कानूनी है। और न्यायाधीश कहते हैं कि हफ्ते भर के अंदर वह कानून हमें दिखाओ जिसके तहत तुमने यह दीवार खड़ी की है, अन्यथा इस दीवार को गिरा दो। अप्रैल मे बनी इस दीवार को तुड़वाने के लिए छः महीनों में ही न्यायालय जाग गई है और न्याय देने को व्याकुल हो बैठी है। फिर जब दीवार तोड़ दी जायेगी, कातिल हमला करेंगे, अनेक जानें जायेंगी, तब न्यायाधीश सोने जायेंगे, और तेरह वर्षों के बाद उनकी नींद टूटेगी, ठीक वैसे जैसे 1993 के कातिलों को आज 2006 में सजा सुनाई जा रही है।

तब कहेंगे जो भगवान अपनी रक्षा नहीं कर सकता वह हमारी रक्षा क्या करेगा?

पोथी पढ़ कर जब लोग विद्वान बन जाते हैं तो कुछ ऐसी ही बातें कहते हैं। बचपन में एक कहानी पढ़ी थी मैंने, जो आपने भी कभी न कभी पढ़ी ही होगी। एक बड़े नामी-गरामी स्वामीजी हुआ करते थे। उनके आज लाखों अनुयायी11 हैं। उनमें से आज भी अनेक अनुयायी पुस्तकें लिख कर हिन्दू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाते हैं। ये सभी बड़े ज्ञानी-गुणी जन हैं जो अपने संस्थापक स्वामीजी का नाम रोशन कर रहे हैं।

कहते हैं कि वही स्वामीजी जब एक बच्चे थे तब उन्होंने अपने पिता को शिवजी की पूजा करते हुए देखा था। सामने मिठाई रखी हुई थी, जैसा हम हिंदू पूजा के लिए करते हैं। इतने में एक चूहा आकर एक मिठाई उठा ले गया। वह बच्चा जब बड़ा होकर स्वामी बना तो हिन्दुओं को बताने लगा कि तुम्हारा भगवान तो पत्थर है जो अपने हिस्से की मिठाई तक नहीं बचा सका, तो वह तुम्हें क्या बचायेगा? यह बात उन लोगों को जँच गई जिन्होंने ईसाई-अंग्रेजी पद्धति में पढ़ाई की थी क्योंकि उनके स्कूल में उनके "फ़ादर" भी यही कहते थे। इस प्रकार उस बच्चे ने बड़े होकर कुछ हिंदुओं को तोड़ कर अपनी तरफ कर लिया और एक नई जमात शुरू कर दी। अंग्रेजी मीडिया ने उसे हिंदू समाज का सुधारक घोषित कर दिया। वे इस ताक में थे कि हिन्दुओं में से ही कोई उनका अपना-सा दिखने वाला हिंदुओं को बताये कि तुम्हारा भगवान नकली है तो इससे ईसाइयों का काम आसान हो जायेगा।12

उसी सोच की एक आधुनिक-सी पुनरावृत्ति हो रही है आज। सिद्धिविनायक मंदिर की सुरक्षा को क्षीण कर दिया जाये, सुरक्षा दीवार को ढहा कर। आतंकवादियों के लिए मंदिर में बम रखवाना आसान कर दिया जाये। जब मंदिर उड़ा दिया जाये तो यह कहा जाये कि देखो हिंदुओं, तुम्हारा यह भगवान अपनी रक्षा तो कर नहीं सकता, वह तुम्हारी रक्षा क्या करेगा? यह तो नकली भगवान है, बस पत्थर का टुकड़ा है।

11 वैसे यह अलग बात है कि वे सभी अनुयायी आज आपस में सर टकरा़ रहे हैं और एक-आध सदी के अंदर वे सभी ~ उनका समाज और उनके महर्षि ~ इतिहास के पात्र बन जायेंगे
12 विषद विवरण के लिए पढ़ें - कौन अपना कौन पराया / सिक्के का दूसरा पहलू  

हिंदू के लिए न्याय अलग और मुसलमान, ईसाई के लिए न्याय अलग

सिद्धिविनायक मंदिर की आतंकवादियों से सुरक्षा के लिए, मुम्बई पुलिस के परामर्श पर बनायी गई सुरक्षा दीवार "सिक्यूलरों" की नजर में खटकती है। सो उन्होंने बहाना पेश किया कि आस-पास रहने वाले लोगों को इस दीवार के कारण असुविधा हो रही है एवं गाड़ियों के यातायात पर थोड़ा समय अधिक लग रहा है। उनका कहना है कि यह दीवार गैर-कानूनी है, और कानून के रखवाले सिक्यूलर न्यायाधीश ने अपनी मुस्तैदी दिखाते हुए तुरंत अपना निर्णय भी सुना दिया, यद्यपि उसके ही कोई सप्ताह भर बाद हमें एक और खबर पढ़ने को मिली कि देश के सर्वोच्च न्यायालय ने फटकार दी है (इस सिलसिले में नहीं) कि एक करोड़ से अधिक मुकदमे अभी तक पड़े सड़ रहे हैं जिन पर कोई निर्णय नहीं दिया गया है।

क्या आप कभी मुम्बई के प्रसिद्ध मेट्रो सिनेमा के पास से गुजरे हैं? वहाँ करीब ही, ठीक रास्ते के बीचो-बीच एक बड़ा सा मस्जिद खड़ा है जिससे गाड़ियों के यतायात पर सर्वदा असर पड़ता है। हमारे न्यायाधीश महोदय मुम्बई में रहते हैं पर क्या वह कभी इस रास्ते से नहीं गुजरे? यह तो कुछ ऐसा रास्ता है जहाँ से शहर की तरफ जाने वाला लगभग हर व्यक्ति कभी न कभी अवश्य ही गुजरता है। तो प्रश्न उठता है कि क्या हमारे सिक्यूलर नागरिकों को जिन्होंने वह मुकदमा सिद्धिविनायक मंदिर के विरुद्ध दायर किया और जिस न्यायाधीष ने उस सुरक्षा-दीवार को गैर-कानूनी घोषित किया, उनमें से किसी को भी सपने में भी यह खयाल नहीं आया कि मेट्रो का वह मस्जिद भी गैर-कानूनी है? ऐसी दोगली सोच क्यों हमारे ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा-पद्धति में पढ़े-पले संभ्रांत नागरिकों की?

क्या आपको याद है कि कुछ समय पहले (संभवतः पिछले एक वर्ष के दौरान) मुम्बई के स्वनाम-धन्य (संभवतः उच्च) न्यायालय ने मुम्बई पुलिस को निर्देश दिया था कि सभी सड़क पर बने हुए (तथाकथित गैर-कानूनी) हिंदू, मुस्लिम एवं ईसाई पूजा स्थलों को तुड़वा दिया जाये। सैंकड़ों हिन्दू मंदिर फटाफट तोड़ दिए गए। मुस्लिम और ईसाई पूजा स्थल तोड़े नहीं जा सके। गलती पुलिस की नहीं थी, हमारे न्याय की प्रक्रिया की थी, जो मुस्लिम-ईसाई-सिक्यूलर मिल कर "स्टे-ऑर्डर" ले आये। उसके पश्चात न्यायालय, इस विषय पर (सड़क पर बने पूजा स्थलों को तोड़ने के अपने आदेश पर), कुम्भकर्ण निद्रा में चली गई। आदेश देने के पहले क्या उन्हें यह नहीं मालूम था कि ऐसा ही होने वाला है, क्योंकि सदा ऐसा ही होता रहा है, जबसे हमारे दो महामानवोंज्ञान ने इस प्रथा का आरम्भ किया। प्रश्न यह है कि इस (तथाकथित हिंदू बहुल) राष्ट्र में कानून हिंदू के लिए अलग कि "उसे सदा सहते रहना पड़े" और मुस्लिम-ईसाई के लिए अलग कि "उन्हें सदा छूट मिलती रहे"।

13 उन दो महामानवों के छुपे चेहरों की कहनी आगे आने वाली पुस्तकों में

आपका अगला कदम

ज्ञान आँखें खोलता है, आपको अपने कर्तव्य का बोध कराता है। आपको सही और गलत के बीच पहचान करने की योग्यता देता है, और सत्य के पक्ष में खड़े होने की क्षमता देता है। ज्ञान आपको सत्य की रक्षा करने के लिए कटिबद्ध करता है। परन्तु अधूरा ज्ञान आपकी क्षति भी कर सकता है। अधूरा ज्ञान आपको उत्तेजित कर सकता है, और आपको ऐसे कार्य की ओर प्रेरित कर सकता है जो हलचल तो मचा दे, पर कोई स्थायी समाधान न दे। अतः एक-एक कदम आगे बढ़ायें। अभी तो आपकी यात्रा केवल आरम्भ हुई है। अनेक पड़ाव आने बाकी हैं।

राष्ट्र को मेरी पुकार

आज भारत-माता के वक्षस्थल से एक-एक बूँद खून रिसता जा रहा है...

भारत माता के संहारक

यह तब तक रिसता रहेगा जबतक एक भी कतरा खून का बचा रह जाता है भारत-माता के शरीर में...

कई वर्ष पहले जब यह पुस्तिका लिखी गई थी, उन दिनों यूनिकोड का प्रचलन नहीं था। इस कारण तब TTF ट्रूटाइप फ़ॉन्ट्स का प्रयोग किया गया था। अब उन अक्षरों का OTF (ओपन टाइप फ़ॉन्ट्स) यूनिकोड में रूपांतर एक सॉफ़्टवेयर द्वारा किया गया है। यह ग्यारह हज़ार की सॉफ़्टवेयर अच्छा काम करती है पर सभी सॉफ़्टवेयरों की अपनी-अपनी सीमायें होती हैं। अतः कतिपय गलतियों की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

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