(1) हिन्दू जो तटस्थ रहना चाहता है (2) पराया धन

2006 11 - राम मंदिर तुम्हें पुकारता, जागो मेरे हिन्दू राष्ट्र

हिंदू आज क्षात्र-धर्म भूल चुका है

मुझे बार-बार इस बात की अनुभूति होती रही है कि आज हिंदू कलह नहीं चाहता। कोई संघर्ष नहीं चाहता, चाहे वह संघर्ष असत्य अन्याय रूपि अधर्म के विरुद्ध ही क्यों न हो। हिंदू आज क्षात्र-धर्म भूल चुका है। इसका कारण है (1) प्राचीन हिंदू शिक्षा पद्धति को जड़ से उखाड़ फेंकना (2) उसकी जगह ईसाई-अँग्रेज़ी शिक्षा पद्धति को हम पर जबरन लादना (3) पिछली दो पीढ़ीयों से नास्तिकतावादी कॉम्यूनिस्ट-मार्क्ससिस्ट सोच और उसके प्रभाव में भारी वृद्धि।

क्योंकि उसका मूल्य "स्वयं उसे" नहीं चुकाना पड़ता

आज हिंदू तटस्थ रहना ही पसंद करता है। कारण, जो कुछ उसके चारों तरफ हो रहा है, उसका मूल्य स्वयं उसे नहीं चुकाना पड़ता।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की ये दो पंक्तियाँ

समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध।
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।।

अपने धर्म के प्रति अपने 'दायित्व का त्याग'

अपने चारों तरफ होते हुए अनाचारों को अनदेखा करते रहना हिन्दू की प्रवृत्ति बन गई है। इसमें भी एक अजीब विरोधाभास है। उसकी यह उदासीनता उसका त्याग है। अन्य शब्दों में कहा जाये तो अपने धर्म के प्रति अपने दायित्व का त्याग।

इसके साथ-हीवह बन गया है धन के विषय में स्वार्थी। एक प्रकार से देखा जाये तो आप कह सकते हैं उसे 'भोगी'। कुछ ऐसा भोगी जिसकी सारी सोच अपने 'छोटे-से' परिवार की आवश्यकताओं के इर्द-गिर्द घूमा करता है।

उसे अपने परिवार से जोड़ना कम, और तोड़ना अधिक सिखाया है

हिन्दू 'ऐसा' कैसे बन गया? यह 'त्याग' और यह 'भोग' उसे उपहार में मिला है, पिछली छः पीढ़ियों के दौरान, उस ईसाई-अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से, जो हम पर जबरन थोपा गया था, हमारी अपनी प्राचीन हिन्दू शिक्षा पद्धति को, बड़े-ही योजनाबद्ध रूप से, मूल सहित उखाड़ फेंक कर। इस शिक्षा ने उसे अपने परिवार से जोड़ना कम, और तोड़ना ज्यादा सिखाया है।

पवित्र बाइबिल में ईसा के इन शब्दों पर ध्यान दीजिए 

मैथ्यू 10:34  न सोचो कि मैं आया हूँ विश्व में शांति लाने के लिए--मैं आया हूँ शांति के लिए नहीं बल्कि तलवार लिए  10:35  क्योंकि मैं आया हूँ आदमी को अपने पिता के विरुद्ध खड़ा करने के लिए--पुत्री को माता के विरुद्ध--बहू को सास के विरुद्ध  10:36  और मनुष्य का शत्रु होगा उसका अपना परिवार  12:30  वह जो भी मेरे साथ नहीं वह मेरे विरुद्ध है। Holy Bible, Vatican Authorized King James Version, Pilot Books, ISBN 0-8400-3625-4 [1996]
ल्यूक 12:51--तुम समझते हो कि मैं आया हूँ इस धरती को अमन चैन देने? मैं तुम्हें बताता हूँ --नहीं। मैं आया हूँ बँटवारा करने  12:52  क्योंकि अब से घर में पाँच बटे होंगे--तीन दो के विरुद्ध--दो तीन के विरुद्ध  12:53  पिता होगा पुत्र के विरुद्ध--पुत्र होगा पिता के विरुद्ध--माँ होगी पुत्री के विरुद्ध--पुत्री होगी माता के विरुद्ध--सास होगी बहू के ख़िलाफ़--बहू होगी सास के ख़िलाफ़  14:26  यदि एक व्यक्ति मेरे पास आता है और वह अपने पिता से घृणा नहीं करता--एवं माता से, पत्नी से, संतानों से, भाई-बहनों से, एवं अपने-आप से भी--तो वह मेरा शिष्य नहीं बन सकता। Holy Bible, Vatican Authorized King James Version, Pilot Books, ISBN 0-8400-3625-4 [1996]
गॉस्पेल ऑफ थॉमस 16  ईसा ने कहा संभवतः लोग सोचते हैं कि मैं आया हूँ विश्व में शांति स्थापना हेतु --वे नहीं जानते कि मैं आया हूँ इस धरती पर फूट डालने के लिए--आग, तलवार और युद्ध फैलाने के लिए--जहाँ पाँच होंगे एक परिवार में--वहाँ तीन होंगे दो के विरुद्ध और दो होंगे तीन के विरुद्ध--पिता होगा पुत्र के विरुद्ध और पुत्र पिता के--और वे डटे रहेंगे क्योंकि वे दोनों अपने आप में अकेले होंगे  56  जो अपने पिता से घृणा नहीं करेगा और अपनी माता से भी, वह मेरा शिष्य नहीं बन सकता। वह जो अपने भाइओं एवं बहनों से घृणा नहीं करेगा, और अपना क्रॉस नहीं ढोएगा जैसा कि मैंने किया है, वह मेरे योग्य न बन पायेगा। The Secret Sayings of Jesus (according to the Gospel of Thomas) Robert M Grant, et al, London 1960, quoted in ISBN 81-85990-21-2 [1995]

अब जो माँ-बाप की ही परवाह न करे, वह हिन्दू धर्म की क्या परवाह करेगा?

ईसाई शिक्षा एवं संस्कृति के दुःष्प्रभाव के परिणाम स्वरूप, आज हिन्दू की सोच अपने माँ-बाप के प्रति कुछ ऐसी बनती जा रही है - माना तुमने अपना पेट काट कर हमें पढ़ाया-लिखाया, बड़ा-आदमी बनाया, तो क्या? यह तुम्हारी जिम्मेदारी थी। तुमने हमें पैदा क्यों किया? जब किया, तो निभाया। कोई अहसान तो नहीं किया… अब मुझसे मत आशा करना कि मैं तुम्हारी जिम्मेदारी उठाउँगा। और भूले से यदि पुत्र चाहता भी है जिम्मेदारी उठाना, तो उसकी पत्नी आड़े आ जाती है। वे दोनों भूल जाते हैं, कि एक दिन ऐसा भी आयेगा, जब उनकी अपनी सन्तानें भी कुछ ऐसा-ही सोचेंगी। अब जो माँ-बाप की ही परवाह न करे, वह हिन्दू धर्म की क्या परवाह करेगा।

पराया धन

पराया धन का अर्थ हिन्दू की दृष्टि में अलग होता था, जबकी ईसाई की दृष्टि में कुछ और

हिन्दू समाज में बेटी को पराया धन माना जाता था। पराया धन का अर्थ हिन्दू की दृष्टि में अलग होता था, जबकी ईसाई की दृष्टि में कुछ और। हिन्दू पराया धन को अपने धन से भी ज्यादा कीमती मानकर उसकी परवरिश और रक्षा करता था, ताकि जब उस धन को, जिसकी अमानत है उसे सौंपने का समय आये, तो उसे गरिमा के साथ सौंपा जा सके। ईसाई की दृष्टि में पराया धन वह होता था (और आज भी वही होता है) जिसे छीन कर अपना बना लिया जाये। लौटाने (सौंपने) का तो प्रश्न ही नहीं उठता, उल्टे यदि आवश्यकता पड़े तो बेईमानी से उसे हड़प लिया जाये।

जो उसने सीखा, वही विरासत अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी देकर जायेगा

आज का हिन्दू, जो छः पीढ़ियों से ईसाई-अंग्रेजी शिक्षा का मानसिक गुलाम बन चुका है, उसे लड़की का पराया धन होना समझ में नहीं आता। वह इसे हिन्दू समाज की एक बुराई के रूप में देखता है। उसका दोष ही क्या? बचपन से उसे जो शिक्षा स्कूल में मिली, उस शिक्षा ने हिन्दू धर्म और हिन्दू समाज को नीची नजरों से देखना ही सीखाया। जो उसने सीखा, वही विरासत अपनी आने वाली पीढ़ियों को भी देकर जायेगा

इस प्रकार वह अपने पति के सम्पूर्ण परिवार को 'गढ़ने वाली' बनती, 'तोड़ने वाली' नहीं

पराया धन माने जाने के कारण, बेटीयों को ऐसे तैयार किया जाता था कि वे जब अपने पति के घर जायें तो उस परिवार में इस प्रकार घुल-मिल जायें कि उन्हें यह न लगे कि उन्होंने कुछ खोया है। बेटी जब ब्याह दी जाती थी, तो वह अपने पति के वृहद-परिवार का अभिन्न अंग बन जाती थी। उसके लिए पति का परिवार (जिसमें पति के माता-पिता, भाई-बहन, सभी शामिल होते थे) उसका अपना परिवार बन जाता था। इस प्रकार वह अपने पति के सम्पूर्ण परिवार को 'गढ़ने वाली' बनती, 'तोड़ने वाली' नहीं।

जैसा स्वयं ईसा की जबान से सुना, वैसा ही लिपिबद्ध किया

पर ईसा की मर्जी तो कुछ और ही थी जो आपने ऊपर पढ़ी। उनकी कही हुई बात को उनके मुख्य शिष्यों (मैथ्यू और थॉमस) ने जैसा स्वयं ईसा की जबान से सुना, वैसा ही लिपिबद्ध किया। ईसा ने स्वयं कहा, बड़े-ही स्पष्ट शब्दों में, शक की कोई गुंजाइश छोड़े बिना, कि वह शांति और प्रेम बाँटने इस धरती पर नहीं आये थे, बल्कि युद्ध-आगजनी के उद्देश्य से आये थे, और परिवारों को टुकड़ों-टुकड़ों में बाँट देने के लिए आये थे।

इन दो हजार वर्षों में जहाँ भी ईसा का प्रभाव बढ़ा, वहीं परिवारों के टुकड़े-टुकड़े हो गये

ईसा के मरने के बाद का, पिछले दो हजार वर्षों का इतिहास देखिए, युद्ध और आगजनी के सिवा क्या मिलता है? और इन दो हजार वर्षों में, जहाँ भी ईसा का प्रभाव बढ़ा, वहीं परिवारों के टुकड़े-टुकड़े हो गये। इससे बड़ा साक्ष्य आपको क्या चाहिए? चाहें तो पवित्र बाइबिल की एक प्रति खरीदें और स्वयं पढ़ कर देख लें।

वह आपका वास्तविक इतिहास है, जबकि ईसाई-अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति ने आपको यही सिखाया कि वे काल्पनिक कहानियाँ थीं क्योंकि वे चाहते थे कि

हाथ कंगन को आरसी क्या! आपने रामायण-महाभारत तो पढ़ी ही होगी। वह आपका वास्तविक इतिहास है, जबकि ईसाई-अंग्रेजी शिक्षा-पद्धति ने आपको यही सिखाया कि वे काल्पनिक कहानियाँ थीं। उन्होंने तो आपको ऐसा सिखाया क्योंकि वे चाहते थे, कि आपकी नजर में, आपका अपना कोई इतिहास ही न रह जाये, जिस पर आप किसी प्रकार का भी गर्व कर सकें। जब आप अपनी-ही जड़ से कट जायें, तो आप कहीं न कहीं तो एक सहारा ढूढ़ेंगे। तब वह सहारा होगा, वह सब कुछ जो ईसाई है, जो अंग्रेजी है, जो पाश्चात्य है, जो आधुनिक है, जिसमें कुछ भी हिन्दू नहीं। ध्यान से देखेंगे तो आप पायेंगे कि आपके समाज का एक बड़ा-सा हिस्सा आपसे कट कर अलग हो गया है जो अपनी पहचान कहीं और खोजता है पर हिन्दुत्व में नहीं।

कभी आपने अपने वास्तविक इतिहास रामायण-महाभारत में बहू का सास के प्रति दुर्व्यवहार और सास का बहू के प्रति दुर्व्यवहार देखा था?

कभी आपने अपने वास्तविक इतिहास रामायण-महाभारत में बहू का सास के प्रति दुर्व्यवहार और सास का बहू के प्रति दुर्व्यवहार देखा था? पर बचपन मैंने जितनी भी हिन्दी सिनेमायें देखी थीं, लगभग सभी में एक चीज अवश्य दिखती थी। गाँव का लड़का पढ़-लिख कर शहरी बन जाता है, बड़ा आदमी बन जाता है, और तब बहू अपने सास से अपने घर के बर्तन मँजवाती है, झाड़ू-पोंछा करवाती है, सास को अपने घर में पनाह देने की एवज में, और अपने दोस्तों से सास का परिचय घर की एक नौकरानी के रूप में कराती है। तब तो मैंने बाइबिल पढ़ी न थी। अब पढ़ी है तो यह भी जाना है कि ईसा का आविर्भाव इस धरती को किस दिशा में ले जाने के लिए हुआ था। यह भी देखा कि ईसा और उसके अनुचर कितना सफल हो चुके हैं इस दिशा में।

अब सोचिये कि यदि वे आपको ईसा की सारी सच्चाई पहले ही बता देते तो क्या आप ईसाई बनने को राजी होते?

आप सोच में पड़ जायेंगे कि आप तो सर्वदा सुनते आये हैं कि ईसाई धर्म प्रेम, दया और मानवता की सेवा का धर्म है। तो फिर ये सब क्या बकवास है? बाइबिल को और गहराई से पढ़िये। ईसा ने एक और बात कही थी। जो भी ईसाई 'न' बनेगा वह अनन्त काल तक नरक में सड़ेगा। अतः सबको ईसाई बनाओ (ताकि ईसा उन्हें स्वर्ग की सैर करा सकें)। अब सोचिये कि यदि वे आपको ईसा की सारी सच्चाई पहले ही बता देते तो क्या आप ईसाई बनने को राजी होते? स्वाभाविक है कि नहीं। तो यह ढकोसला खड़ा करना ही पड़ा कि ईसा प्रेम, दया के देवता हैं। उनकी फोटो भी देवतुल्य बनायी गई ताकि उसे देखकर आपमें श्रद्धा-भाव उमड़े।

 

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